भारतकोश
१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

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प्रकरण-5 धकेलो उसमें ˙ ˙ ˙ ˙ अब इच्छित राष्ट्रकार्य की तिथि पास आती जा रही है, अतः ऐसे समय इष्ट सिद्धि के लिए कुल देवताओं की कृपा प्राप्त करनी ही चाहिए। इस प्रचंड राष्ट्र-विक्षोभ के कुलदेव की प्रसन्नता ही प्रतिशोध है। इसे प्रसन्न किए बिना और अपनी सहायता के लिए आने को बाध्य करने के सिवाए सन् 1857 में लिये गए संकल्प की सिद्धि नहीं होगी। इसलिए हवनकुंड को प्रदीप्त करो और उसमें इतनी दिव्य हवन सामग्री डालो कि मुख्य कुलदेव चैतन्य होकर प्रकट हो ही जाएं। इंद्रजित् के प्रचंड यज्ञ से अजेय रथा बाहर निकलने तक जैसे हवनों का धूम-धड़ाका उड़ाया गया वैसे ही इस यज्ञ से जब तक मूर्तिमंत प्रतिशोध अपनी सहस्र जिह्वाएं सहस्र दांतों से युक्त होकर आविर्भूत न हो तब तक हवनकुंड में हवन करते ही जाना है। इंद्रजित् के समय वानर उस यज्ञ को भंग करने के लिए प्रयासरत थे। परंतु सौभाग्य से इस राष्ट्र-यज्ञ में सहायता करने के लिए अंग्रेज स्वयं ही उतावले हो रहे हैं। फिर विलंब क्यों? कोप की अग्नि भभक रही है और उसकी सातों जीभें लपलपाती हुई उछल रही हैं। फिर विलंब क्यों? चलो, आहुति डालना प्रारंभ करो! पंजाब के इतिहास-प्रसिद्ध राजा, कोहिनूर के तेज से दीप्तिमान उस शूरवीर से पहले आहूति दान का सम्मान पाने योग्य दूसरा कौन होगा! इसलिए चल, आ जा रे डलहौजी! उस कोहिनूर को उसके वास्तविक मालिक के छीनकर ले आ। पंजाब की स्वतंत्रता का खून हुआ है-यह उस राष्ट्र-क्षोभ के कुलदेव को सूचित करने के लिए 1857 का स्वातंत्र्य समर -68