भारतकोश
१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished418 पृष्ठ

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सन् 1857 के क्रांतियुद्ध की पवित्रता और महानता इसी सत्य ज्ञान में और उसके लिए किए गए प्राणदान में है। जिन्हें डलहौजी ही सारे अत्याचारों का मुख्य कारण लगता है उन्हें इस युद्ध की वास्तविक महानता ज्ञात नहीं होगी। ऐसे अज्ञानी व्यक्तियों को यदि सत्य ज्ञात करने की इच्छा हो तो विशेषतः अवध का राज्य किसने अधिग्रहण किया, यह देखें और क्यों अधिगृहीत हुआ, यह समझ लें। अवध का वह विस्तृत और संपन्न राज्य डलहौजी के पहले एक शताब्दी तक अधिग्रहण होता रहा था। अवध के नवाब ने जब से अंग्रेजों से रिश्ते बनाए तब से उसके राज्य का एक-एक टुकड़ा अंग्रेजों की ओर जाने लगा था। सन् 1801 में एक समझौता वजीर के सिर पर जबरन लादा गया, उसमें यह अपहरण की इच्छा पूरी निर्लज्जता से प्रदर्शित की गई थी। नवाब वजीर उस समय पहले से ही कंपनी की सहयोगी सेना के लिए प्रतिवर्ष 75 लाख रूपये दे रहा था। कंपनी की इस डकैती से नवाब का खजाना कठिनाई में आ गया थां पर अंग्रेजों ने जबरन यह मांग की कि नवाब अपनी सेना हटाकर उसके स्थान पर कंपनी की सेना रखे। इस सेना का खर्च उठाने की शक्ति नवाब के खजाने में नहीं है, यह अंग्रेज अच्छी तरह से जानत थे; बल्कि यह जानकारी थी, इसीलिए उन्होंने यह मांग की थी। नवाब के पास खजाना नहीं था, किंतु प्रदेश था, अंत में उसमें से एक उपजाऊ टुकड़ा तोड़कर नवाब ने अंग्रेजों को दिया और नाहीं-नाहीं कहते भी नवाब के सिर यह संक्षक सेना बैठ ही गई। इस सन् 1801 के समझौते की तीसरी धारा का अर्थ था-“नवाब अपने प्रदेश की व्यवस्था से प्रजा को सुखकर करे और हर काम में वह कंपनी के अधिकारियों से सलाह-मशवरा करे।” अब यह प्रजा को सुखकर व्यवस्था कैसे रखनी है। यदि नवाब कोई सुधार करने की इच्छा करे तो उसकी इच्छा के विरूद्ध कंपनी उस पर गुर्राए।²⁴ फिर भी आग्रह था कि प्रजा के लिए सुखकर व्यवस्था की जाए । नवाब का खजाना बार-बार डकैती डालकर खाली किया जाता और उस पर नई मांग भी रखी जाती और इस डकैती की पूर्ति के लिए जब नवाब को कर लादने की विवशता होती तो कंपनी कहती कि प्रजा को सुखकर व्यवस्था होनी चाहिए। नवाब को जब इस तरह स्वयं के राज्य में सुधार करना असंभव हो जाए और प्रजा विद्रोह कर राज्य में सुधार का प्रयास करे तो उसका बंदोबस्त करने अंग्रेजी बैनेट और संरक्षक सेना की तलवारें प्रजा की गरदन पर रख उसे हूं-चूं भी नहीं करने देगा-इस प्रकार कंपनी का आग्रह बना ही रहता कि प्रजा के लिए सुखकर व्यवस्था की जाए! इस तरह 1857 का स्वातंत्र्य समर – 64 ²⁴ 1.‘डलहौजीज एडमिनिस्ट्रेशन’, पृष्ठ 348-349। 2. सर जॉन के ने कहा है-‘सत्यता यह है कि यह एक ऐसी त्रुटियुक्त प्रणाली थी जिसकी जितनी अधिक भर्त्सना की जाए, कम ही है। इस प्रकार उसने निकृष्ट श्रेणी का द्वैध शासन आरंभ कर दिया था। राजनीतिक और सैनिक सत्ता तो कंपनी के हाथों में थी, किंतु अवध का आंतरिक शासन अभी भी नवाब, वजीरों के हाथ में था।’