भारतकोश
१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

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स्वतंत्रता और स्वराज्य की जय-जयकार हो, ऐसी परमेश्वर की इच्छा हो तो तू इस यज्ञ से मर्तिमंत हो प्रकट होना। धन्य-धन्य!! ‘मृत्यु सर्वहरश्चाहम्’—ऐसी गर्जना करते यह मर्तिमंत राष्ट्र-क्षोभ ऊपर आ रहा है। इस भयंकर गर्ति को शतशः प्रणाम है। जिसके भयंकर जबड़ों में उन्मत्त राज; पिस जाते हैं, जिसके हाथ के घन से निरपराध देशों के पैरों में पड़ी दासता की बेड़ियां तड़ाक से टूट जाती हैं, जिसके नेत्रों से निकलनेवाली ज्वालाएं अत्याचारों की काली कोठरियों को जलाकर भस्म करती हैं और जिसकी लपलपाती तप्त जिह्वा हजारों दुःशासनों का रक्त गटागट पीती है उस भयंकर, उग्र एवं भयानक राष्ट्रीय प्रतिशोध को शतशः प्रणाम— वक्त्राणि ते त्वरमाणा विशन्ति दंष्ट्राकरालानि भयानकानि। केचिद्विलग्ना दशनान्तरेषु संदृश्यन्ते चूर्णितैरुत्तमाङ् गैः हे हिंदभूमि! अंततः इस महायज्ञ से तेरा ‘प्रतिशोध’ सभी में मर्तिमंत रीति से प्रादुर्भूत हो गया। पर वह क्या-क्या करने से शांत होकर संपूर्ण रूप से अंतर्धान होगा, क्या यह भी तुझे ज्ञात है? 1857 का स्वातंत्र्य समर – 71