१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)
1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअधिक नहीं होते। हिंदुस्थान में गुलामी के गोबर में सड़ते हुए गोबर के कीड़ों को जन्म देनेवाले दिन लाखों उदय या अस्त होते हैं। परंतु अपनी ईश्वरदत्त स्वतंत्रता और स्वराज्य का अपहरण करनेवाले का रक्त-प्राशन करने के लिए तृषित, मानधन नाना साहब को जन्म देनेवाले दिन शताब्दियों में एक-दो ही होंगे। ऐसे अलभ्य दिन की यह अवमानना देखकर परमेश्वर ऐसे अपात्र को फिर से दान नहीं करेगा, इसकी लज्जा महाराष्ट्र, तुझको होनी चाहिए। जिसने तेरे लिए और तेरे सम्मान के लिए रणांगण में अपना रक्त उड़ेला-उसकी जन्मतिथि तुम्हें ज्ञात न हो-और हाय-हाय! उसकी मृत्युतिथि भी तुझे ज्ञात न हो! तेरे स्वाभिमानी पुत्र कब जनमे, यह तुझे ज्ञात न हो और तेरे ही विश्वासघात के कारण कब मरे, यह भी तुझे ज्ञात न हो! इस अक्षम्य कृतघ्नता के लिए तुम्हारे लिए गुलामी की बेड़ियों का दंड ही उचित है! और वही तुम भोग भी रहे हो! यह गुलामी की बेड़ी 8 लाख रुपयों में पहली बार खरीदनेवाले कुल-कलंकी अंतिम रावबाजी पुणे की राजगद्दी से उतरकर भागीरथी के तीर पर इसी समय आए थे। उनके साथ ही महाराष्ट्र से बहुत से परिवार भी आए थे और यह सुनकर कि उन सब परिवारों का योगक्षेम आश्रय में आकर रहने लगे। माधवराव नारायण भी इन्हीं लोगों के साथ सन् 1827 में ब्रह्मवर्त में रावबाजी के आश्रय में रहने सपरिवार चले गए। वहां रावबाजी की माधवराव के पुत्र से उनके बाल-तेज को देखकर रावबाजी इतने चकित हो गए कि कि माधवराव उनके सगोत्री हैं, यह ज्ञात होते ही उन्होंने नाना साहब को 7 जून, 1827 को दत्तक के रूप में ग्रहण कर लिया। उस समय नाना साहब की आयु केवल ढाई वर्ष की थी। इस रतह वेणुग्राम में जनमा यह बालक अपने पूर्वसंचित पुण्य अंध के कारण महाराष्ट्र राज्य के अधिपति की गद्दी का वारिस हो गया। पेशवा की गद्दी का वारिस होना महाभाग्य की बात है। परंतु ऐ तेजस्वी राजकुमार! उस भाग्य के साथ ही आनेवाला उत्तरदायित्व भी तुम्हें समरण है कि नहीं? पेशवाओं की लड़ी हैं। इसने बड़गांव की संधि की और सबसे विषेश महत्त्व की बात यह कि अब पीघ्र ही अपवित्र स्पर्श से इसके भ्रष्ट होने का अवसर आनेवाला है या आ ही गया है, यह सब तुझे मालूम है या नहीं? गद्दी का वारिस होने का अर्थ होता है उसके संरक्षण और सम्मान की रक्षा करना। फिर पेशवाओं की इस गद्दी के सम्मान की रक्षा करेगा या नहीं, या तो विजय का मुकुट इस गद्दी के सिर पर रखना पड़ेगा अन्यथा चितूर की मानिनी की तरह दीप्त चिता में जलना होगा। इसके सिवाए पेशवा की गद्दी का सम्मान तीसरे किसी उपाय से नहीं होगा। हे तेजस्वी राजकुमार! यह दायित्व ध्यान में रखकर तू महाराष्ट्र की गद्दी पर सुख से बैठ। पेशवा की गद्दी षरणागत हुई, यह सुनने का अवसर तेरे बा पके कारण आने 1857 का स्वातंत्र्य समर - 54