१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)
1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंने अपनी पेंशन में मितव्ययिता से कुछ राशि बचाई, इसलिए अब पेंशन चालू रखने का कोई कारण नहीं है, ऐसा यदि कंपनी कहती है तो इस तर्क का सारे इतिहास में उदाहरण मिलना कठिन होगा। यह पेंशन जो दी गई वह समझौते की शर्त के रूप में दी गई उस समझौते में बाजीराव उस पेंशन को किस तरह व्यय करें, उस शर्त में क्या यह भी तय किया गया था? दिए हुए राज्य के लिए यह पेंशन मिलती है। उसे कैसे व्यय करना है, यह कहने का इस जगत् में किसी को तनिक भी अधिकार नहीं है। इतना ही नहीं अपितु श्रीमंत बाजीराव इस पेंशन की सारी-की-सारी राशि यदि ब चाते तो भी वैसा करने में वे पूरी तरह स्वतंत्र थे। कंपनी से मैं यह पूछता हूं कि उनके कर्मचारियों की पेंशन का व्यय किस तरह होता है, क्या इसकी जांच करने का अधिकार उसे है? कोई भी पेंशनभोगी कितना खर्च करता है, क्या बचाता है,? यह स्वयं के नौकरों से भी पूछना संभव है क्या? परंतु जो प्रश्न नौकरों से भी नहीं पूछा जा सकता वह एक विख्यात राजवंश के अधिपति से पूछा जो प्रश्न नौकरों से भी नहीं पूछा जा सकता वह एक विख्यात राजवंश के अधिपति से पूछा जा रहा है।” यह आवेदन लेकर नाना के विश्वासपात्र वकील अजीमुल्ला खान विलायत गए। इस सन् 1857 के क्रांतियुद्ध में जो महत्त्व के पात्र हैं उनमें अजीमुल्ला खान का नाम स्मरणीय है। अजीमुल्ला खान पहले बहुत निर्धन होते हुए भी अपने बुद्धिबल से अपनी उन्नति कर नाना के एकनिष्ठ वकील हो गए थे। वे पहले एक अंग्रेज के यहां घरेलु नौकर थे।¹⁹ उस अति सामान्य नौकरी में भी अपनी महत्त्वाकांक्षा न छोड़ते हुए वहां उन्होंने अंग्रेजी और फ्रेंच भाषा का अच्छा परिचय प्राप्त किया। ये दो भाषाएं अच्छी तरह सीख लेने पर उन्होंने कानपुर के एक स्कूल में षेश अध्ययन किया और थोड़े ही दिनों में वहां की सरकारी पाठषाला में षिक्षक हो गए। उनकी बुद्धिमत्ता की कीर्ति नाना साहब के कानों में पड़ते ही उन्होंने उन्हें अपने दरबार में रख लिया। सन् 1854 में अजीमुल्ला खान इंग्लैंड गए। अंग्रेजी रीति-रिवाजों की संपूर्ण जानकारी होने से लंदन के लोगों में वे बहुत प्रिय हो गए। अपनी आकर्षक और मीठी वाणी, अपने षारीरिक तेज एवं अपनी असीम उदारता के कारण अजीमुल्ला अनेक अंग्रेजी ललनाओं के गले का हार बन गए। लंदन के सार्वजनिक बगीचों में या ब्राइटन के समुद्री किनारे पर रत्न जड़ित पोषाक में इस ‘भारतीय राजा’ को देखने आंग्ल नर-नारियों की भीड़ इकट्ठी होती थी। कुछ अंग्रेज युवतियां तो अजीमुल्ला पर इतनी लट्टू हो गई थी कि उनके वापस हिंदुस्थान आ जाने पर भी उन्हें अत्यंत आदर और प्रेम की भाषा में लिखे उनके प्रेमपत्र आते थे। हैवलॉक की सेना ने जब ब्रह्मवर्त जीता तब उसे इंग्लैंड की अनेक भद्र महिलाओं द्वारा अपने ‘प्रिय अजीमुल्ला खान’ को भेजे पत्र देखने को मिले। अजीमुल्ला खान के प्रति महिलाओं के मन आकर्षित हो गए थे तो भी ईस्ट इंडिया कंपनी का मन उसकी ओर 1857 का स्वातंत्र्य समर – 57 ¹⁹ थॉमसन कृत-‘कानपुर’।