१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)
1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रकरण-4 अवध मानव जाति के दुर्भाग्य से इस जग में चोर को छोड़ संन्यासी को फांसी देने का न्याय हमेशा होता आया है। पर राजनीति के क्षेत्र में तो यह खुल्लम-खुल्ला किया जाता है। जुल्म और अन्याय दोनों भाववाचक कल्पनाएं मानवीय मन को स्वीकार नहीं होती, अतः उनके कारण होनेवाले त्रास का प्रतिशोध लेने के लिए जब वह झल्लाकर बाहर निकल पड़ता है तब यह नहीं देखता कि उस जुल्म और अन्याय की जड़ में कौन है और जो सामने पड़ जाता है उसी गरीब को मारने लगता है। इस उतावली में जो अन्याय की जड़ या आत्मा है उसे भुला दिया जाता है। इस घालमेल के कारण कोई बड़ी हानिन यदि नहीं होती है तो उस उपेक्षा को क्षमा किया जा सकता है। परंतु सच में देखा जाए तो इस घालमेल के परिणाम बहुत भयंकर होते हैं। चोरों को मारने के लिए बनाए गए फंदे संन्यासियों को मारने में खप जाते हैं और उधर चोर के सुरक्षित बच जाने से चोरी की घटनाएं पहले से भी अधिक होने लगती हैं। लेकिन इस फांसी पर संन्यासी के बदले यदि एकाध चोर को भी चढ़ा दिया गया तो भी उस चोरी का सारा क्रोध उस एक ही चोर पर उतार दिए जाने से बाकी के चोर निर्भय होकर-'पुनष्चः हरिः ओम्' करने को तैयार हो सकते हैं। विषवृक्ष का वास्तविक नाश उसकी शाखाएं और पत्तियां तोड़ते रहने से नहीं हो सकता-वह तो तब होगा जब उन शाखाओं और पत्तों को बार-बार आगे धकेलती हुई और उनका पोषण करती हुई उस वृक्ष की जड़ें खोदकर उनका सर्वनाश किया जाए। 1857 का स्वातंत्र्य समर – 62