भारतकोश
१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished418 पृष्ठ

पृष्ठ 66, कुल 418 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 66

राजमहलों को ताले लगा और वहां के मयुरासन पर बैठनेवाले अकबर के वंशज को खींचकर धकेलो उसमें! अवध प्रांत के बड़े-बड़े तालुकेदार²⁶ क्या कर रहे हैं? उनकी सारी जमीनें और उनके सारे हक छीनकर उन्हें जंगली पशुओं जैसा घेरकर लाओ इधर! वैसे ही बंबई प्रात के (इनाम कमीशन आदि के द्वारा) हजारों हकदारों के हक फेंक-फांककर उन्हें भी लाओ इधर! हवनकुंड प्रज्वलित हैं। इसलिए जमींदार, जागीरदार, तालुकेदार, वतनदार आदि सारे दारों को कंगाल कर धकेलो उसमें! राजा, महाराजा, बादशाह, प्रधान, नवाब, वजीर जैसी उत्तम हवियां इस हवन कुंड में पड़ें और हमारे राष्ट्र-क्षोभ 'कुलदेव' को प्रसन्न करें! हमारी यह वर्तमान दुर्दशा और गुलामी देखकर हमारे पूर्वजों की आंखों से बहनेवाले आंसु उस देवता को अच्छी तरह स्नान करावें। सतारा की गद्दी के टुकड़े देखकर गुस्से में भरे शिवाजी उस देवता को चैतन्य करें। अवध के राजमहल की बेगमों के कष्ट और नागपुर के महलों में अपमान के कारण मरी हुई अन्नपूर्णाबाई की आत्मा हमारे उस राष्ट्रीय प्रतिशोध को चेताए। हे प्रतिशोध! जग के न्याय! तलवार की धार पर तू चढ़ता है तो तू देवों को भी वंदनीय और ऋषियों को भी स्तुत्य हो जाता है। सज्जन रक्षक प्रतिशोध! तेरा डर न हो तो अन्याय का कलि इस दुनिया पर निरकुंश होकर नाचने लगे। हे प्रतिशोध! तेरी उग्रता से ही कंपित होकर पापियों को पुण्यवान् होकर नाचने लगे। हे प्रतिशोध ! तेरी उग्रता से ही कंपित होकर पापियों को पुण्यवान् होना पड़ता है। तू ही रावण का राम था, तू ही दुर्योधन का भीम था, तू ही हिरण्यकशिपु का नृसिंह था। उनके समय में तुम्हें प्रसन्न करने के लिए जितना हविर्दान नहीं हुआ थ उतना इस प्रचंड हवनकुंड में लगा हुआ है। एतदर्थ, जग से अन्याय और अंधेर समाप्त हो, परवशता और परदासता मिट जाए, 1857 का स्वातंत्र्य समर – 70 ²⁶ अवध के राज्य को अधिगृहीत करने के बाद वहां के अत्यंत कुलीन, प्रभावशाली और प्रमुख लोगों की जो दुर्दशा हुई वर्णन बहुत भयंकर है। वंश परंपरा से प्राप्त जमीनें और वतन एक क्षण में नष्ट हो गए। इन अभागे तालुकेदारों के लिए 'के' लिखता है–"The charges against him were many and great for he had diverse ordeals to pass through and he seldom survived them all....When the claims of a great talukdar could not be altogether ignored, it was declared that he was a rougue or a fool.... They gave him a bad name and straightway they went out to ruin him!....It was at once a cruel wrong and a grave error to sweep it away as though it were an encumbrance and an usurpation." जो व्यवस्था नवाब नहीं कर सहते थे उस राज्य की ऐसी व्यवस्था करने पर सारे जमींदारों को कंपनी ने जल्दी ही बेरहम मार लगाई, यह आगे वर्णित है। इनाम कमीशन जो नियुक्त किया उसने तो विकट कहर ढाया। अंग्रेजों को जैसे बड़े-बड़े राजा नहीं चाहिए थे वैसे ही रिसजोर जमींदार भी नहीं चाहिए थे। जो जमीनें और जागीरें तलवार के जोर पर प्राप्त की थीं उनके कागज नहीं थे, इसलिए उन्हें एक सिरे से अधिगृहीत किया गया। कम-से-कम पैंतीस हजार 'वतन' और बड़ी जागीरें छानबीन के लिए निकाली और उनमें से केवल पांच वर्ष में तीन पंचमाश समाप्त कर दीं।