१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)
1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसब इस प्रश्न की यथायोग्य चर्चा करेंगे और इस चर्चा को शांति से सुन कानपुर के कुएं पर बैठे गिद्ध इस प्रश्न का निश्चित उत्तर देंगे कि यह न्याय था या अन्याय। नाना के घर ऐसे विशाल समारोह की तैयारी शुरू है तो उधर उनकी बहना छबीली भी शांत नहीं बैठी है। उसके भी सामने ‘न्याय या अन्याय', यही प्रश्न आ पड़ा है। सन् 1853 में उसके पति अचानक परलोक सिधार गए और उसके दत्तक प्रिय पुत्र दोमादर को उत्तराधिकारी के अधिकार न देते हुए अंग्रेज सरकार ने झांसी अधिगृहीत कर ली। परंतु ऐसी चिट्ठी-पत्री से अधिगृहीत होनेवाली वह रियासत नहीं थी। उस झांसी की रियासत पर नागपुर की बांका का राज्य नहीं था, वहां तो नाना की 'छबीली' बहन महारानी लक्ष्मीबाई राज्य कर रही थी। वह ऐसे अधिग्रहण की क्या परवाह करे! अंग्रेजों का यह कुटिल और जल्लादी कृत्य देखकर दुःख, अपमान, मानभंग के बादलों की गड़गड़ाहट होने लगी और उनमें से झांसी की उस चपला ने कड़कड़ाहट की—"अपनी झांसी मैं नहीं दूंगी।'”23 अपनी झांसी मैं नहीं दूंगी-जिसमें हिम्मत हो वह लेकर देखे! 1857 का स्वातंत्र्य समर – 61 23 डलहौजीज एडमिनिस्ट्रेशन', खंड 2।