भारतकोश
१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

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धर्म के लिए हिंदुस्थान का राज्य होने से निकलने देने की गलती उसने नहीं की। इच्छा नहीं थी, ऐसा नहीं, पर हिम्मत नहीं थी। फिर भी, बड़े-बड़े नाम देकर और अपना मूल हेतु छिपाते हुए सती प्रथा प्रतिबंध, विधवा विवाह को समर्थन, दत्तक पुत्राधिकार की समाप्ति आदि अवसरों पर हिंदुस्थान की धर्म-आस्थाओं में परिवर्तन करने क प्रयास उन्होंने प्रारंभ कर ही दिया था। मिशनरियों के तहत चलनेवाले स्कूलों को सरकारी धन की सहायता बिना रुके मिल रही थी। बड़े-बड़े आर्कबिशपों के वेतन बड़े-बड़े सरकारी अधिकारियों द्वारा हिंदुस्थान की जनता को निचोड़कर जमा किए गए धन से दिए जाते थे। ये अधिकारी अपने अधीनस्थ लोगों को अपने पवित्र धर्म को त्यागकर ईसाई होने का उपदेश करते । सरकारी कागजों में हिंदुस्थान के लोगों का उल्लेख 'Heathen' षब्द से किया जाता। अंग्रेजी कर्मचारियों का अधिकतर समय आसमानी बाप का शुभ चरित सुनाने में ही जाता था। सेना में जो अंग्रेज घुसते थे उनमें से कितने ही केवल अधिकार के बल पर भारतीय धर्म की खिल्ली उड़ाने के लिए ही घुसते थे। शांति काल में सेना के लोगों को कोई काम न होता था, अतः उस समय हिंदू और मुसलमान सिपाहियों को यीशू का चरित सुनाने को विपुल समय मिलने से लश्करी विभाग में यत्र-तत्र इन मिशनरी कर्नलों और सेनापतियों की आवाजाही बढ़ गई थी। जिस 'रामचन्द्र' के पवित्र नामोच्चार से हर हिंदू के हृदय में भक्तिभाव उमड़ पड़ता है और जिस 'मोहम्मद- के नाम से सारे मुसलमानों की रग-रग से प्रेम झलक पडऋता है उस रामचंद्र के और उस मोहम्मद के नाम को वे पादरी कर्नल गालियां बकते। उठते-बैठते भारतीय सिपाहियों को अधिकार के जोर से चुप बैठाकर वे उनके सामने उनके प्राणप्रिय वेदों और कुरान की डटकर निंदा करते थे। इन मानवी राक्षसों का यह उद्योग किस तरह निरंतर चल रहा था और इस कार्य का उन्हें कितना अभिमान था, इसका स्वरूप स्पश्ट करने के लिए एक व्यक्ति से संबंधित उदाहरण देना आवश्यक है। सारे धर्मों का जनक आर्य धर्म तथा ईसाइयत की गरदन पर छुरी रखकर आगे बढ़ा हुआ मोहम्मदी धर्म, इन दोनों धर्मों को और उनके अनुयायियों को अपने टुटपुंजिया शुभ चरति से ठगना चाहनेवाले इन पादरी सेनापतियों में से बंगाल पैदल रेजीमेंट का एक कमांडर बड़े घमंड से कहता है-'मैं गत बीस वर्षों से यह शुभ चरित का कार्य निरंतर कर रहा हूं। इन काफिर लोगों की आत्मा को शैतान से बचाना एक फौजी कर्तव्य ही है।' हिंदुस्थान कके धन पर मोटे हुए ये पादरी वीर एक हाथ में लश्करी आदेशों की पुस्तक और दूसरे हाथ में बाइबिल लेकर इस देश के सिपाहियों को धर्मच्युत करने का प्रयास दिन-रात करते रहते थे। इतना ही नहीं अपितु उस प्रयास में जल्दी सफलता मिले, इसके लिए धर्मांतरण करनेवाले सिपाही को पदोन्नति का खुला वचन देते थे। सिपाही अपना धर्म छोड़े तो हवलदार हो जाता था और हवलदार-सूबेदार, मेजर। इस प्रकार सेना विभाग एक तरह से बलात् ईसाई बनाने का मिशन हो जाता था। हिंदुस्थान के धन से मुटाए हाथ और हिंदुस्थानी पैसे से खरीदी गई तलवार से हिंदुस्तानी धर्म को ही चोट पहुंचाने के अंग्रेजों के इस हेतु के विरूद्ध संशय उत्पन्न हुआ और उसमें हर रोज जुड़ती 1857 का स्वातंत्र्य समर - 74