भारतकोश
१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished418 पृष्ठ

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एक ओर नवाबों और जनता को राज्य व्यवस्था सुखकर करना पूरी तरह असंभव बनाकर देसरी ओर कंपनी कहती कि राज्य व्यवस्था सुखकर करनी ही होगी। यह स्थिति कुछ ऐसी ही थी कि कोई अत्याचारी बाप बच्चे को जोर से पीटता जाए और कहे-चुप रह, खबरदार जो रोएगा तो! इसमें फर्क इतना ही है कि वह बाप ऐसा मूर्खतापूर्ण कार्य कम-से-कम सद्हेतु से तो करता है! परंतु कंपनी नवाब का मुंह बांधकर जो पिटाई कर रही थी वह तो केवल उसका गला दबाकर प्राण लेने के लिए ही थी। यह प्राणघात जितनी जल्दी और जितनी सुलभता से हो, करने के लिये अंग्रेजों ने हजारों अड़चनें और हजारों तिकड़में भिड़ाईं-उन सबका वर्णन स्थानाभाव के कारण संभव नहीं। फिर भी उदाहरण के लिए एक अत्यंत नीच तिकड़म दिए बिना रहा नहीं जाता। वह तिकड़म थी, सन् 1837 में लॉर्ड ऑकलैंड द्वारा नवाब से किया हुआ समझौता कुछ ही वर्षों बाद साफतौर पर अस्वीकार करना। यह समझौता होते ही इंग्लैंड उसे भूल गया हो, ऐसा नहीं क्योंकि सन् 1847 में लॉर्ड हार्डिगटन ने उस समझौते को माना था। कर्नल सलीम ने सन् 1841 में वही समझौता माना था।|25 सन् 1853 में हिंदुस्थान में चालू समझौते की सूची में भी वह सन् 1837 का समझौता लिखा हुआ था। पर सन् 1853 में जो समझौता इंग्लैंड की स्मृति में था वह समझौता उसी वर्ष वास्तविकता समय आने पर इंग्लैंड एकदम भूल गया। सन् 1837 के उस समझौते के अनुसार वह रियासत अधिग्रहण करना संभव नहीं था, यह देखते ही एक घंटे पहले तक मान्य किया हुआ और चालू समझौतों की सूची में लिखकर भेजा हुआ समझौता हिंदुस्थान सरकार साफ अस्वीकार करने लगी। ऐसा कोई समझौता हुआ ही नहीं था, ऐसा धड़ल्ले से कहते समय अंग्रेज सरकार लज्जित कैसे नहीं हुई-हिंदुस्थान का अंग्रेजी इतिहास जिसने थोड़ा-बहुत भी पढ़ा है, उसे इस पर बहुत आश्चर्य नहीं होगा। चूंकि अंग्रेज सरकार को अवध का राज्य चाहिए था, अतः वह राज्य हड़पने के लिए सन् 1837 के समझौते की अपेक्षा 1801 का समझौता उसके लिए अधिक लाभदायक था। ये सारी तिकड़में डलहौजी के पहले ही हो चुकी थी, इतना अवश्य ध्यान में रखना चाहिए, जिससे यह स्पष्ट हो जाएगा कि डलहौजी ने अवध के अधिग्रहण करने में कुछ अपूर्व पातक नहीं किया। अवध का प्रदेश सबको चाहिए था, पर उसको कैसे हथियाया जाए, इसका निर्णय डलहौजी के हाथ में हुआ। पंजाब की तरह या ब्रह्मदेश की तरह उसपर चढ़ाई कर उसे जीता नहीं जा सकता था; क्योंकि वहां के लोगों ने कभी ब्रिटिशों से झगड़ा नहीं किया था। नवाब ने उनसे कभी प्रेम से व्यवहार नहीं किया, ऐसा आरोप लगाना भी संभव नहीं था; क्योंकि आज तक हर कठिन अवसर पर नवाब ने अंग्रेजों की सहायता की थी। जब अंग्रेजों की सहायता की थी। जब अंग्रेजों की सहायता की थी। जब अंग्रेजों की जेब में पैसा नहीं था तब नवाब ने उन्हें 1857 का स्वातंत्र्य समर - 65 25 डलहौजीज एडमिनिस्ट्रेशन', खंड 2, पृष्ठ 52