१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)
1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंघूमने लगा था। ऐसे समय में विभिन्न पहियों की गति एक लय में घूमने लगे, ऐसा प्रयास आवश्यक था। इसी उद्देश्य से क्रांति पक्ष का एक दूत हाथ में रक्त कमल पुष्प लेकर बंगाल की सैनिक छावनी में प्रवेश करता और अपने हाथ का फूल पहली टुकड़ी के मुख्य भारतीय अधिकारी को देता। भारतीय अधिकारी उसे अपने निचले आदमी को देता-और इस तरह वह कमल हर सिपाही के हाथ से होकर अंतिम सिपाही तक और अंतिम सिपाही से फिर आए हुए उस क्रांतिदूत के हाथ लौट आता। बस, इतना काफी था! इस तरह एक शब्द भी बोले बिना वह क्रांतिदूत तीर की तरह आगे बढ़ता और रास्ते में दूसरी टुकड़ी मिलते ही उसके मुखिया के हाथ में वह रक्त कमल दे देता। इस रीति से कमल काव्य में पूर्ण हुआ संगठन क्रांति के एक ही रक्तमय विचार से भर जाता। यह रक्त कमल मानों क्रांति की अंतिम राजमुद्रा ही थी। इस रक्त कमल को स्पर्श करते ही सिपाहियों के मन में किन भावनाओं का उछाल आता, इसकी कल्पना नहीं की जा सकती। वस्तुतः किसी महान् वक्ता को अपने अतुल्य शब्दों से श्रोताओं में जो वीर वृत्ति जागृत कर पाना कठिन था उस वीर वृत्ति का संचार इन लड़ाके सैनिकों में उस निर्वाक् कमल पुष्प ने अपने रक्तिम वर्णीय संकेत से किया। कमल पुष्प! शुचि, यश और प्रकाश का कविजनों का मान्य काव्य प्रतीक! और उसका वर्ण? रक्तोज्ज्वल ! रक्तोज्ज्वल!! उस पुष्प में स्पर्श मात्र से हृदय पुष्प विकसित हो उठे, इतना वह मृदुचेतन! सैकड़ों सिपाहियों द्वारा जब वह कमल पुष्प इस हाथ से उस हाथ में दिया गया होगा तब उस पुष्प के मूक वाक् संदेश से भी बहुत बड़े गूढ़ार्थ एवं उदात्त ध्येय की स्फूर्ति संचरित हो जाती होगी, यह बात निश्चित है। इस रक्त कमल के कारण सबके हृदय सच में एक हो गए। क्योंकि बंगाल में सिपाही और किसान दोनों ही एक ही बात बोलते हुए दिखाई देते कि 'सबकुछ लाल होगा!' सब ओर अब लाल होना है।³⁸ उस रक्त कमल और उसके द्वारा संचरित भावना ने हर व्यक्ति के हृदय में एक ही ध्वनि का निर्माण किया था। सिपाही द्वारा सिपाही को लिखे पत्र भी इसी रीति से लिखे होते थे। परंतु इस संगठन के नेताओं के पत्र अत्यंत महत्त्वपूर्ण होते थे, अतः उन्हें बहुत सावधानी से लिखा जाता। अधिकतर योजना एवं रचना प्रत्यक्ष व्यक्ति भेजकर ही निश्चित की जाती। परंतु पत्र भेजना ही हो तो अत्यंत अस्पष्ट भाषा में लिखे जाते थे। इतना ही नहीं अपितु ये अस्पष्ट पत्र पकड़े जाने पर कदाचित् मुश्किल हो जाएगी, इसलिए चतुर नेता लोग अपना सारा पत्राचार सांकेतिक भाषा में ही करते थे। कुछ बूंदों 1857 का स्वातंत्र्य समर – 88 ³⁸ ट्रेवेलियन कृत-'कानपुर'।