भारतकोश
१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished418 पृष्ठ

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वह अग्नि चेत गई है। इस कोहिनूर को फेंक दो उसमें! इस ब्रह्मदेश को दूसरा सम्मान मिलना उचित है, इसलिए चल आ, रे डलहौजी! उस ब्रह्मदेश को उसके वास्तविक मालिक से छीनकर ले आ। अग्नि चेत गई है तो इष्ट सिद्धि के लिए इस ब्रह्मदेश को धकेलो उसमें! सतारा के शिवाजी की गद्दी कहां है? उसका मान तीसरे हवन का है। इसलिए उस पर बैठे राजाओं को श्मशान में बैठने को कहकर वह गद्दी, अंग्रेजी जाओ और जल्दी ले आओ! यह अग्नि भभक रही है, इसलिए मराठों की ओर से सतारा की इस राजगद्दी को धकेलो उसमें! इस चौथे हवन को केवल नागपुर की गद्दी कैसे पूरी पड़ेगी! तदर्थ उस गद्दी के साथ ही नागपुर के सारे भवन, हाथी-घोड़े, राजा-रानियां, रानियां के अलंकार, आक्रोश, चिल्लाहट-जो भी मिले वह सब जल्दी जाओ! यह अग्नि भभक रही है, इसलिए पूरा नागपुर धकेल दो उसमें! अब हवनकुंड सच में जाज्वल्य दिखने लगा है। ऐसे समय उतनी ही जाज्वल्य हवि चाहिए। पर ऐसी आग से भी तेजस्विनी हवि ब्रह्मावर्त के मुकुट को उसमें धकेलो! राष्ट्र-क्षोभ के न्याय देव! 'प्रतिशोध' को प्रसन्न करने के लिए नई हवि ऐसी चुनो कि बस! यह मान उसी का। इस नीति होत्र की ज्वाला आकाश छूने लगे, इसलिए यह झांसी की बिजली धकेलो उसमें! देखो, देखो, इस दिव्य हवनकुंड से सारे पापी दुर्योधनों के शरीर कांपने लगे हैं, इसलिए प्रतिशोध का सिर ऊपर दिखने लगा है। ऐसे समय आविर्भूत होने को तत्पर उस देवता को पूर्ण संतुष्ट करने के लिए हवनों का आक्रमण होना चाहिए। इसलिए चलो, ये हैं अर्काट के नवाब, धकेलो इन्हें! तंजावुर की गद्दी, धकेलो उसमें! अंगूल के राजा, धकेलो उसमें! सिक्कत के भाग, धकेलो उसमें! संबलपुर के राज्य, धकेलो उसमें! खैरपुर के अमीर, धकेलो उसमें! ऐसे रूपए और चिल्लर कितने गल गए, इसकी कोई गिनती नहीं! इसलिए ऐसे हविर्दान कौन गिने! अत्यंत पुष्ट और पूरी तरह निरपराध बलि लखनऊ के नवाब के अतिरिक्त मिलना कठिन है, इसलिए लखनऊ के नवाब को धकेलो उसमें! अहा-हा! इस अग्नि-कल्लोल से ऊपर निकलते देवता की यह कैसी उग्रता! इस प्रतिशोध के भयानक जबड़े में सारा जगत् ही पिस जाएगा। परंतु उस जबड़े की धार जब तक अधिक तेज न हो जाए तब तक ठहरना उपयोगी नहीं। इसलिए दिल्ली के 1857 का स्वातंत्र्य समर – 69

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