भारतकोश
१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

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आकर्षित न हुआ और उसने अनेक दिन चक्कर लगवाकर उन्हें साफ जवाब दिया कि 'गर्वंनर जनरल द्वारा किया गया फैसला हमको पूरी तरह मान्य है और इसलिए बाजीराव के दत्तक का उनकी पेंशन पर किसी तरह का अधिकार शेष नहीं रहता।' इस तरह मुख्य कार्य के संबंध में निराश हो जाने पर अजीमुल्ला खान इंग्लैंड छोड़कर हिंदुस्थान की ओर आने के लिए फ्रांस के रास्ते निकले। हम उन्हें यात्रा में ही छोड़कर यह देखें कि नाना साहब उस समय क्या कर रहे थे? श्रीमंत नाना साहब पेशवा के जीवन की विस्तृत जानकारी प्रकाशित करने का सुअवसर महाराष्ट्र के इतिहास के भाग्य में है क्या? वह अवसर जब आएगा तब आएगा, पर अभी उनके संबंध में जो भी जानकारी मिली है, यद्यपि वह उनके शत्रुओं की ओर से ही प्राप्त हुई है तब भी उसका संकलन करके रखना बुरा न होगा। श्रीमंत के बचपन की थोड़ी-बहुत जानकारी ऊपर दी जा चुकी है। ब्रह्मवर्त एक छोटा सा परंतु ठाठदार नगर था। नगर से लगा हुआ भागीरथी का पाट था। सुंदर घाट, अनेक देवालय और नाना भूषणों से मंडित वहां आनेवाले नर-नारियों के समूह की शोभा से वह बह्मवर्त नगर और वह भागीरथी का पाट बहुत सुंदर लगता था। श्रीमंत का बाड़ा बहुत विस्तीर्ण और उत्तम साज-सामान से सुशोभित था। अलग-अलग रंग की मूल्यवान दरियों और गलीचों से उस बाड़े के दीवानखाने सजे हुए थे। यूरोपियन कारगरी का भिन्न-भिन्न रंगो में कांच का सामान, मोमबत्तियों के बड़े-बड़ें दर्पण, हाथी दांत और सोने से निर्मित रत्नजड़ित नक्काशी के काम, संक्षेप में हिंदुस्थान के राजमहलों में दिखनेवाली सब प्रकार की कमनीयता श्रीमंत के उस दीवानखाने में दिखती थी।²⁰ घोड़ों और ऊंटों के सारे उढ़ावन चांदी के होते थे। श्रीमंत को घोड़ों का बहुत शोक था और उत्तर हिंदुस्थान में उनकी अश्वविद्या की बड़ी धूम थी। उनकी घुड़सवार उत्तम और होशियार घोड़ों से हमेशा भरी रहती थी। अलग-अलग जाति के हिरन, शिकारी घोड़ों से हमेशा भरी रहती थी। अलग-अलग जाति के हिरन, शिकारी कुत्ते, सांभर, ऊंट एवं हिंदुस्थान के सब तरह के जानवर पालने में उनकी बहुत रूचि थी। परंतु इन सब वस्तुओं की तुलना में श्रीमंत का शस्त्रागार बहुत उत्तम था। उसमें अलग-अलग तरह के शस्त्र, तेज धारवाली तलवारें, एकदम नई बंदूकें और सब तरह की तोपें बहुत थी। श्रीमंत स्वभाव से स्वाभिमानी थे। हम एक बड़े राजवंश के अंगभूत हैं और उस महान् और प्रथित वंश को सोहे, ऐसा जीवन की सकें तो जीना है, अन्यथा पूरी तरह नामशेष हो जाता ही अच्छा, यह उनका निश्चय था। अपने आभिजात्य और कुल की महानता का उनके द्वारा भेजे गए आवेदन में बार-बार साभिमान उल्लेख हुआ है। मराठों के विस्तृत साम्राज्य का अधिपति होते हुए भी पेंशन के लिए दूसरों के दरवाजे पर निवेदन करने की

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²⁰ थॉमसन कृत-'कानपुर' में कानपुर के कत्लेआम में से जो दो व्यक्ति बचे हुए थे, थॉमसन उन्हीं में एक थे, अतः उपर्युक्त पुस्तक का किंचित् महत्त्व है।

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