भारतकोश
१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished418 पृष्ठ

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की और आंकड़ों की लिपि बनाकर उसका इस गुप्त संगठन में उपयोग किया जाता।1³⁹ परंतु इन संकेत चिह्नों और इन गुप्त पत्रों में भी जो राष्ट्रीय उद्बोध न दिया जा सका वह उद्बोध हिंदुस्थान की भविष्यवाणी ने दिया। भविष्य कथन मन के आगामी काल में होनेवाली कूद है। मन दिव्यत्व पर भविष्य का दिव्यत्व अवलंबित होता है। सन् 1857 में हिंदुस्थान का मन स्वतंत्रता के प्रकाश से दिव्य हो गया, इसलिए सन् 1857 में हिंदुस्थान के भविष्य कथन में अति महत्त्वपूर्ण और 1857 के इतिहास पर उसके कितने ही पृष्ठों पर मुद्रांकित हुआ वह भविष्य यह था कि कंपनी का राज ठीक सौ साल में समाप्त हो जाएगा। प्लासी की लड़ाई को सन् 1857 में सौ वर्ष पूरे हो रहे थे। अतः इस वर्ष की जनवरी से एक विलक्षण आशा और एक विलक्षण चेतना पूरे दे के कण–कण में संचार कर रही थी। इस एक भविष्य कथन ने देखते–ही–देखते राष्ट्र में ऐसी आशा उछाल दी कि अंग्रेजी राज डूब जाएगा। इस भविष्य काल को वर्तमान काल में बदलने के लिए हर कोई सज्जित होने लगा। सन् 1857 के साल में अंग्रेजी राज डूबेगा, इस भविष्य कथन द्वारा राष्ट्र विभूति को स्वतंत्रता–प्राप्ति के लिए पहले ही तैयार किया गया। वह इसीलिए कि रण–देवता से स्वतंत्रता का दान मिलते ही किसी तरह का आकस्मिक घोटाला न होने पाए; सिपाही, सेनापति, पटेल, जमींदार आदि अंग्रेजी शासन में जिस–जिस पद पर थे उसी पद पर रहकर स्वतंत्र राज्य की सेवा किसी तरह की गड़बड़ी न करते हुए करें, ऐसी योजना बनी थी। गुप्त संगठन के नेताओं ने कितनी कुशलता से सारे राष्ट्र को सूचिबद्ध कर दिया था, इसे ध्यान से देखने पर मन धन्य हो जाता है। जन–क्षोभ को उत्तेजित करने रोज लखनऊ में उत्तेजक और क्रांतिकारी घोषणापत्र लगाए जाते। इन घोषणापत्रों में–सारे भाई एक साथ उठें और हिंदुस्थान का राज्य वापस लें, ऐसा उपदेश अति उत्तेजक भाषा में दिया जाता। सुबह होते ही शहर के हर चौराहे पर इस अर्थ के नए घोषणापत्र और पर्चे लगे मिलते। ये बातें अंग्रेज अधिकारियों के कानों में पहले ही पड़ी होने पर भी उन्हें ये पत्र और उनके लेखकों को गाली देते हुए कुढ़ते रहने के सिवाय कुछ करते बनता नहीं था। क्योंकि पुलिसवाले कहते कि ये पत्र–परचे लिखता कौन है? इसे खोज पाना कठिन है। कुछ ही दिनों में अंग्रेजों को ज्ञात हो गया कि ये पुलिसवाले ही क्रांतिपक्ष के नेता थे। गुलामी की सुरक्षा की अपेक्षा स्वतंत्रता की रक्षा करनेवाले पुलिसवाले रूस की राज्य क्रांति में दिखते हैं, ऐसा नहीं, वे हिंदुस्थान की राज्य क्रांति में भी थे। उत्तरी हिंदुस्थान में जैसे यह गुप्त संगठन कुशलता से खड़ा हो गया था वैसे ही यदि दक्षिण में भी होता तो कैसी बहार आ जाती! 1857 का स्वातंत्र्य समर - 89 ³⁹ 1- इन्स कृत-'सेपॉय रिवॉल्ट', पृष्ठ 55 । 2. रेड पैंफलेट, खंड 2 ।