भारतकोश
१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

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प्रकरण-3 नाना साहब और लक्ष्मीबाई महाराष्ट्र की पुण्यभूमि में माथेरान के गिरी शिखर के गौरव और उस गिरी शिखर की तलहटी में हरी चादर से शोभित भूमि के गौरव में से किसका वर्णन अधिक किया जाए, इसका निर्णय करना असंभव है। इस शानदार माथेरान की देखरेख में और इस सुंदर भूमि की गोद में वेणु नामक एक छोटा सा गांव अपनी सहज सुंदरता से पहले से ही सुंदर उस प्रदेश को और अधिक सुंदर बना रहा था। वेणुग्राम में जो कुलीन एवं सदाचार संपन्न परिवार थे उनमें माधवराव नारायण का परिवार मुख्य रूप से गिना जा सकता था। माधवराव नारायण और उनकी सुशील भार्या गंगाबाई का जोड़ा गृह-दरिद्रता से पीड़ित होकर भी परस्पर प्रेम के सुख में स्वयं को भाग्यवान समझता था। उस पवित्र परिवार के उस छोटे से घर में सन् 1824 में सबके मन और बदन उस समय उल्लास से खिल उठे जब साध्वी गंगाबाई ने पुत्र को जन्म दिया। वह सत्पुत्र और कोई नहीं, श्रीमंत नाना साहब पेशवा ही थे जिनके नाम से अत्याचारी राजाओं की देह कांपने लगती थी और जिन्होंने स्वराज्य और स्वतंत्रता के लिए मर मिटनेवालों में अपना नाम अजर-अमर किया। जिस दिन यह भाग्यशाली बालक जनमा वह दिन कौन सा था, इसकी भी इतिहास को जानकारी नहीं। जिस दिन की जयंती मनानी चाहिए उस दिन की स्मृति इतिहास में न हो, यह बात कितनी उद्वेगकारी है! ऐसे दिन राष्ट्र के इतिहास में बहुत 1857 का स्वातंत्र्य समर - 53