भारतकोश
१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished418 पृष्ठ

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इन दो भाई-बहनों की यम द्वितीया के दिन भाईदूज होती थी। सुंदर, सतेज, मनोहारी छबीली हाथ में सोने का दीप लेकर उस तरुण राजकुमार की आरती उतारती थी। सन् 1542 में छबीली का झांसी के महाराज गंगाधर राव साहब से विवाह हुआ और वह झांसी की महारानी लक्ष्मीबाई बनी। महारानी लक्ष्मीबाई झांसी में अपने पति सहित लोकप्रिय हो रही थी। कि सन् 1841 में बाजीराव साहब का देहांत हो गया। बाजीराव साहब की मृत्यु के लिए एक बूंद आंसु भी नहीं बहाना है, क्योंकि सन् 1818 में स्वयं का राज्य बेचकर इस कुल कलंकी ने देसरे राज्य को डुबोने में अंग्रेजों की सहायता की थी। अपनी 5 लाख की पेंशन में से बहुत सारा धन बचाया था। अफगानिस्तान की लड़ाई में जब अंग्रेजों को भेजे। फिर आगे जब पंजाब में सिख राष्ट्र से अंग्रेजों की लड़ाई शुरू हुई तब ब्रह्मावर्त का मराठा मंडल सिखों से मिलकर अंग्रेजों के विरुद्ध उठेगा, ऐसा दिखने लगा; परंतु तभी इस बाजी ने उसे बेरंग कर दियां उसने शिवाजी के इस पेशवा ने अपनी गांठ का व्यय करके एक हजार पैदल और एक हजार शनिवार बाड़ा बचाने के लिए सेना नहीं थी, पर सिखों का बाड़ा अंग्रेजों को सौंपने के लिए भरपूर सेना थी। हाय रे राष्ट्र! मराठे सिखों का राज लेंगे और सिख मराठों का राज्य लेंगे। किस कारण से? इसलिए कि दोनों की छाती पर अंग्रेज नाच सकें। ऐसा बाजीराव मरा, इसके लिए मृत्यु का आभार ही माना जाए। बाजीराव ने मृत्यु-पूर्व ही मृत्युपत्र लिखकर श्रीमंत नाना साहब को पेशवाई के सारे अधिकार और अपने वारिसदारी के सारे हक सौंप दिए थे। परंतु बाजीराव के मरने का समाचार मिलते ही अंग्रेज सरकार ने घोषित किया कि नाना साहब को 5 लाख रूपयों की पेंशन पर किसी भी तरह का अधिकार नहीं है। अंग्रेज सरकार का कुछ प्रतिबिंब उनके द्वारा स्वयं लिखवाए गए पत्र में प्रतिबिंबित हुआ है। वे पूछते हैं-‘हमारे विख्यात राजवंश से आपका यह कृपण व्यवहार पूरी तरह से अन्यायपूर्ण है। हमारा विस्तृत राज्य और राज्य-षासन जब आपको श्रीमंत बाजीराव से प्राप्त हुआ त बवह ऐसे समझौते पर प्राप्त हुआ कि आप उसके मूल्य के रूप में 5 लाख रूपए प्रति वर्श दें। यह पेंशन यदि हमेशा रहनेवाली नहीं है तो उस पेंशन के लिए दिया हुआ राज्य हमेशा आपके पास कैसे रहेगा? उस समझौते की एक षर्त तो तोड़ी जाए और दूसरी बनी रहे, यह अनुचित है।’'18 बाद में ऐसा जो कहा जा रहा था कि आप दत्तक पुत्र हैं, इसलिए आपका हक नहीं बनता, उसके संबंध में साफ-साफ और तर्कसंगत निवेदन करने के बाद श्रीमंत नाना साहब कहते हैं- ‘'श्रीमंत बाजीराव साहब 1857 का स्वातंत्र्य समर – 56 18 नाना साहिब्स क्लेम ईस्ट इंडिया कंपनी' में यह मूल पत्र दिया हुआ है।