भारतकोश
१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

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मजबूरी का उनको बहुत दुःख होता था। ‘संभावितस्य चाकीर्तिर्मरणादतिरिच्यते’ के अनुसार अकीर्ति की अपेक्षा मृत्यु का आलिंगन करनेवालों में से वे थे। उनका स्वभाव राजा जैसा उदार और शूरों जैसा स्वाभिमानी था। कभी-कभी कानपुर की सेना के यूरोपीय अधिकारियों को वे पार्टियां देते थे; परंतु उनके निमंत्रण को वे कभी स्वीकार नहीं करते थे, क्योंकि उनकी पात्रता के अनुसार तोपों की सलामी देना कंपनी को स्वीकार न था। 21 वे अपने प्रदेश के लोगों से बहुत स्नेह करते थे। उनका स्वभाव गंभीर और रहन-सहन बहुत सादा था। किसी तरह के दुर्व्यसन का उन्हें रत्ती भर भी शौक नहीं था। उनका कई बार निरीक्षण कर चुके एक सज्जन लिखते हैं- “मैंने जब उन्हें देखा, उस समय उनकी आयु लगभग अट्ठाईस वर्ष होगी; पर वे चालीस के आसपास के दिखते थे। शरीर उनका स्थूल था, चेहरा गोल, आंखें उग्र, पानीदार और चंचल, कद-काठी सामान्य, स्पेनिश लोगों जैसा गोरा रंग और बातचीत कुल मिलाकर आनंदी और कुछ विनोदी थी। दरबार में वे किनखाबी पोशाक पहनकर बैठते थे।” उनके शरीर पर पहने अलंकार और उनके सिर के अत्यंत मूल्यवान मुकुट को देख यूरोपियन महिलाएं ललचा जाती थीं-ऐसा ट्रेवेलियन लिखता है। नाना का व्यवहार भी इस भव्यता को शोभा देने योग्य उदार और दयालु था। वे स्वयं की प्रजा पर कृपा करते थे, इसमें तो कोई आश्चर्य ही नहीं; परंतु जिन्होंने उनसे बेईमानी कर उनके जीवन का सत्यानाश किया, उन अंग्रेज लोगों पर भी वे हमेशा कृपा करते रहते थे। कितने ही अंग्रेज युवा दंपतियों को हवाखोरी करने की इच्छा होने पर महाराज की बग्घी उनके लिए भेज दी जाती थी। कितने ही अवसरों पर महाराज के घर अंग्रेज अधिकारी तथा अन्य लोग अपनी मैडमों के साथ बुलाए जाते और उत्तम शोलें, मूल्यवान मोती, रत्न आदि वस्तुएं उनको उपहारस्वरूप दी जाती। व्यक्ति के लिए द्वेष उनकी उदार आत्मा को कलुषित नहीं करता था, यह इससे अच्छी तरह सिद्ध होता है। राष्ट्रयुद्ध में जिनकी दे हके टुकड़े-टुकड़े करना है उन्हीं प्रतिस्पर्धियों को अन्य अवसरों पर उपकृत करना, यह वीरता की उच्च कल्पना हिंदुस्थान के काव्य और इतिहास में हर क्षण दृष्टिगोचर होती आई है। राजपूत वीर अपने कट्टर शत्रु से भी युद्ध-अवसर को छोड़ ऐसी ही उदारता से व्यवहार करते थे। श्रीमंत नाना अपनी उदारता के कारण उस समय के अंग्रेजों के बहुत प्यारे हो गए थे, यह बात ध्यान में रखनी चाहिए। श्रीमंत नाना के आतिथ्य- 1857 का स्वातंत्र्य समर - 59 21 1. थॉमसन कृत-'कानपुर', पृष्ठ 48। 2. सर जॉन के कहता है-"A quiet unostentatious young man not at all addicted to any extravagant habits." 3. चार्ल्स बाल कृत-'द हिस्ट्री ऑफ इंडियन म्युटिनी', खंड 1. पृष्ठ 305। 4.ट्रेवेलियन कृत-'कानपुर', पृष्ठ 68-69। 5. “नाना साहब हमारे देशवासियों के साथ संपर्क होने पर सदैव जिस सत्यता का व्यवहार करते थे वह अवर्णनीय है। अधिकारियों को उनकी मैत्री और सरलता पर पूर्ण विश्वास और भरोसा था। पदाधिकारी भी उन्हें 'महान् पुरुष' कहकर ही संबोधित करते थे।” -ट्रेवेलियन कृत- 'कानुपर'