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१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished418 पृष्ठ

धर्म के लिए हिंदुस्थान का राज्य होने से निकलने देने की गलती उसने नहीं की। इच्छा नहीं थी, ऐसा नहीं, पर हिम्मत नहीं थी। फिर भी, बड़े-बड़े नाम देकर और अपना मूल हेतु छिपाते हुए सती प्रथा प्रतिबंध, विधवा विवाह को समर्थन, दत्तक पुत्राधिकार की समाप्ति आदि अवसरों पर हिंदुस्थान की धर्म-आस्थाओं में परिवर्तन करने क प्रयास उन्होंने प्रारंभ कर ही दिया था। मिशनरियों के तहत चलनेवाले स्कूलों को सरकारी धन की सहायता बिना रुके मिल रही थी। बड़े-बड़े आर्कबिशपों के वेतन बड़े-बड़े सरकारी अधिकारियों द्वारा हिंदुस्थान की जनता को निचोड़कर जमा किए गए धन से दिए जाते थे। ये अधिकारी अपने अधीनस्थ लोगों को अपने पवित्र धर्म को त्यागकर ईसाई होने का उपदेश करते । सरकारी कागजों में हिंदुस्थान के लोगों का उल्लेख 'Heathen' षब्द से किया जाता। अंग्रेजी कर्मचारियों का अधिकतर समय आसमानी बाप का शुभ चरित सुनाने में ही जाता था। सेना में जो अंग्रेज घुसते थे उनमें से कितने ही केवल अधिकार के बल पर भारतीय धर्म की खिल्ली उड़ाने के लिए ही घुसते थे। शांति काल में सेना के लोगों को कोई काम न होता था, अतः उस समय हिंदू और मुसलमान सिपाहियों को यीशू का चरित सुनाने को विपुल समय मिलने से लश्करी विभाग में यत्र-तत्र इन मिशनरी कर्नलों और सेनापतियों की आवाजाही बढ़ गई थी। जिस 'रामचन्द्र' के पवित्र नामोच्चार से हर हिंदू के हृदय में भक्तिभाव उमड़ पड़ता है और जिस 'मोहम्मद- के नाम से सारे मुसलमानों की रग-रग से प्रेम झलक पडऋता है उस रामचंद्र के और उस मोहम्मद के नाम को वे पादरी कर्नल गालियां बकते। उठते-बैठते भारतीय सिपाहियों को अधिकार के जोर से चुप बैठाकर वे उनके सामने उनके प्राणप्रिय वेदों और कुरान की डटकर निंदा करते थे। इन मानवी राक्षसों का यह उद्योग किस तरह निरंतर चल रहा था और इस कार्य का उन्हें कितना अभिमान था, इसका स्वरूप स्पश्ट करने के लिए एक व्यक्ति से संबंधित उदाहरण देना आवश्यक है। सारे धर्मों का जनक आर्य धर्म तथा ईसाइयत की गरदन पर छुरी रखकर आगे बढ़ा हुआ मोहम्मदी धर्म, इन दोनों धर्मों को और उनके अनुयायियों को अपने टुटपुंजिया शुभ चरति से ठगना चाहनेवाले इन पादरी सेनापतियों में से बंगाल पैदल रेजीमेंट का एक कमांडर बड़े घमंड से कहता है-'मैं गत बीस वर्षों से यह शुभ चरित का कार्य निरंतर कर रहा हूं। इन काफिर लोगों की आत्मा को शैतान से बचाना एक फौजी कर्तव्य ही है।' हिंदुस्थान कके धन पर मोटे हुए ये पादरी वीर एक हाथ में लश्करी आदेशों की पुस्तक और दूसरे हाथ में बाइबिल लेकर इस देश के सिपाहियों को धर्मच्युत करने का प्रयास दिन-रात करते रहते थे। इतना ही नहीं अपितु उस प्रयास में जल्दी सफलता मिले, इसके लिए धर्मांतरण करनेवाले सिपाही को पदोन्नति का खुला वचन देते थे। सिपाही अपना धर्म छोड़े तो हवलदार हो जाता था और हवलदार-सूबेदार, मेजर। इस प्रकार सेना विभाग एक तरह से बलात् ईसाई बनाने का मिशन हो जाता था। हिंदुस्थान के धन से मुटाए हाथ और हिंदुस्थानी पैसे से खरीदी गई तलवार से हिंदुस्तानी धर्म को ही चोट पहुंचाने के अंग्रेजों के इस हेतु के विरूद्ध संशय उत्पन्न हुआ और उसमें हर रोज जुड़ती 1857 का स्वातंत्र्य समर - 74

नई-नई घटनाओं के कारण सारे हिंदुस्थान को ईसाई बनाने की अंग्रेजी नीति सबको स्पष्ट दिखने लगी। अपने सनातन आर्य धम्र का और अपने प्राणप्रिय इस्लाम धर्म का मीठी छुरी से गला काटा जा रहा है, यह देखते ही हिंदू और मुसलमान क्रोधित हो उठे। फिरंगियों के असह्य अत्याचारों से उनके शरीर जलने लगे और धर्म-रक्षा के लिए प्राण भी देने के लिए वे शपथ लेने लगे। और इसी भड़कती आग में घी डालने को हिंदुस्थानी लश्कर में नए कारतूस उपयोग करने का आदेश आ गया। नए प्रकार की बंदूकों के लिए नए कारतूस काम में लाने की आवश्यकता पड़ जोने से इन कारतूसों का कारखाना हिंदुस्थान में लगाने का प्रस्ताव सरकार ने किया। यह प्रस्ताव यद्यपि सन् 1857 के आरंभ में अमल में आया, फिर भी इन कारतूसों का प्रवेश पहले ही हो गया था। हिंदुस्थान के हिंदू और मुसलमान की धर्म-निष्ठाओं को तुच्छ माननेवाली फिरंगी सरकार ने इंग्लैंड में तैयार गाय की चरबी लगे ये कारतूस सन् 1853 में ही हिंदुस्थान में भेजे थे, ऐसा अब सिद्ध हो गया है। अंग्रेजों ने यह बात गुप्त रखकर कि उन कारतूसों में किसकी चरबी लगी है-कानपुर, रंगून एवं फोर्ट विलियम की हिंदुस्थानी फौज के हिंदू-मुसलमानों को सन् 1853 में ही धर्मच्युत कर दिया थां यह विश्वासघात सन् 1857 में खुलने तक कारतूसों को चाहे जो भी चरबी लगाने की अंग्रेजों ने जान-बूझकर व्यवस्था की थी। यह बात अनुमान से नहीं कही गई है, क्योंकि सन् 1857 के दिसंबर में कर्नल टक्कर द्वारा भेजी गई सरकारी रिपोर्ट में इस बात का स्पष्ट उल्लेख है। 28 स्वयं कमांडर-इन-चीफ को यह बात ज्ञात थी। ऐसा होते हुए भी हिंदुस्थानी सिपाहियों को वे कारतूस देकर उनके पवित्र धर्म को भ्रष्ट करने का अधम कृत्य निरंतर चालू रखा गया था। अंग्रेजों के मन के इस विश्वासघात की कल्पना सन् 1853 में भारतीय सिपाहियों को बिल्कुल भी न थी, अतः उन्होंने इन कारतूसों का प्रयोग बिना किसी शंका के किया। इस तरह अपनी कपट भरी योजना सफल होते देख उन कारतूसों के निर्माण का कारखाना दमदम में चालू किया गया। इस कारखाने में तैयार किए गए कारतूसों को पहले जैसी ही चरबी लगाई जाती थी;पर ऐसा करने में हिंदुस्थानी लोगों को धर्मच्युत करने का सरकार का हेतु नहीं था-इसे कोई भी भूले नहीं! ऐसा उद्देश्य न होते हुए भी हमारा देश मिट्टी में मिल गया। उेसा कोई उद्देश्य न होते हुए भी हमारा स्वराज्य चर-चर ची दिया गया और ऐसा उद्देश्य न होते भी हमारे धर्म का नाश हो रहा था। कमांडर-इन-चीफ को चरबी की बात मालूम होते हुए भी उसने क्योंकर हिंदुओं के मुंह में गाय का मांस एवं मुसलमानों के मुंह में सूअर का मांस ठूंसा? इस एक व्यवहार में अंग्रेजी सरकार ने कितनी बार सफेद झूठ बोला, यह देखें तो रक्त की हर बूंद खौलने लगती है। कारतूस को गाय और सूअर की चरबी लगाई जाती है, इस अफवाह पर सिपाहियों ने अंधविश्वास किया, ऐसा कहनेवाले निर्लज्ज लोग, दमदम कारखाने में जो ठेकेदार 1857 का स्वातंत्र्य समर – 75 28 के कृत-'इंडियन म्युटिनी', खंड 1, पृष्ठ 380।

चरबी देता था उसका करार पत्र अवश्य देखें, 29 जिससे इसका स्पष्ट उत्तर मिलेगा कि उन कारतूसों में गाये की चरबी का उपयोग किया जाता था या नहीं। हिंदू लोग जिसे मां मानते हैं उस गाय की चरबी की आपूर्ति दो आने की एक पौंड की दर से की जाती थी और उस चरबी में सूअर की चरबी का अंश मिलाया जाता था, यह भी असंभव नहीं है। इन कारतूसों का हल्ला होते ही सन् 1857 की 29 जनवरी को एक सरक्यूलर भेजा गया था। उसमें से सरकारी हुकूमत कहती-“नेटिव सिपाहियों के लिए बननेवाले कारतूसों को केवल बकरी या बकरे की चरबी लगाई जाए, सूअर या गाय की चरबी बिल्कुल काम में न ली जाए।'' जल्दबाजी में निकाले गए सरक्यूलर से यही सिद्धह होता है कि गाय या सूअर की चरबी न लगाने का इसके पहले नियम नहीं था। दमदम और मेरठ में इन कारतूसों के कारखाने थे। दमदम के कारखाने में काम करनेवाले एक महतर ने एक ब्राह्मण के ऐसा कहते ही वह मेहतर बोला, “अब सब ओर भ्रष्टता फैलेगी। जिन कारतूसों को तुम दांत से तोड़ोगे उन कारतूसों पर गाय और सूअर की चरबी मढ़ी जा रही है।'' यह सुनते ही वह ब्राह्मण दूसरे सिपाहियों को वह बात कहने लगा। दमदम में जल्दी ही सारे सिपाही संशयग्रस्त हो गए और उन्होंने पड़ताल की तो यह सत्य स्पष्ट हो गया कि कारतूसों को गाय और सूअर की चबी लगाई जाती है। दमदम का यह समाचार आग की तरह सब ओर फैल गया। हर सिपाही को अपने हाथों में गाय और सूअर की चरबी लगी दिखने लगी। और हर लश्करी शिविर में ईसाई लोगों के इस षड़यंत्र से हर एक को अपने धर्म और अपने अस्तित्व का एक क्षण का भी भरोसा नहीं रहा। यह देखकर अंग्रेजी सरकार घबरा उठी और उसने अपना कुकृत्य छिपाने के लिए ऐसी झूठी और नीच बातें कहनी शुरू कीं जिससे कि मनुष्य जाति को कालिख पुती रहे। कारतूसों को गाय और सूअर की चरबी लगाई हुए थी, यह जब अस्वीकार करना कठिन हो गया, तब हिंदुस्थानी सरकार के लश्करी सचिव बर्च ने सरकारी घोषणा की कि मेरठ और दमदम में तैयार होने वाले नए कारतूस हमने अभी तक बिल्कुल नहीं बांटे हैं। उसका यह कथन बिल्कुल झूठ था। अंबाला, सियालकोट और बंदूकों के प्रशिक्षण के लिए चलाए गए नए लश्करी वर्गों में ये चरबी लगे कारतूस सन् 1856 से ही भेजे जा रहे थे। अंबाला डिपों में 22,500 और सियालकोट को 14,000 कारतूस 23 अक्तूबर, 1856 को भेजे गए, फिर भी कर्नल बर्च जनवरी 1857 में सरकारी घोषणा करता है कि कारखाने से एक भी कारतूस नहीं भेजा गया। जहां लश्करी वर्ग चल रहे थे वहां नई बंदूकों के प्रशिक्षण में इन कारतूसों का उपयोग नहीं किया गया, यह असंभव था। इसके पहले लिखा जा चुका है कि 1857 का स्वातंत्र्य समर – 76 291- के कृत–'इंडियन म्युटिनी', खंड 1, पृष्ठ 381। 2. "चरबी की बनावट में गाय की कुछ होती थी, इस विषय में तनिक भी संदेह नहीं है।'' –के कृत–'इंडियन म्युटिनी', खंड 1, पृष्ठ 381

सन् 1853 में यही कारतूस भारतीय सिपाहियों को कोई जानकारी न देते हुए उपयोग के लिए दिए गए थे। गुरखा पलटन में तो ये कारतूस खुलेआम बांटे गए थे। फिर भी बर्च किसी उस्ताद उचक्के जैसा सीना तानकर कहता है कि चरबी लगा एक भी कारतूस नहीं बांटा गया था।³⁰ भोले सिपाहियों को चाहे जैसी लुका-छिपी कर धोखे में रखना चाहनेवाली सरकार का यह प्रयास विफल हो जाने पर अब सिपाहियों को ऐसी अनुमति दी गई कि वे चाहे कोई भी चिपचिपी वस्तु अपने कारतूसों में स्वयं ही लगा लें। इस अनुमति का परिणाम जो होना था वहीं हुआ। सरकार द्वारा चरबी लगाने की जिद इतनी जल्दी छोड़ देने का अर्थ है कि एक ओर चुप करके दूसरी ओर से छल करने की उसकी योजना होगी-ऐसा उनको पक्की तरह लगने लगा। चरबी की जगह पर चाहे कोई भी चिपचिपापन लाने के लिए ऐसा ही कोई धर्मबाह्य पदार्थ लगाने का प्रयास नहीं करेगी, इसको कैसे माना जाए? अतः ये कारतूस किसी भी मूल्य पर नहीं लेना है, यह दृढ़ निश्चय सब लोगों को करना चाहिए। पर यह निश्चय हो गया तो भी इतने से मुख्य आपदा तो टालनेवाली नहीं है। बहुत हुआ तो ये कारतूस नहीं दिए जाएंगे। परंतु इनके स्थान पर कल कोई देसरी आपदा आएगी। अर्थात् इन कारतूसों को न लेने से भी धर्म पर आई वास्तविक आपदा टलनेवाली नहीं है। गुलामी के नरक में गिरे लोगों का धर्म पवित्र कैसे रह सकता है! गाय की चरबी तो क्या, देशमाता की चरबी काटकर निकाली जा रही है-इस बात को भुला देनेवालों का धर्म जीवित कैसे रह सकता है? सद्धर्म स्वर्ग में रहता है और गुलामी में पड़े लोग नरक में रहते हैं। अतः यदि उन्हें धर्म चाहिए तो उन्हें गुलामी की गंदगी अपने और अपने शत्रुओं के रक्त से धोकर साफ करनी चाहिए। इसलिए अब कारतूस लें या न लें, हे हिंदुस्थान! धर्म रक्षण यदि आवश्यक हो, धर्म के उद्देश्य के लिए मानव का जो प्रगमन आवश्यक है उसे साधने का यदि तेरा हेतु हो और यदि अपमान पर तुझे लज्जा आती है तो इस गुलामी को भंग करने को तैयार हो जा। धर्म के लिए मर, मरते-मरते सबको मार और मारते-मारते स्वराज्य प्राप्त कर। सन् 1857 का वर्ष उदय हो चुका है, इसलिए उठ! और स्वराज्य प्राप्त कर! 1857 का स्वातंत्र्य समर - 77 ³⁰ "ठीक अंतिम समय पर कर्नल बर्च सिपाहियों को यह आश्वासन देने हेतु आगे आया कि उन्हें दिए गए किसी कारतूस में चरबी नहीं लगाई गई है। उसका यह कथन सर्वथा मिथ्या था। सिपाही इससे धोखे में आनेवाले नहीं थे। जैसाकि एक साहसी लेखक ने लिखा है कि 'सरकार तो केवल झूठ का पुलिंदा ही खोल रहा है।' " -बंगाल के एक हिंदू का पत्रक, 1857

प्रकरण-7 गुप्त संगठन जैसाकि पिछले अध्याय में वर्णन किया गया है, जब सारे हिंदुस्तान में क्रांति की सामग्री इधर-उधर तैयार हो रही थी तब उस सामग्री की यथोचित योजना कैसे तैयार की जाए और उसमें क्रांतियुद्ध का भवन किस तरह बनाया जाए, इसका नक्शा ब्रह्मवर्त में तैयार हो रहा था। पूर्व प्रकरण में हमने अजीमुल्ला खान को यूरोप प्रवास पर छोड़ दिया था। उस प्रवास में जाने के पहले लंदन में उसी समय सतारा की गद्दी का झगड़ा सुलझाने हेतु रंगो बापूजी नामक एक चतुर और कर्मठ सज्जन गए हुए थे, उनसे अजीमुल्ला खान ने भेंट की। सतारा की गद्दी का प्रेत दहन करते आए हुए रंगों बापूजी और पेशवा की गद्दी का प्रेत दहन करने आए अजीमुल्ला खान, इनकी उन दोनों इतिहास-प्रसिद्ध गद्दियों के प्रेत संस्कार के समय क्या वार्त्ता हुई, अपने देश का सर्वनाश करनेवाले फिरंगियों की पिटाई करने के लिए उन्होंने कैसी शपथ लीं और हिंदुस्तान में लौटकर सतारा में रंगों बापूजी ने और ब्रह्मवर्त में अजीमुल्ला खान ने प्रचंड युद्ध की रचना करने के लिए क्या-क्या मंत्रणा की, इतिहास कभी भी यह शब्दशः नहीं बता पाएगा। फिर भी सन् 1857 का युद्ध हुआ, यह जितना सत्य है-इस युद्ध की योजना लंदन में अजीमुल्ला खान और रंगो बापूजी ने बनाई थी, यह बात भी उतनी ही सत्य है। लंदन से रंगो बापूजी सीधे सतारा को लौट गए और उत्तर की ओर ब्रह्मवर्त में जिस भवन का निर्माण हो रहा था 1857 का स्वातंत्र्य समर - 78

उस भवन के निर्माण की सामग्री जुटाने लगे। परंतु अजीमुल्ला खान सीधे हिंदुस्थान न आकर यूरोप में प्रवास करने लगे। उस समय क्रिमिया द्वीप में अंग्रेजों का रूस से घमासान शुरू था और रूसी भालुओं के पंजों तले ब्रिटिशा शेर भी गाय बनता जा रहा था। अजीमुल्ला खान को यह समाचार ज्ञात होते ही उसके मन में घुमडते महान् कार्य को बल मिला। स्वदेश के सीने पर नाचते अंग्रेज शेर को रूस ने कहां तक घायल किया है, उसके कितने पंजे काटे हैं तथा शेष को काटने के लिए अपने प्रिय हिंदुस्थान में होनेवाले प्रयासों में रूस की कितनी सहानुभूति या सहयोग प्राप्त करना संभव है, इसकी प्रत्यक्ष जानकारी प्राप्त करने अजीमुल्ला खान क्रिमिया द्वीप गए। यूरोप के प्रवास से अजीमुल्ला खान के हिंदुस्थान लौटने के बाद ब्रह्मवर्त के राजभवन में निराला ही वातावरण बन गया। सारे हिंदुस्थान पर विजय-आनंद से लहरानेवाला पेशवाओं का वह ध्वज 'जरी पटका' आज तक उस राजभवन में धूल खाता पड़ा हुआ था। जिसके सुर सुनकर लाखों मराठी तलवारें रणांगण में शत्रु पर टूट पड़ती थीं, वह दुंदुभि उस राजभवन में वीर रस को त्याग करुण रस के सुर निकालनें लगी थी। वह देशव्यापी राजमुद्रा भी, जिसके मुद्रण पर दिल्ली की घटनाएं अवलंबित थी, अपने स्वयं के वैधव्य पर सिक्का मारते पड़ी थी। परंतु अजीमुल्ला खान के यूरोप से लौटते ही ऐसा लगने लगा जैसे उन वस्तुओं को एक विलक्षण चैतन्य प्राप्त हुआ हो। धूल खाती हुई जरी पटके में फिर से चमक मारने लगी और श्रीमंत नाना साहेब उस तेजस्वी, चपल और उग्र नेत्रों में असह्य अपमान से उत्पन्न हुए प्रतिशोध से अधिक उग्रता एवं 'तस्मात् युद्धायं युज्यस्व' की चेतना से अधिक तेजस्विता आने लगी। 'तस्मात् युद्धाए युज्यस्व'—क्योंकि स्वराज्य की होली हो चुकी है। तस्मात् युद्धाए युज्यस्व—स्वधर्म को पैरों तले कुचला जा रहा है और स्वतंत्रता का हनन हो रहा है। तस्मात् युद्धाए यज्यस्व—स्वदेश की स्वतंत्रता आज तक किसी को भी युद्ध के बिना प्राप्त नहीं हुई। छत्रपति को जिसके लिए ताना की बलि देनी पड़ी थी, वह स्वराज्य का सिंहगढ़ युद्ध के बिना कभी नहीं मिलेगा। धर्मरक्षा के लिए जो स्वराज्य-संपादन नहीं करता वह महाराष्ट्र धर्म का असल मराठा नहीं और जो महाराष्ट्र धर्म का असल मराठा है वह, स्वराज्य-संपादन का जो एकमात्र मार्ग है उस समर-मार्ग में कूदने से कभी भी पीछे हटनेवाला नहीं। एतदर्थ युद्धाएं युज्यस्व—श्री छत्रपति द्वारा प्रारंभ किए गए स्वतंत्रता यज्ञ के होता का कंकण बांधने जो हाथ आगे आता है वह हमेशा ही धन्य है। हतो वा प्राप्ससि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम्! तस्मात् युद्धायं युज्यस्व!! ऐसी दैवी चेतना श्रीमंत नाना साहब के नेत्रों को अधिक उग्रता और अधिक तेजस्विता देने लगी। श्री शिवराय को जो कर्तव्य निभाना पड़ा वही महान् कार्य अपने 1857 का स्वातंत्र्य समर – 79

हिस्से में आया है, इसलिए जय या पराजय जो भी मिले, मुझे तो स्वतंत्रता का नूतन 'शिवराज' या प्रथम पेशवा का मान बढ़ानेवाला अंतिम पेशवा बनना है-उनमें मन ने यह दृढ़ निश्चय किया। अपने देश और स्वराज्य का भविष्य निश्चित काने का वीरोचित निर्णय हो जाने के बाद श्रीमंत नाना का एकमात्र लक्ष्य था उस निर्णय को कार्य-रूप देना। स्वराज्य-प्राप्ति के लिए जो क्रांतियुद्ध लड़ना है उसे सफलता मिले, इसके लिए दो बातें अनिवार्य थी। पहली बात हिंदुस्थान के समस्त लोगों में स्वतंत्रता की जंगी और अनिवार्य इच्छा उत्पन्न होना और फिर उस इच्छा की सिद्धि के लिए-एक ही समय में पूरे देश द्वारा विद्रोह करना, हिंदुस्थान के समस्त लोगों में स्वतंत्रता की जंगी और अनिवार्य इच्छा उत्पन्न होना और फिर उस इच्छा की सिद्धि के लिए-एक ही समय में पूरे देश द्वारा विद्रोह करना, हिंदुस्थान के इतिहास को स्वतंत्रतागामी करना-ये दोनों ही काम विदेशियों को चकमा देकर ही किए जा सकते थे। क्योंकि जिस किसी परतंत्र देश के मन में स्वतंत्रता संग्राम छेड़ने की इच्छा हो उस देश में उस संग्राम की तैयारी गुप्त रीति से ही करनी पड़ती है। अन्यथा आरंभ में ही अमोघ शक्ति से हमला कर बलवान शत्रु उस प्रयास को चूर-चूर कर सकता है। यह ऐतिहासिक सत्य जानकर दोनों महान् विभूतियों-श्रीमंत नाना साहब और अजीमुल्ला खान ने सन् 1856 के प्रारंभ में स्वतंत्रता के लिए हिंदुस्थान को तन और मन से जाग्रत करने के लिए युद्ध संगठन बनाया। हिंदुस्थान में जितने राजे-रजवाड़े हैं उन सभी में यदि अंग्रेजों के विरूद्ध उठने की इच्छा उत्पन्न हो गई तो एक क्षण में ही अपना देश अपने हाथ आ जाएगा, यह तथ्य नाना के ध्यान में पहले ही आ गया था। इन हिंदुस्तानी सिर चढ़े राजाओं से आगे-पीछे अंग्रेजी राज को धोखा होगा, यह जानकर ही अंग्रेजी सरकार एक के बाद दूसरी रियासत छीनती चली जा रही है, यह वास्तविक स्थिति सारे राजे-राजवाड़ों के आगे रख उनके मन को स्वतंत्रतागामी करने के लिए नाना ने हर दरबार में अपना दूत भेजना प्रारंभ किया। कोल्हापुर, दक्षिण की सारी पटवर्धनी रियासतों, अवध के जमींदारों और दिल्ली से मैसूर तक की सारी राजधानियों में नाना के दूत और उनके पत्र सारे हिंदुस्थान को स्वतंत्रता युद्ध के लिए उड़ने की चेतना देते हुए घूम रहे थे। अंग्रेजी सत्ता के नीचे स्वराज्य और स्वधर्म की कैसी छीछालेदर होती जा रही है; जो रियासतें आज जीवित हैं, वे भी कल किस तरह नामशेष होनेवाली हैं तथा अंग्रेजों की विश्वासघाती गुलामी में अपने प्राणप्रिय हिंदुस्थान की कैसी बरबादी हो रही है-यह सब स्पष्ट और मार्मिक रीति से जनता के मन में भरते हुए मौलवी, पंडित एवं राजनीतिक संन्यासी सारे हिंदुस्थान भर में गुप्त रीति से विचरने लगे। दासता और गुलामी के प्रति गुस्सा उत्पन्न करते हुए यह दास्य नामशेष करना कितना सुलभ है, हिंदुस्थान के हृदय में हिंदुस्तान की तलवार ही कैसे धंसाई जा रही है और हिंदुस्तानी लोग स्वदेश के लिए मर मिटने के लिए तैयार हो जाएं तो एक क्षण में उन्हें अपना देश फिरंगियों के चुंगल से मुक्त करना कितना सरल है-यह सब राजा से रंक तक हर भारतीय हृदय को वे राजनीतिक संन्यासी भी प्रकार समझाकर कहते थे। हम सब देशबुंध एक ही जाएंगे तो मुट्ठी भर गोरों को धूल चटाकर स्वदेश को क्षण भर में स्वतंत्र 1857 का स्वातंत्र्य समर - 80

कर सकते हैं, यह आत्मविश्वास हर सिपाही और हर नागरिक में मन में इन राजनीतिक संन्यासियों ने किस तरह उत्पन्न किया था, यह उस समय के देशभक्तों के उद्गार में पग-पग पर दिखता है। काली नदी की लड़ाई में हारे हुए अंग्रेजों ने प्रश्न किया कि "हमारे विरुद्ध उठने की तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई?' इस अक्खड़ प्रश्न के उत्तर में सिपाहियों ने कहा, "हिंदुस्थानी सिपाही एक हो गया तो गोरा चटनी के लिए भी नहीं मिलेगा।" अंग्रेज सरकार ने सन् 1857 के आरंभ में ही सिपाहियों की चिट्ठियां खोलनी शुरू कर दी थी। उन पत्रों में से एक पत्र हिंदुस्थान के लोगों की शक्ति के संबंध में कहता है-"विदेशियों को हम ही सिर चढ़ाए हुए हैं! यदि हम उठे तो फिरंगियों के मुट्ठी भर लोगों को तलवार के एक झटके में गारद कर सकते हैं। कलकत्ते से पेशावर तक मैदान साफ है।" श्रीमंत नाना साहब के स्वयं के हस्ताक्षर के पत्रों ने और ब्रह्मवर्त से भेजे गए संन्यासियों ने ऐसी उदात्त आत्मनिष्ठा के बीज भारतीय मन में बो दिए। परंतु आज उपलब्ध जानकारी से ऐसा दिखता है कि अवध का राज्य अधिगृहीत होने तक इन बीजों में जोरदार अंकुर नहीं फूटे थे।³¹ सन् 1856 में अवध का राज्य अधिगृहीत होते ही अकस्मात् सब लोगों में परतंत्रता के प्रति घृणा उत्पन्न हुई। स्वतंत्रता का रम्य एवं पुण्य दर्शन श्रीमंत नाना की तीक्ष्ण दृष्टि को इसके पहले ही हो चुका था और गुलामी की गंदगी की दुर्गंध बड़ी दूर से उन्हें आने लगी थी। परंतु जड़बुद्धि सामान्य जनसमूह प्रत्यक्ष साक्ष्य के बिना उसे ग्रहण न कर सका। फिर भी, अवध का राज्य अधिगृहीत होते ही हर कोई अपने अस्तित्व को धिक्कारने लगा और गुलामी में सड़ने की अपेक्षा मरना भला, ऐसी गर्जना कर अपनी तलवारों पर पानी चढ़ाने लगा। इसी समय हिंदुस्थान की इतिहास-प्रसिद्ध राजधानी को भी मानो नई चेतना मिल गई और दिल्ली के राजमहलों में स्वतंत्रता संग्राम की मंत्रणाएं शुरू हो गई। दिल्ली के बादशाह की बादशाही लेकर ही अंग्रेज नहीं रुके अपितु उनकी 1857 का स्वातंत्र्य समर - 81 ³¹ विभिन्न प्रांतों में भेजे गए राजकीय दूतों में से एक दूत मैसूर में पकड़ा गया। उसका कहा निम्न भाग बहुत महत्त्वपूर्ण होने से पूरा-का-पूरा यहां दिया जा रहा है-"श्रीमंत नाना ने अवध अधिगृहीत होने के पूर्व दो-तीन माह से पत्र-प्रेषक शुरू किया था। परंतु पहले उन्हें उत्तर नहीं आए। किसी को भी आशा नहीं थी। अवध का राज्य अधिगृहीत हो जाने पर नाना ने पत्रों की अधिक मार की, तब जाकर केवल लखनऊ के साहूकार नाना के विचार पड़ने लगे। पुरबिया लोगों का राजा मान सिंह भी मिल गया। फिर सिपाही लोगों ने अपनी-अपनी 'तजवीजें' करनी शुरू कीं और लखनऊ के साहूकारों से उन्हें सहायता मिलने लगी।" अवध अधिगृहीत होने तक बिलकुल उत्तर नहीं आया; परंतु वह राज्य अधिगृहीत होते ही सैकड़ों लोगों ने हिम्मत से आगे आकर नाना को वचन-पत्र भेजे। सिपाहियों की तजवीजें पहले से ही शुरू हो गई थी। फिर कारतूसों की घटना हुई और उस असंतोष पर नाना के पत्रों की बरसात होने लगी। जम्मू के गुलाब सिंह ने मैं सेना और खजाना लेकर तैयार हूं-ऐसा पत्र लिखा। और लखनऊ के साहूकारों ने धराशियां भी भेज दीं।

'बादशाह' की शाब्दिक पदवी भी उनके बाद न चले, यह भी तह कर लिया। ऐसी पिन्नावस्था में अपना पूर्व वैभव प्राप्त करने हेतु एक बार अंतिम प्रयास करके देखें और मरना ही है तो बादशाही की शान से मरें-ऐसा विचार राजमहल में होने लगा। इस काम में प्रमुख इस्लामी सत्ताओं की सहायता मिले, इसलिए मैं सुन्नी पंथ छोड़कर अवध के नवाब और ईरान के शाह का शिया पंथ स्वीकार करता हूं, ऐसी घोषणा भी बादशाह ने की। इसी समय अंग्रेजों की ईरान से लड़ाई शुरू हुई। हिंदुस्थान में भी उसी समय विद्रोह होना अपने लिए लाभदायक है, यह देखकर ईरान के शाह ने सन् 1857 के प्रारंभ में दिल्ली की मस्जिदों से इसी प्रकार की सार्वजनिक घोषणाएं होने लगीं-“फिरंगियों के कब्जे से हिंदुस्थान को मुक्त करने ईरानी फौज जल्दी ही आ रही हैं, इसलिए बूढ़े, जवान, छोटे-बड़े, सुशिक्षित-अशिक्षित, रैयत और लश्कर सारे लोग इन काफिर लोगों के शिकंजे से मुक्त होने के लिए रणांगण में कूद पड़ें।”³²

इस घोषणापत्र को सारे भारतीय समाचार-पत्रों ने प्रकाशित किया और दिल्ली के लोगों में क्रांतियुद्ध की लहर दौड़ गई। दिल्ली के बादशाह के सचिव मुकुंदलाल कहते हैं-‘-6राजमंदिर के द्वार पर और महल में मुगल खुले मन से युद्ध की चर्चा करते रहते थें सिपाही जल्दी ही विद्रोह कर राजमहल की ओर आएंगे और फिरंगियों का जुआ उतार फेंककर फिर से अपना राज्य स्थापित करेंगे, ऐसी निश्चयपूर्वक बातें वे करते और अपना राज्य हो जाने पर अपने देश की सारी सत्त एवं सारे अधिकार अपने ही हाथों में रहेंगे। ऐसी आशा से सब लोग उत्साहित हो जाते।” इस लोक-जागृति को उत्तेजना देने के लिए शहजादे और राजवंश के अन्य पुरुषों ने अलग-अलग उपाय किए और दिल्ली में क्रांति की ज्वालाएं सब ओर से सुलगने लगीं।

इस तरह दिल्ली के दीवाने-आम में और ब्रह्मवर्त के राजमंदिर में स्वतंत्रता संग्राम की गुप्त तैयारी हो रही थी। हिंदुस्थान की क्रांतिकारी शक्तियों को इकट्ठा और संगठित करने के लिए इन दो राजमहलों से जो प्रचंड प्रयास चल रहे थे वे इतने गुप्त रीति से किए जा रहे थे कि अंग्रेजों जैसे धूर्त लोगों को भी सन् 1857 में तोपों की गड़गड़ाहट होने तक उसकी रत्ती भर भनक नहीं थी। हजारों रूपयों की तनख्वाह और हाथियों का पुरस्कार देकर इस राजनीतिक जिहाद का उपदेश करने के लिए बड़े-बड़े मौलवी भेजे गए। वे गांवों और शहरों में इस राजनीतिक धर्मयुद्ध का उपदेश गुप्त सभाओं में देते हुए घूमते थे। सिपाहियों के शिविरों में रात को इनके व्याख्यान होते थे। लखनऊ की मस्जिदों में मौलवी जिहाद शुरू करने संबंधी खुले भाषण किया करते । पटना और हैदराबाद में रात में सभाएं होती और विभिन्न मौलवी सब स्तर के लोगों को

1857 का स्वातंत्र्य समर – 82

³² के कृत-इंडियन म्यूटिनी', खंड 2 पृष्ठ 30 ।

स्वतंत्रता की रक्षा करने और स्वधर्म के लिए युद्ध करने की शिक्षा देते थे। जिनके पवित्र नाम से अपने हिंदुस्थान देश का इतिहास भूषित हुआ और जिनके पावन चरित्र का कथन आगे यथासंभव किया जानेवाला है, उन देशभक्त मौलवी अहमद शाह को लखनऊ में हिंदू और मुसलमानों को फिरंगियों के विरूद्ध एक साथ विद्रोह करने का खुला उपदेश देने के कारण फांसी का दंड दिया गया था। उपर्युक्त मौलवी की तरह ही सैकड़ों प्रचारक फकीरों और संन्यासियों का बाना धारण कर स्थान-स्थान पर गुप्त प्रचार करने लगे। भीख मांगने के बहाने हर घर में जाना सुलभ होने से और इस तरह शत्रु के मन में किसी तरह की आशंका उत्पन्न न होने के कारण ये देशभक्त फकीर और संन्यासी दर-दर घूमकर दासता के प्रति घृणा और भावी स्वतंत्रता की अभिलाषा लोक समूह में प्रदीप्त किया करते थे। विशेषतः सेना में इन लोगों का उपयोग बहुत था। क्योंकि हर टुकड़ी में एक पंडित और एक मुल्ला धार्मिक कार्यों के लिए रखना अनिवार्य होने से उस स्थान पर यही लोग जाकर बैठते थे। सिपाहियों के मन पर उनके धर्मगुरू का दबाव और प्रभाव होने से इन्हीं लोगों के द्वारा स्वतंत्रता के पवित्र धर्म की दीक्षा देना आवश्यक था। स्वतंत्रता के बना धर्मरक्षण असंभव है, यह मर्म जानकर हजारों धर्मगुरू इस राजनीतिक जिहाद का आह्वान करने आगे आए। सन् 1857 के अप्रैल माह में ऐसा ही एक देशभक्त फकीर वहां की सैनिक छावनी में आया। उसके पास हाथी-घोड़े आदि तथा अन्य संरजाम भी था। वहां के सिपाहियों को राजनीतिक जिहाद की दीक्षा देने में वह मग्न था-परंतु अंग्रेज अधिकारियों को उसपर शंका हुई और उन्होंने उसे वहां से निकल जाने का आदेश दिया। यह आदेश होते ही फकीर वहां से तो निकल गया, परंतु पास के ही एक गांव में घुसकर फिर अपनी गुप्त रचना का कार्य करने लगा।³³ ऐसे कितने की स्वतंत्रता के भक्त लोग अपनी जान हथेली पर लिये उस अपार रचना का गुप्त कार्य बड़े कौशल से कर रहे होंगे। परंतु वे ˙˙ थे कौन? कहां के? यह भी स्मृति आज जनता में नहीं रही-हाय-हाय! जिस प्रकार मस्जिद, मंदिर और भिक्षा के बहाने घर-घर में स्वतंत्रता की चेतना उत्पन्न करने मौलवी और पंडित, फकीर और संन्यासी भेजे गए वैसे ही विभिन्न स्थानों से अधिक महत्त्व के स्थान पर उपदेशकों और शिक्षकों को भेजा गया था। हिंदुस्थान में विभिन्न प्रदेशों के लोगों के एकत्रित होने के मुख्य स्थान बड़े-बड़े तीर्थ क्षेत्र हैं। ये क्षेत्र एक प्रकार से सारे प्रदेशों के लोगों के राष्ट्रीय सम्मेलन-स्थल ही हैं। मस्जिदों में स्थानीय लोग ही आएंगे, परंतु तीर्थों में भी राजकीय महंत नियुक्त किए गए और जल्दी ही गंगा के पुण्य स्नान के लिए आनेवाले हजारों बंधुओं को हिंदुस्थान के मन में मचल 1857 का स्वातंत्र्य समर – 83 ³³ मि. विलियम कृत-‘द मेरठ नैरटिव' ।

रहे स्वतंत्रता युद्ध में सम्मिलित होने का गुप्त उपदेश देते-देते पंडित लोग प्रत्येक तीर्थ में घूमने लगे।³⁴ विराट् जनसमूह के मन में एक ही इच्छा उत्कटता से उत्पन्न करने और उसकी अक्षय मुद्रा उनके हृदय पर अंकित करने के लिए कविता जैसा उत्तम साधन नहीं है। मार्मिक शब्द और आकर्षक पद्धति से पद्य में गुंथा हुआ सत्य जनता के हृदय में बहुत तेजी से अंकुरित होता है। इसीलिए राष्ट्रगीत की महत्ता बहुत मानी जाती है। राष्ट्रगीत राष्ट्र के हृदय की भावना एक वाक्य में प्रकट कर सकते हैं। जब-जब किसी प्रबल भावना से राष्ट्रीय आत्मा छटपटाने लगती है तब-तब उससे निकले सहज बोल ही तो राष्ट्रगीत हो जाते हैं। फ्रांस कि राष्ट्रीय आत्मा के बोल हैं-ला मार्सेलीज। सन् 1857 में स्वधर्म-रक्षण की उदात्त भावना से भारतभूमि की आत्मा फड़फड़ाते समय उसके मुख-मार्ग से ऐसा कोई राष्ट्रगीत निकला न होता तो आश्चर्य ही होता। दिल्ली के बादशाह के एक निजी गवैया ने सारे हिंदुस्थान के कंठ से निनादित होनेवाले एक राष्ट्रगीत की रचना स्वयं की थी। अपने पूर्वजों के पराक्रम का वर्णन करने के पश्चात् उस राष्ट्रगीत में वर्तमान की अवनति को करुण रस में चित्रित किया गया था। जो लोग एक दिन हिंदुस्थान के इस छोर से उस छोर तक विजयशाली वैभव से अभिषिक्त हुए थे उन्हीं लोगों को आज विश्व में गुलाम कहलाने की बारी आए, उनका धर्म अनाथ हो जाए और उनके अभिषिक्त सिर विदेशियों के पैरों तले कुचले जाएं-इस विपरीत और लज्जास्पद स्थिति के लिए उस राष्ट्रगीत में भारत माता आक्रोश कर रही थी। परंतु अब उसका यह आक्रोश हमें सुनाई देगा क्या? क्या अब वह सन् 1857 का गीत हम फिर सुन सकेंगे? उस राष्ट्रगीत का प्रारूप यदि कोई खोजकर निकाले तो अपने इतिहास पर उसके अक्षय उपकार होंगे। तब तक इतिहास इतना ही कहता है कि अपनी धरती माता सन् 1857 में आक्रोश कर रही थी और कानपुर के मैदान में कूदते समय नाना के कान में वही आक्रोश भयंकर रूप से गूंज रहा था। विस्तीर्ण रचना के साधन भी विस्तीर्ण ही होते हैं। जर्जर हुई मातृभूमि को मदोन्मत्त अत्याचारों के हाथ से छुड़ाने जैसा कार्य करने के लिए पहली मूलभूत एवं 1857 का स्वातंत्र्य समर - 84 ³⁴ 1. ट्रेवेलियन कृत-'कानपुर' । 2. “दिल्ली के राजमहल से बहुत पहले ही एक राजाज्ञा प्रसारित की गई थी, जिसमें मुसलमानों को यह निर्देश दिया गया था कि वे अपने सभी महत्त्वपूर्ण समारोहों पर एक गीत का गायन करें, जिसकी राज-दरबार के संगीतज्ञ ने रचना की है, जिसमें बड़े ही मार्मिक शब्दों में उनकी जाति के पराभव और उनके उस प्राचीन धर्म की अवमानना का वर्णन उपलब्ध है जो कभी उत्तर की हिममालाओं से दक्षिणी राज्यों तक व्याप्त था; किंतु जो अब शैतानों और विदेशियों द्वारा पददलित किया जा रहा है।” –ट्रेवेलियन कृत-'कानपुर' । मेरे मत से-वृत्ति का अभिप्राय समझ पाने में पूरी तरह असमर्थ ग्रंथकार को इतना लिखना ही पड़ा। यह उस राष्ट्रगीत की सुंदरता का परिचायक है।

महत्त्वपूर्ण कोई बात है तो वह है सब लोगों का मनःप्रवर्तन। वस्तुस्थिति के क्रांति करनी हो तो सबसे पहले मनःस्थिति पर विजय पानी चाहिए। यह मनःक्रांति की चौकियां स्थापित करनी चाहिए। यह मनःक्रांति संपादित करने के लिए मन की ओर जो भी रास्ते जाते हैं उन सारे रास्तों का क्रांति की चौकियां स्थापित करनी चाहिए। मानव मन सहज ही उत्सवप्रिय होता है, अतः सामान्य जनसमूह को वश में करने के लिए उत्सव के अतिरिक्त दूसरा राजमार्ग नहीं दिखता। इन उत्सवों को शक्कर में घोलकर सिद्धांतों की गोली दी जाए तो समाज का बालमन उसे रूचि से गटक लेता है और उससे रोग भी ठीक हो जाते हैं। ऐसे गहरे विचार से उस गुप्त संगठन के कार्य में विभिन्न चित्ताकर्षक उत्सवों से सामान्य जन को स्वतंत्रता युद्ध की शिक्षा देने की व्यवस्था की गई थी। विभिन्न प्रकार के चित्रों के खेल तैयार कर, स्वधर्म की और स्वतंत्रता की कसी अवहेलना हुई है-इसका हूबहू नाटक उन चित्रों द्वारा प्रस्तुत कराया जाता था; और उस सारे अपमान, गुलामी और परतंत्रता का प्रतिशोध किस तरह लिया जाए, इसके उद्दीपक और अनिवार्य चेतना देनेवाले चरित्र इन तारों से बंधी गुड़ियों से दरशाए जाते थे। चौपाल, पनघट, चौकी, धर्मशाला आदि बस्ती की खुली जगह में वीर रसोत्पादक गीत गाकर लोगों को चेताया जाता था। उत्तरी हिंदुस्थान का अति प्रिय गीत आल्हा, जिसे सुनने पर आठ दिन में कहीं-न-कहीं लड़ाई होनी ही चाहिए, ऐसी धारणा है, वह वीर रस से भरा गीत-गाते लोगों की बाहें फड़कने लगी। पूर्वजों के पराक्रम के स्मरण से जब उनका रक्त खौलने लगता तो तुरंत विषय घुमाकर वर्तमान दासता की पूरी बात प्रस्तुत की जाती, इस पर जो 'हर-हर महादेव' की गर्जना न करे, ऐसा कापुरुष कौन होगा? राष्ट्रकार्य के लिए केवल उस राष्ट्र के पुरुषों की अनुमति होने से ही बात पूरी नहीं होती। इसके लिए तो पुरुषों को जन्म देनेवाली कोख में भी राष्ट्र-क्षोभ के बीज अंकुरित होना आवश्यक है। भारतीय महिलाओं की शूरता कितनी सहायक होती है-यह सिखों का और राजपूतों का इतिहास अभिमानपूर्वक कहता है। भारतीय स्त्रियों की मन-सामर्थ्य संपादन हेतु इस गुप्त संगठन के कार्यक्रम में वैदू लोगों की महिलाओं को लगाया गया था।³⁵ इन वैदू महिलाओं की घरेलू दवाइयां एवं सामान्य ज्योतिष कार्य के लिए हिंदुस्थान के सामान्य वर्ग की महिलाओं में हमेशा आवाजाही होती है। अतः भारतीय स्त्रियों को ऐसी दवाई देने के लिए जिससे अपनी मातृभूमि का यह गुलामी का रोग ठीक हो और वह दवाई देने पर गुलामी का भूत मां को कब छोड़ेगा और यह भूत-बाधा उतरते ही उसे स्वतंत्रता का सुंदर बालक कब उत्पन्न होगा, यह भविष्य बताने का कार्य ये वैदू महिलाएं जितनी कुशलता से करती थीं उतना कोई धन्वंतरि भी नहीं कर सकता था। इन वैदू महिलाओं ने महिलाओं में और मौलवी तथा पंडितों ने पुरुष समाज 1857 का स्वातंत्र्य समर - 85 ³⁵ ट्रेवेलियन।

में जिस तरह प्रचंड जागृति उत्पन्न कर दी, उसी तरह गांव-गांव घूमनेवाले तमाशेवालों ने भी इस राष्ट्रक्षोभ को बहुत बढ़ाया। ये तमाशगीर अपने खेलों में गुलामी से घृणा उत्पन्न करने का प्रयास करते थे। इस प्रकार हर तरह के और हर स्तर के लोगों में अंग्रेजी शासन पलट देने के लिए सन् 1857 के उस गुप्त संगठन के प्रचंड प्रयास चल रहे थे। इस संगठन के गुप्त केंद्र अब सब स्थानों पर फैल गए थे।³⁶ इस गुप्त संगठन की जिस राजभवन में प्रथम प्राण-प्रतिष्ठा हुई उस ब्रह्मवर्त में तो उसकी बढ़त जोरदार ही रही थी; परंतु श्री नाना के और अजीमुल्ला के पत्रों ने और उपदेशकों ने अब हजारों स्थानों पर उस रचना की शाखाएं खोल दी थी। ब्रह्मवर्त में नाना का निवास आगामी मंगल कार्य की तैयारी में जैसे जुटा दिखता था वैसी ही दिल्ली के महल में भी तैयारी की धूमधाम थी। इधर लखनऊ और आगरा में उस देशभक्त-मौलवी अहमद शाह में जिहाद के बीज इतने गहरे उतर गए कि वह सारा शहर जैसे किसी क्रांतिकारी दल का गढ़ बन गया। मौलवी, पंडित, जमींदार, किसान, व्यापारी, वकील, विद्यार्थी ऐसी सारी जातियां और सारे पंथ स्वधर्मार्थ और स्वदेशार्थ अपने प्राणदान करने की दीक्षा लेकर सज्जित हो गए थे और इस गुप्त रचना की अगुवाई करनेवालों में सबसे अग्रणी नेता एक पुस्तक विक्रेता था। कलकत्ता में तो स्वयं अवध के पूर्व नवाब और उनके मुख्य वजीर अली नक्की खान ठहरे हुए थे। उपर्युक्त मुख्य वजीर ने सन् 1857 की घटना में जितना धैर्य, चतुराई और साहस दिखाया उतना बहुत कम दिखा पाए होंगे। कलकत्ता में मुख्य काम बैरकपुर, दमदम आदि स्थानों पर रह रहे सिपाहियों को राज्य क्रांति के लिए अनुकूल कर लेने का था। वह बहुत नाजुक काम अली नक्की खान ने इतनी सफाई से किया कि सन् 1857 का वर्ष आते ही सारे सिपाही राष्ट्रकार्य में मिल जाने के लिए शिवजी का बेल पत्र उठाकर या गंगाजल हाथ में लेकर या कुरान की कसम लेकर वचनबद्ध हो गए थे और अवध के नवाब ने भी उन्हें उदारता का वचन दिया था। सिपाहियों के सारे ठिकानों पर रात को गुप्त बैठकें होतीं और वहां शपथ-विधि संपन्न होते ही दूसरे दिन उस रेजीमेंट का सूबेदार नवाब के यहां जाकर स्वतंत्रता संग्राम के लिए उनसे मिलने का वचन दे आता। इन सिपाहियों के मिलने के मुख्य स्थान मेरठ और बैरकपुर ही थे। उत्तर में जैसी संगठित और नियमित रचना थी वैसी ही दक्षिण में बनाने के लिए रंगो बापूजी प्रयासरत थे। पटवर्धनी रियासतों ओर कोल्हापुर के दरबार में क्रांतियुद्ध के लिए जाल 1857 का स्वातंत्र्य समर – 86 ³⁶ अपने विस्तृत इतिहास के अंत में मैलसन लिखता है-‘’इस षड्यंत्र का नेता निश्चित रूप से मौलवी ही था। इस संगठन की शाखाएं संपूर्ण भारत में फैल गई थीं। निश्चित रूप से ही आगरा में, जहां यह मौलवी यदा-कदा रहता था और दिल्ली, मेरठ, पटना एवं कलकत्ता में भी वहां अवध का पूर्व नवाब रहता था, इस क्रांति संगठन का प्रभाव प्रायः व्यापक ही था।''

बुना जा रहा था। अधिक क्या कहा जाए, परंतु ठेठ मद्रास तक इस क्रांतियज्ञ की ज्वालाएं भड़कने लगी थी। सन् 1857 की जनवरी में निम्न घोषणापत्र प्रकाशित हुआ- "हे देशबंधुओं और धर्मनिष्ठों, उठो! काफिर अंग्रेजों को अपने देश से भगा देने के लिए सारे उठो! इन अंग्रेजों ने न्याय के सारे सिद्धांत मटियामेट कर दिए हैं। उन्होंने हमारा स्वराज्य लूट लिया है और स्वदेश को धूल में मिलाने का उनका दृढ़ निश्चय है। अंग्रेजों की इन भयानक यातनाओं से अपने हिंदुस्थान को मुक्त करने के लिए केवल एक ही उपाय शेष रह गया है और वह उपाय है तुमुल युद्ध करना। ऐसे युद्ध में जो रण-मैदान में खेत रहेंगे वे अपने देश के शहीद होंगे। जो स्वदेश एवं स्वधर्म के लिए लड़ेंगे और मरेंगे उन वीर्यवान् शहीदों के लिए स्वर्ग के दरवाजे खुल रहे हैं और जो डरपोक और देशद्रोही अधम इस राष्ट्रकार्य से परावृत्त होंगे उनके लिए नरक के द्वार खुले होंगे। देशबंधुओं, इनमें से तुम क्या स्वीकार करोगे?"³⁷ ऐसी स्थिति में सन् 1857 का उदय हुआ और ऐसी सूचनाएं आने लगी कि हिंदुस्थान में यत्र-तत्र सांकेतिक महत्कार्य का मुहूर्त आ गया। इसी समय कारतूसों का बखेड़ा खड़ा हुआ। हर एक सिपाही दिन में अपनी बंदूक को रगड़-रगड़कर साफ करता और रात होते ही अपनी रेजिमेंट के सूबेदार मेजर के बंगले पर आयोजित होनेवाली गुप्त बैठकों में जाकर स्वतंत्रता संग्राम के लिए शपथ दिलाने के लिए भोज के कार्यक्रम आयोजित करते। इन भोजों के समय एक-दूसरे से योजना कही जाती और उन योजनाओं को फिर नाना साहब या अली नक्की खान को बताया जाता। कुछ रेजिमेंटों में ऐसी क्रांति घटना चलते हुए गलती या विश्वासघात से वह जानकारी सरकार के कानों तक गई तो एक-दो रेजिमेंटों को निःशस्त्र कर दूर कर दिया गया। बहुत बढ़िया! ये सारे सिपाही स्वयंसेवक बनकर गांव-गांव जाते और क्रांतियुद्ध के जिहाद का उपदेश करते। सिपाहियों के सब ठिकानों से वचन-पत्र ऐसा था। सातवीं अवध रेजिमेंट का अड़तालीस रेजिमेंट को भेजा गया वचन-पत्र ऐसा था- "रेजिमेंट के हमारे भाई का मत हमें स्वीकार है। कारतूसों के बारे में उनके जैसा ही व्यवहार करेंगे और समय आने पर टूट पड़ेंगे।" बैरकपुर से सियालकोट जैसे दूर देश भेजे गए पत्र पकड़े गए थे। उनमें एक में बैरकपुर के सिपाही सियालकोट के सिपाहियों को लिखते हैं- "भाइयों, शत्रुओं के विरूद्ध उठो!" रूसी क्रांति की तरह ही हिंदुस्थान के क्रांतियुद्ध में भी पुलिसवाले जनता से बहुत सहानुभूति बरतते थे। क्रांति के गुप्त संगठन यंत्र का प्रचंड पहिया अब तीव्र गति से 1857 का स्वातंत्र्य समर – 87 ³⁷ 1. चार्ल्स बाल कृत-'इंडियन म्यूटिनी', खंड 1, पृष्ठ 40 । 2. रेड पैंफलेट, खंड 1 ।

घूमने लगा था। ऐसे समय में विभिन्न पहियों की गति एक लय में घूमने लगे, ऐसा प्रयास आवश्यक था। इसी उद्देश्य से क्रांति पक्ष का एक दूत हाथ में रक्त कमल पुष्प लेकर बंगाल की सैनिक छावनी में प्रवेश करता और अपने हाथ का फूल पहली टुकड़ी के मुख्य भारतीय अधिकारी को देता। भारतीय अधिकारी उसे अपने निचले आदमी को देता-और इस तरह वह कमल हर सिपाही के हाथ से होकर अंतिम सिपाही तक और अंतिम सिपाही से फिर आए हुए उस क्रांतिदूत के हाथ लौट आता। बस, इतना काफी था! इस तरह एक शब्द भी बोले बिना वह क्रांतिदूत तीर की तरह आगे बढ़ता और रास्ते में दूसरी टुकड़ी मिलते ही उसके मुखिया के हाथ में वह रक्त कमल दे देता। इस रीति से कमल काव्य में पूर्ण हुआ संगठन क्रांति के एक ही रक्तमय विचार से भर जाता। यह रक्त कमल मानों क्रांति की अंतिम राजमुद्रा ही थी। इस रक्त कमल को स्पर्श करते ही सिपाहियों के मन में किन भावनाओं का उछाल आता, इसकी कल्पना नहीं की जा सकती। वस्तुतः किसी महान् वक्ता को अपने अतुल्य शब्दों से श्रोताओं में जो वीर वृत्ति जागृत कर पाना कठिन था उस वीर वृत्ति का संचार इन लड़ाके सैनिकों में उस निर्वाक् कमल पुष्प ने अपने रक्तिम वर्णीय संकेत से किया। कमल पुष्प! शुचि, यश और प्रकाश का कविजनों का मान्य काव्य प्रतीक! और उसका वर्ण? रक्तोज्ज्वल ! रक्तोज्ज्वल!! उस पुष्प में स्पर्श मात्र से हृदय पुष्प विकसित हो उठे, इतना वह मृदुचेतन! सैकड़ों सिपाहियों द्वारा जब वह कमल पुष्प इस हाथ से उस हाथ में दिया गया होगा तब उस पुष्प के मूक वाक् संदेश से भी बहुत बड़े गूढ़ार्थ एवं उदात्त ध्येय की स्फूर्ति संचरित हो जाती होगी, यह बात निश्चित है। इस रक्त कमल के कारण सबके हृदय सच में एक हो गए। क्योंकि बंगाल में सिपाही और किसान दोनों ही एक ही बात बोलते हुए दिखाई देते कि 'सबकुछ लाल होगा!' सब ओर अब लाल होना है।³⁸ उस रक्त कमल और उसके द्वारा संचरित भावना ने हर व्यक्ति के हृदय में एक ही ध्वनि का निर्माण किया था। सिपाही द्वारा सिपाही को लिखे पत्र भी इसी रीति से लिखे होते थे। परंतु इस संगठन के नेताओं के पत्र अत्यंत महत्त्वपूर्ण होते थे, अतः उन्हें बहुत सावधानी से लिखा जाता। अधिकतर योजना एवं रचना प्रत्यक्ष व्यक्ति भेजकर ही निश्चित की जाती। परंतु पत्र भेजना ही हो तो अत्यंत अस्पष्ट भाषा में लिखे जाते थे। इतना ही नहीं अपितु ये अस्पष्ट पत्र पकड़े जाने पर कदाचित् मुश्किल हो जाएगी, इसलिए चतुर नेता लोग अपना सारा पत्राचार सांकेतिक भाषा में ही करते थे। कुछ बूंदों 1857 का स्वातंत्र्य समर – 88 ³⁸ ट्रेवेलियन कृत-'कानपुर'।

की और आंकड़ों की लिपि बनाकर उसका इस गुप्त संगठन में उपयोग किया जाता।1³⁹ परंतु इन संकेत चिह्नों और इन गुप्त पत्रों में भी जो राष्ट्रीय उद्बोध न दिया जा सका वह उद्बोध हिंदुस्थान की भविष्यवाणी ने दिया। भविष्य कथन मन के आगामी काल में होनेवाली कूद है। मन दिव्यत्व पर भविष्य का दिव्यत्व अवलंबित होता है। सन् 1857 में हिंदुस्थान का मन स्वतंत्रता के प्रकाश से दिव्य हो गया, इसलिए सन् 1857 में हिंदुस्थान के भविष्य कथन में अति महत्त्वपूर्ण और 1857 के इतिहास पर उसके कितने ही पृष्ठों पर मुद्रांकित हुआ वह भविष्य यह था कि कंपनी का राज ठीक सौ साल में समाप्त हो जाएगा। प्लासी की लड़ाई को सन् 1857 में सौ वर्ष पूरे हो रहे थे। अतः इस वर्ष की जनवरी से एक विलक्षण आशा और एक विलक्षण चेतना पूरे दे के कण–कण में संचार कर रही थी। इस एक भविष्य कथन ने देखते–ही–देखते राष्ट्र में ऐसी आशा उछाल दी कि अंग्रेजी राज डूब जाएगा। इस भविष्य काल को वर्तमान काल में बदलने के लिए हर कोई सज्जित होने लगा। सन् 1857 के साल में अंग्रेजी राज डूबेगा, इस भविष्य कथन द्वारा राष्ट्र विभूति को स्वतंत्रता–प्राप्ति के लिए पहले ही तैयार किया गया। वह इसीलिए कि रण–देवता से स्वतंत्रता का दान मिलते ही किसी तरह का आकस्मिक घोटाला न होने पाए; सिपाही, सेनापति, पटेल, जमींदार आदि अंग्रेजी शासन में जिस–जिस पद पर थे उसी पद पर रहकर स्वतंत्र राज्य की सेवा किसी तरह की गड़बड़ी न करते हुए करें, ऐसी योजना बनी थी। गुप्त संगठन के नेताओं ने कितनी कुशलता से सारे राष्ट्र को सूचिबद्ध कर दिया था, इसे ध्यान से देखने पर मन धन्य हो जाता है। जन–क्षोभ को उत्तेजित करने रोज लखनऊ में उत्तेजक और क्रांतिकारी घोषणापत्र लगाए जाते। इन घोषणापत्रों में–सारे भाई एक साथ उठें और हिंदुस्थान का राज्य वापस लें, ऐसा उपदेश अति उत्तेजक भाषा में दिया जाता। सुबह होते ही शहर के हर चौराहे पर इस अर्थ के नए घोषणापत्र और पर्चे लगे मिलते। ये बातें अंग्रेज अधिकारियों के कानों में पहले ही पड़ी होने पर भी उन्हें ये पत्र और उनके लेखकों को गाली देते हुए कुढ़ते रहने के सिवाय कुछ करते बनता नहीं था। क्योंकि पुलिसवाले कहते कि ये पत्र–परचे लिखता कौन है? इसे खोज पाना कठिन है। कुछ ही दिनों में अंग्रेजों को ज्ञात हो गया कि ये पुलिसवाले ही क्रांतिपक्ष के नेता थे। गुलामी की सुरक्षा की अपेक्षा स्वतंत्रता की रक्षा करनेवाले पुलिसवाले रूस की राज्य क्रांति में दिखते हैं, ऐसा नहीं, वे हिंदुस्थान की राज्य क्रांति में भी थे। उत्तरी हिंदुस्थान में जैसे यह गुप्त संगठन कुशलता से खड़ा हो गया था वैसे ही यदि दक्षिण में भी होता तो कैसी बहार आ जाती! 1857 का स्वातंत्र्य समर - 89 ³⁹ 1- इन्स कृत-'सेपॉय रिवॉल्ट', पृष्ठ 55 । 2. रेड पैंफलेट, खंड 2 ।

इस तरह इधर-उधर मन-प्रवर्तन की लहरें उठा देने के बाद श्री नाना साहब फिर सारे केंद्रों को भी सूत्रबद्ध कर डालने के लिए और मुख्य-मुख्य गुप्त संगठनों में एकवाक्यता लाने के लिए ब्रह्मवर्त के बाहर निकले। सन् 1857 के अप्रैल में श्रीमंत अपने साथ अपने भाई बाबा साहब और अपने मंत्री अजीमुल्ला खान को लेकर दिल्ली की ओर गए। दिल्ली के वातावरण में उस समय नाना ने क्या मंत्र पढ़े और दिल्ली के दीवाने-आम में बादशाह से नाना ने क्या निजी बातें की, इसकी स्मृति केवल उस वातावरण और दीवाने-आम को ही होगी! अंग्रेज लोगों में से मोर्लड नाम का अधिकारी आगरा में जज के पद पर था। वह उस समय नाना से मिलने गया था और उसका नाना द्वारा उत्तम स्वागत हुआ था, इस कारण अगले तीन माह बाद अंग्रेजों के कैसे स्वागत की तैयारी नाना कर रहे थे, इसकी उसको हवा भी नहीं लगी। दिल्ली की सारी तैयारी देख और वहां के सारे काम जांच नाना लखनऊ चले गए। सन् 1857 के गुप्त संगठन के केंद्रों में लखनऊ अत्यंत महत्त्वपूर्ण केंद्र था। 18 अप्रैल को नाना साहब लखनऊ की ओर चले। उसी दिन सुबह लखनऊ के चीफ कमिश्नर सर हेनरी लॉरेंस की बग्घी के पीछे दौड़ते हुए लोगों ने उस पर कीचड़ के लड्डू फेंके थे और जल्दी ही इससे अधिक प्रभावी लड्डू कैसे फेंके जाए, यह बताने के लिए नाना की सवारी वहां आई थी। फिर क्या? उस लखनऊ शहर के उत्साह और सहस की कोई सीमा नहीं रही। लखनऊ शहर देखने का अर्थ क्या है, इसकी उस समय उस पगले को क्या कल्पना होती। नाना इसी माह कालपी शहर देखने भी गए। आगे स्वतंत्रता संग्राम में जिन्होंने अपने अतुल देशाभिमान और रण-कुशलता से पूरे जग को चकित किया उस जगदीशपुर के कुंवर सिंह से नाना की राजनीति चल रही थी और उधर के सारे आंदोलन का नक्शा भी इसी समय अंतिम आकार ले पाया था। इस रीति से दिल्ली, लखनऊ, कालपी, जगदीशपुर आदि स्थानों पर स्थित प्रमुख नेताओं से प्रत्यक्ष मिलकर और उनकी सलाह से भावी क्रांति का पक्का नक्शा बनाकर श्री नाना साहब अप्रैल के अंत में ब्रह्मवर्त लौट आए। प्रमुख नेताओं से मिलकर बात पक्की करने नाना साहब जब इधर प्रवास कर रहे थे तब उधर सारे देश में भावी मंगल कार्य की सुपारी देने के लिए राज्य क्रांति के संदेश वाहक अपने कार्य में संलग्न थे। वे आज ही अवतरित हुए हैं, ऐसा बिल्कुल नहीं हैं; क्योंकि वेल्लोर के विद्रोह के पहले भी उधर ऐसी ही रोटियां भेजी गई थी। सन् 1857 के आरंभ में गुप्त पंखों के ये देवदूत सारे हिंदुस्थान में भावी मंगल कार्य का समाचार देते हुए भ्रमण करने लग गए थे। वे कहां से आए और किधर जाएंगे, यह कोई 1857 का स्वातंत्र्य समर - 90

भी नहीं जान पा रहा था। ये देवदूत जिसे समझ में आता उसी को मुख्य संदेश देते और जिसे ठीक न समझते उससे खूब बतियाते। इस विचित्र रोटी को कुछ पगले अंग्रेज अधिकारियों ने पकड़-पकड़कर उसका चूरा किया और फिर उस चूरे का भ चूरा बनाकर उससे कुछ कहलवाने के प्रयास किए; परंतु किसी चुड़ैल की तरह उस चपाती को बोलने को कहते ही वह अपने मुंह की जीभ ही नष्ट कर देती और जिससे मन होता उसी से बोलती। वह रोटी गेहूं या बाजरे के आटे की बनी होती थी। उस पर यद्यपि कुछ भी लिखा हुआ नहीं होता था, फिर भ वह हाथ में आते ही, उसका स्पर्श होते ही हर व्यक्ति की देह में क्रांति चेतना संचार करने लगती। हर गांव में मुखिया के पास वे रोटियां आती। वह स्वयं उसका एक टुकड़ा खाता और उसका प्रसाद के रूप में सारे गांव में बांट देता। फिर उतनी ही जाता रोटियां बनवाकर वे गांववाले पड़ोस के गांव में भिजवा देते। जा, हे क्रांति के देवदूत ! ऐसे ही आगे जा। अपनी प्रिय माता, अपनी स्वतंत्रता के लिए जिहाद करने को तैयार हो गई है, यह शुभ वार्त्ता उसके बच्चों को सुनाने दसों दिशाओं में दौड़कर जा। तुम्हारी मां पर संकट है, अतः उसके बचाव के लिए दौड़! दौड़! ऐसी कर्कश चिल्लाहट करते हुए आधी रात में भी न रुकते निरंतर दौड़ता रह! गढ़ और कोट के दरवाजे बंद हैं, तथापि उनके खुलने तक न रुकते वहां आकाश मार्ग से पहुंच जा। घाटियां गहरी हैं, कगार टूटे हुए हैं, नदियां विराट् हैं, वन भयानक हैं। परंतु इस कारण एक क्षण भी न सहमते हुए यह भयंकर राष्ट्र-संदेश लेकर तू तीर की गति से बढ़ता जा। तेरी गति पर हमारी इस माता का जीवन और मृत्यु अवलंबित है। इसलिए तेरे पंख जितने काट सकें उतनी दूरी कम करते हुए पूरे वातावरण में उड़ान भरता जा। शत्रु ने तेरी दे हके किसी अंग का भंग किया तो भी हे मायावी देवदूत! हमारे राष्ट्र के इस संकट के समय में तू हजारों-लाखों देह धारण कर उस हर देह में जीभ लगाकर बढ़। पत्नी एवं पति, माता एवं बालक, बहन एवं भाई सबको स्वतंत्रता संग्राम की कार्य-सिद्धि के लिए सपरिवार आने का निमंत्रण देना। कानपुर के देवता को बुलाना; शंख, भेरी, दुंदुभि, ध्वज, पताका, रणगीत, गर्जना, गड़गड़ाहट आदि सारे सगे-संबंधियों को इस युद्ध कार्य की इष्ट सिद्धि के लिए बुला लाना। कुल देवता, ग्राम देवता एवं राष्ट्र देवता अपने-अपने अनुचरों सहित स्वातंत्र्य समर के मंगल समारोह के लिए सुसज्ज होकर उत्सुक हैं-उन सबसे कह-'अति समयों वर्तते' सावधान! सावधान, मित्रों! सावधान!! और अपनी ही अकड़ में उस हरे-भरे पर्वत पर षांति से लेटे षत्रुओं, अब सावधान! यह पर्वत ऊपर से जितना हरा-भरा दिखता है उतना ही वह अंदर से भी हरा-भरा होगा, इस विश्वास से* तुम इसके माथे पर लातें मार रहे हो 1857 का स्वातंत्र्य समर - 91

क्या? मारो, वैसे ही मारते जाओ लातें! जल्दी ही तुम्हें कालिदास के शमप्रधानेषु तपोधनेषु गूढं हि दाहात्मकमस्ति तेजः-इस वचन की सच्चाई ज्ञात होगी। हे विश्व! यह हमारा तपोधन हिंदुस्थान शम-प्रधान है, यह सच है; पर इसलिए तुम इसके इस शम-प्रधानत्व का अनुचित लाभ मत उठाना। क्योंकि इस तपोनिधि के शरीर में प्रदाहक, प्रचंड शक्तियां भी गूढ़ता से भरी हुई है। शंकर के तीसरे नेत्र की कथा क्या तुमने कभी सुनी है? वह नेत्र जब तक खुलता नही तब तक बहुत शांत रहता है। परंतु उसके खुलते ही पूरे विश्व को राख करने में सक्षम ज्वालाएं उसी में से निकलती हैं। तूने कभी ज्वालामुखी को देखा है। वह ज्वालामुखी ऊपर से हरा-भरा रहता है, पर यदि वह एक बार अपना जबड़ा खोलने लगे तो उसके उबलते अग्नि रस से दसों दिशाएं जलने लगती हैं। परंतु इस सामान्य ज्वालामुखी से भी जाज्वल्यतर यह हिंदुस्थान का जीवित ज्वालामुखी अब खौलने लग गया है। उसके उदर के भयंकर अग्नि रस में लहरें उठने लगी हैं। उसके दाहक द्रव्य एक-दूसरे में मिल रहे हैं और उनपर स्वातंत्र्य-प्रेम की चिंगारी गिर गई है। उसके मस्तक पर नाचनेवालो, एक क्षण और ˙˙˙˙कि दिग्गजों के कान भी बधिर हो जाएं, ऐसी गड़गड़ाहट होनेवाली है, फिर मदांध जुल्म को यह ज्ञात होगा कि हिंदुस्थान के ज्वालामुखी का प्रतिशोध कैसा होता है। 40 1857 का स्वातंत्र्य समर – 92 40 अंग्रेजों को हिंदुस्थान की मनोवृत्तियां इतनी ज्ञात थीं कि 87 की फरवरी में अंग्रेजी पत्र एवं अंग्रेजी सरकारी रिपोर्ट कहती है-“संपूर्ण देश पूर्णरूपेण शांत है।” –चार्ल्स बाल

भाग-2 विस्फोट