१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)
1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंइस तरह इधर-उधर मन-प्रवर्तन की लहरें उठा देने के बाद श्री नाना साहब फिर सारे केंद्रों को भी सूत्रबद्ध कर डालने के लिए और मुख्य-मुख्य गुप्त संगठनों में एकवाक्यता लाने के लिए ब्रह्मवर्त के बाहर निकले। सन् 1857 के अप्रैल में श्रीमंत अपने साथ अपने भाई बाबा साहब और अपने मंत्री अजीमुल्ला खान को लेकर दिल्ली की ओर गए। दिल्ली के वातावरण में उस समय नाना ने क्या मंत्र पढ़े और दिल्ली के दीवाने-आम में बादशाह से नाना ने क्या निजी बातें की, इसकी स्मृति केवल उस वातावरण और दीवाने-आम को ही होगी! अंग्रेज लोगों में से मोर्लड नाम का अधिकारी आगरा में जज के पद पर था। वह उस समय नाना से मिलने गया था और उसका नाना द्वारा उत्तम स्वागत हुआ था, इस कारण अगले तीन माह बाद अंग्रेजों के कैसे स्वागत की तैयारी नाना कर रहे थे, इसकी उसको हवा भी नहीं लगी। दिल्ली की सारी तैयारी देख और वहां के सारे काम जांच नाना लखनऊ चले गए। सन् 1857 के गुप्त संगठन के केंद्रों में लखनऊ अत्यंत महत्त्वपूर्ण केंद्र था। 18 अप्रैल को नाना साहब लखनऊ की ओर चले। उसी दिन सुबह लखनऊ के चीफ कमिश्नर सर हेनरी लॉरेंस की बग्घी के पीछे दौड़ते हुए लोगों ने उस पर कीचड़ के लड्डू फेंके थे और जल्दी ही इससे अधिक प्रभावी लड्डू कैसे फेंके जाए, यह बताने के लिए नाना की सवारी वहां आई थी। फिर क्या? उस लखनऊ शहर के उत्साह और सहस की कोई सीमा नहीं रही। लखनऊ शहर देखने का अर्थ क्या है, इसकी उस समय उस पगले को क्या कल्पना होती। नाना इसी माह कालपी शहर देखने भी गए। आगे स्वतंत्रता संग्राम में जिन्होंने अपने अतुल देशाभिमान और रण-कुशलता से पूरे जग को चकित किया उस जगदीशपुर के कुंवर सिंह से नाना की राजनीति चल रही थी और उधर के सारे आंदोलन का नक्शा भी इसी समय अंतिम आकार ले पाया था। इस रीति से दिल्ली, लखनऊ, कालपी, जगदीशपुर आदि स्थानों पर स्थित प्रमुख नेताओं से प्रत्यक्ष मिलकर और उनकी सलाह से भावी क्रांति का पक्का नक्शा बनाकर श्री नाना साहब अप्रैल के अंत में ब्रह्मवर्त लौट आए। प्रमुख नेताओं से मिलकर बात पक्की करने नाना साहब जब इधर प्रवास कर रहे थे तब उधर सारे देश में भावी मंगल कार्य की सुपारी देने के लिए राज्य क्रांति के संदेश वाहक अपने कार्य में संलग्न थे। वे आज ही अवतरित हुए हैं, ऐसा बिल्कुल नहीं हैं; क्योंकि वेल्लोर के विद्रोह के पहले भी उधर ऐसी ही रोटियां भेजी गई थी। सन् 1857 के आरंभ में गुप्त पंखों के ये देवदूत सारे हिंदुस्थान में भावी मंगल कार्य का समाचार देते हुए भ्रमण करने लग गए थे। वे कहां से आए और किधर जाएंगे, यह कोई 1857 का स्वातंत्र्य समर - 90