१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)
1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
इस तरह इधर-उधर मन-प्रवर्तन की लहरें उठा देने के बाद श्री नाना साहब फिर सारे केंद्रों को भी सूत्रबद्ध कर डालने के लिए और मुख्य-मुख्य गुप्त संगठनों में एकवाक्यता लाने के लिए ब्रह्मवर्त के बाहर निकले। सन् 1857 के अप्रैल में श्रीमंत अपने साथ अपने भाई बाबा साहब और अपने मंत्री अजीमुल्ला खान को लेकर दिल्ली की ओर गए। दिल्ली के वातावरण में उस समय नाना ने क्या मंत्र पढ़े और दिल्ली के दीवाने-आम में बादशाह से नाना ने क्या निजी बातें की, इसकी स्मृति केवल उस वातावरण और दीवाने-आम को ही होगी! अंग्रेज लोगों में से मोर्लड नाम का अधिकारी आगरा में जज के पद पर था। वह उस समय नाना से मिलने गया था और उसका नाना द्वारा उत्तम स्वागत हुआ था, इस कारण अगले तीन माह बाद अंग्रेजों के कैसे स्वागत की तैयारी नाना कर रहे थे, इसकी उसको हवा भी नहीं लगी। दिल्ली की सारी तैयारी देख और वहां के सारे काम जांच नाना लखनऊ चले गए। सन् 1857 के गुप्त संगठन के केंद्रों में लखनऊ अत्यंत महत्त्वपूर्ण केंद्र था। 18 अप्रैल को नाना साहब लखनऊ की ओर चले। उसी दिन सुबह लखनऊ के चीफ कमिश्नर सर हेनरी लॉरेंस की बग्घी के पीछे दौड़ते हुए लोगों ने उस पर कीचड़ के लड्डू फेंके थे और जल्दी ही इससे अधिक प्रभावी लड्डू कैसे फेंके जाए, यह बताने के लिए नाना की सवारी वहां आई थी। फिर क्या? उस लखनऊ शहर के उत्साह और सहस की कोई सीमा नहीं रही। लखनऊ शहर देखने का अर्थ क्या है, इसकी उस समय उस पगले को क्या कल्पना होती। नाना इसी माह कालपी शहर देखने भी गए। आगे स्वतंत्रता संग्राम में जिन्होंने अपने अतुल देशाभिमान और रण-कुशलता से पूरे जग को चकित किया उस जगदीशपुर के कुंवर सिंह से नाना की राजनीति चल रही थी और उधर के सारे आंदोलन का नक्शा भी इसी समय अंतिम आकार ले पाया था। इस रीति से दिल्ली, लखनऊ, कालपी, जगदीशपुर आदि स्थानों पर स्थित प्रमुख नेताओं से प्रत्यक्ष मिलकर और उनकी सलाह से भावी क्रांति का पक्का नक्शा बनाकर श्री नाना साहब अप्रैल के अंत में ब्रह्मवर्त लौट आए। प्रमुख नेताओं से मिलकर बात पक्की करने नाना साहब जब इधर प्रवास कर रहे थे तब उधर सारे देश में भावी मंगल कार्य की सुपारी देने के लिए राज्य क्रांति के संदेश वाहक अपने कार्य में संलग्न थे। वे आज ही अवतरित हुए हैं, ऐसा बिल्कुल नहीं हैं; क्योंकि वेल्लोर के विद्रोह के पहले भी उधर ऐसी ही रोटियां भेजी गई थी। सन् 1857 के आरंभ में गुप्त पंखों के ये देवदूत सारे हिंदुस्थान में भावी मंगल कार्य का समाचार देते हुए भ्रमण करने लग गए थे। वे कहां से आए और किधर जाएंगे, यह कोई 1857 का स्वातंत्र्य समर - 90
भी नहीं जान पा रहा था। ये देवदूत जिसे समझ में आता उसी को मुख्य संदेश देते और जिसे ठीक न समझते उससे खूब बतियाते। इस विचित्र रोटी को कुछ पगले अंग्रेज अधिकारियों ने पकड़-पकड़कर उसका चूरा किया और फिर उस चूरे का भ चूरा बनाकर उससे कुछ कहलवाने के प्रयास किए; परंतु किसी चुड़ैल की तरह उस चपाती को बोलने को कहते ही वह अपने मुंह की जीभ ही नष्ट कर देती और जिससे मन होता उसी से बोलती। वह रोटी गेहूं या बाजरे के आटे की बनी होती थी। उस पर यद्यपि कुछ भी लिखा हुआ नहीं होता था, फिर भ वह हाथ में आते ही, उसका स्पर्श होते ही हर व्यक्ति की देह में क्रांति चेतना संचार करने लगती। हर गांव में मुखिया के पास वे रोटियां आती। वह स्वयं उसका एक टुकड़ा खाता और उसका प्रसाद के रूप में सारे गांव में बांट देता। फिर उतनी ही जाता रोटियां बनवाकर वे गांववाले पड़ोस के गांव में भिजवा देते। जा, हे क्रांति के देवदूत ! ऐसे ही आगे जा। अपनी प्रिय माता, अपनी स्वतंत्रता के लिए जिहाद करने को तैयार हो गई है, यह शुभ वार्त्ता उसके बच्चों को सुनाने दसों दिशाओं में दौड़कर जा। तुम्हारी मां पर संकट है, अतः उसके बचाव के लिए दौड़! दौड़! ऐसी कर्कश चिल्लाहट करते हुए आधी रात में भी न रुकते निरंतर दौड़ता रह! गढ़ और कोट के दरवाजे बंद हैं, तथापि उनके खुलने तक न रुकते वहां आकाश मार्ग से पहुंच जा। घाटियां गहरी हैं, कगार टूटे हुए हैं, नदियां विराट् हैं, वन भयानक हैं। परंतु इस कारण एक क्षण भी न सहमते हुए यह भयंकर राष्ट्र-संदेश लेकर तू तीर की गति से बढ़ता जा। तेरी गति पर हमारी इस माता का जीवन और मृत्यु अवलंबित है। इसलिए तेरे पंख जितने काट सकें उतनी दूरी कम करते हुए पूरे वातावरण में उड़ान भरता जा। शत्रु ने तेरी दे हके किसी अंग का भंग किया तो भी हे मायावी देवदूत! हमारे राष्ट्र के इस संकट के समय में तू हजारों-लाखों देह धारण कर उस हर देह में जीभ लगाकर बढ़। पत्नी एवं पति, माता एवं बालक, बहन एवं भाई सबको स्वतंत्रता संग्राम की कार्य-सिद्धि के लिए सपरिवार आने का निमंत्रण देना। कानपुर के देवता को बुलाना; शंख, भेरी, दुंदुभि, ध्वज, पताका, रणगीत, गर्जना, गड़गड़ाहट आदि सारे सगे-संबंधियों को इस युद्ध कार्य की इष्ट सिद्धि के लिए बुला लाना। कुल देवता, ग्राम देवता एवं राष्ट्र देवता अपने-अपने अनुचरों सहित स्वातंत्र्य समर के मंगल समारोह के लिए सुसज्ज होकर उत्सुक हैं-उन सबसे कह-'अति समयों वर्तते' सावधान! सावधान, मित्रों! सावधान!! और अपनी ही अकड़ में उस हरे-भरे पर्वत पर षांति से लेटे षत्रुओं, अब सावधान! यह पर्वत ऊपर से जितना हरा-भरा दिखता है उतना ही वह अंदर से भी हरा-भरा होगा, इस विश्वास से* तुम इसके माथे पर लातें मार रहे हो 1857 का स्वातंत्र्य समर - 91
क्या? मारो, वैसे ही मारते जाओ लातें! जल्दी ही तुम्हें कालिदास के शमप्रधानेषु तपोधनेषु गूढं हि दाहात्मकमस्ति तेजः-इस वचन की सच्चाई ज्ञात होगी। हे विश्व! यह हमारा तपोधन हिंदुस्थान शम-प्रधान है, यह सच है; पर इसलिए तुम इसके इस शम-प्रधानत्व का अनुचित लाभ मत उठाना। क्योंकि इस तपोनिधि के शरीर में प्रदाहक, प्रचंड शक्तियां भी गूढ़ता से भरी हुई है। शंकर के तीसरे नेत्र की कथा क्या तुमने कभी सुनी है? वह नेत्र जब तक खुलता नही तब तक बहुत शांत रहता है। परंतु उसके खुलते ही पूरे विश्व को राख करने में सक्षम ज्वालाएं उसी में से निकलती हैं। तूने कभी ज्वालामुखी को देखा है। वह ज्वालामुखी ऊपर से हरा-भरा रहता है, पर यदि वह एक बार अपना जबड़ा खोलने लगे तो उसके उबलते अग्नि रस से दसों दिशाएं जलने लगती हैं। परंतु इस सामान्य ज्वालामुखी से भी जाज्वल्यतर यह हिंदुस्थान का जीवित ज्वालामुखी अब खौलने लग गया है। उसके उदर के भयंकर अग्नि रस में लहरें उठने लगी हैं। उसके दाहक द्रव्य एक-दूसरे में मिल रहे हैं और उनपर स्वातंत्र्य-प्रेम की चिंगारी गिर गई है। उसके मस्तक पर नाचनेवालो, एक क्षण और ˙˙˙˙कि दिग्गजों के कान भी बधिर हो जाएं, ऐसी गड़गड़ाहट होनेवाली है, फिर मदांध जुल्म को यह ज्ञात होगा कि हिंदुस्थान के ज्वालामुखी का प्रतिशोध कैसा होता है। 40 1857 का स्वातंत्र्य समर – 92 40 अंग्रेजों को हिंदुस्थान की मनोवृत्तियां इतनी ज्ञात थीं कि 87 की फरवरी में अंग्रेजी पत्र एवं अंग्रेजी सरकारी रिपोर्ट कहती है-“संपूर्ण देश पूर्णरूपेण शांत है।” –चार्ल्स बाल
भाग-2 विस्फोट
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प्रकरण-9 शहीद मंगल पांडे सन् 1857 के क्रांतियुद्ध के इतिहास में एक आश्चर्यजनक बात थी उसकी परम गोपनीयता। पूरे युद्ध की रचना गुप्त रीति से हुई। सारे हिंदुस्थान भर में क्रांति रचना का दौर-दौरा चलते हुए भी अंग्रेजों जैसे धूर्त राज्यकर्ताओं को उस विद्रोह की इतनी कम जानकारी मिल पाई थी कि प्रत्यक्ष विद्रोह होने के एक वर्ष बीत जाने के बाद भी अंग्रेजों के अनेक अधिकारियों को विद्रोह का प्रमुख कारण कारतूस ही लगता था। कारतूस कितना निमित्त मात्र कारण था, यह अब कहीं जाकर अंग्रेजी इतिहासकारों को ज्ञात होने लगा है और सन् 1857 के भयंकर युद्ध में स्वदेशाभिमान और स्वधर्माभिमान का पवित्र स्फुरण उन योद्धाओं में कैसे संचरित हुआ था, यह स्पष्ट रीति से कुछ इतिहासकार डरते-डरते अब स्वीकार करते हैं।41 1857 का स्वातंत्र्य समर – 95 41 मैलसन ने लिखा है-"एक बहाने मात्र के रूप में ही और केवल इसी रूप में ही कारतूस क्रांति का कारण सिद्ध हुए थे। षड्यंत्रकारियों ने इस बहाने का पूर्ण लाभ उठाया था और उन्हें यह अवसर इसलिए उपलब्ध हुआ था, जैसाकि मैंने सिद्ध करने का प्रयास भी किया है कि सैनिकों तथा जनता के कतिपय वर्गों के मन में यह विश्वास बद्धमूल करा दिया गया था कि उनके विदेशी स्वामी प्रत्येक कार्य ही दृष्ट हेतु को लेकर कर रहे हैं। मेडली ने अपनी पुस्तक में लिखा है-'वस्तुतः चरबी से चिकने किए गए कारतूसों की बात ने तो केवल उस सुरंग में अंगार मात्र ही लगाया था जिसका निर्माण अनेक द्वारा किया गया था।" श्री डिजराइली ने तो सुस्पष्ट शब्दों में इस धारणा को अस्वीकार किया था कि "चिकने कारतूस ही इस विद्रोह का मूल कारण थे।" -चार्ल्स बाल कृत- 'इंडियन म्युटिनी', खंड 1, पृष्ठ 629
हिंदुस्थान जैसे विस्तीर्ण देश में राज्य क्रांति जैसे गंभीर काम को अंग्रेजों जैसे धूर्त अधिकारियों को हवा भी न लगने देते हुए इतनी गोपनीयता से संगठित करने का कार्य जिन्होंने किया उन श्रीमंत नाना साहब, मौलवी अहमद शाह, वजीर अली नक्की खान आदि नेताओं की जितनी प्रशंसा की जाए, वह कम है। सिपाही, पुलिस, जमींदार, राजस्व अधिकारी, किसान, व्यापारी, साहूकार आदि सारे वर्गों में और हिंदू और मुसलमान इन दोनों जातियों में अपूर्व दोस्ती और प्रचंड क्रांति के बीज बो दिए और वे बीज अंकुरित होते ही उन सबने उत्कृष्ट संगठन कर अंग्रेजों को उस प्रचंड हलचल की हवा भी लगने नहीं दी। यह गुप्त संगठन पूर्ण आकार ले पाए, इससे पहले 19 वीं पलटन पर प्रयोग किया जाएगा, ऐसा रंग दिखने लगा। बंगाल में फरवरी माह में सारी पलटनों की अपेक्षा 34वीं पलटन राज्य क्रांति के लिए अति उत्सुक हो गई थी। इस 34वीं पलटन का मुख्यालय बैरकपुर में होने से और वजीर अली नक्की खान उसके पास कलकत्ता में होने से उन्होंने सारी पलटन को शपथपूर्वक राज्य क्रांति-कार्य से जोड़ लिया था। इस पलटन की कुछ टुकड़ियां 19 वीं पलटन में भेजी गई थी। इस कारण उन टुकड़ियों ने 19 वीं पलटन को भी राष्ट्रकार्य में खींच लिया। परंतु परिस्थिति यह हो गई कि राज्य क्रांति की प्रचंड घटना की बिल्कुल भनक न लगने, अंग्रेज अधिकारियों को उसकी कोई जानकारी न होने से उन्होंने उस 19 वीं पलटन में भेजी गई थी। इस कारण उन टुकड़ियों ने 19वीं पलटन पर ही कारतूसों का पहला प्रयोग किया। परंतु वे कारतूस लेने से वह पलटन खुले रूप से मुकर गई और समय आया तो शस्त्र उठाने तक का अपना निश्चय है, यह प्रकट किया। वह कृत्य देखते ही हमेशा की तरह अंग्रेजों ने 'नेटिवों' को धौंस-पट्टी दिखाना चालू किया। परंतु अब वहां पहले के 'नेटिव' नहीं थे, यह बात उस पलटन में हो रही तलवारों की खनखनाहट से जल्दी ही गोरे अधिकारियों की समझ में आ गई। अब यह मानभंग चुपचाप पी जाने के सिवाय दूसरा रास्ता नहीं था; क्योंकि उस सारे प्रदेश में ऐसी एक भी पलटन नहीं थी जो इस नेटिव सेना को नियंत्रण में रख सके। यह बाधा दूर करने के लिए मार्च के प्रारंभ में ब्रह्मदेश में स्थित फिरंगी पलटन कलकत्ता लाई गई और 19वीं पलटन को निःशस्त्र कर काम से हटाने का आदेश जारी हुआ। इस आदेश पर कार्यवाही बैरकपुर में की जाए, यह निश्चित किया गया। 42 1857 का स्वातंत्र्य समर - 96 42 इससे भी एक पग आगे रखकर एक लेखक ने अपने ग्रंथ में लिखा है-“यह तो असंदिग्ध रूप से सिद्ध कर दिया गया है कि कारतूसों का भय था, तो अनेक के लिए बहाना मात्र ही था। जिन कारतूसों की टोपी दांत से तोड़ने पर अपने धर्म से ही हाथ धो बैठने का भय निर्माण कर बात का बतंगड़ बनाया गया था, हमसे युद्ध करते समय उन्हीं को वे ही सिपाही हमपर चलाते समय किसी प्रकार के संकोच का प्रदर्शन नहीं करते थे।”
अपने बंधुओं को अपनी आंखों से सामने दंडित किया जाएगा, यह सुनकर भी शांत रहनेवाला बैरकपुर नहीं था। वहां स्वतंत्रता की ज्योति हर तलवार में चमकने लग गई थी। परंतु इन सबसे अधिक मंगल पांडे की तलवार म्यान में अधीर हो रही थी। 19वीं पलटन की तरह ही 34वीं पलटन को भी समय आते ही कंपनी की नौकरी को लात मारकर निकल जाने की इच्छा थी। इसलिए 19वीं पलटन को कंपनी अपने आप ही निकाल रही है, यह बहुत बढ़िया हो रहा है-ऐसा सारे स्वदेशाभिमानियों को लग रहा था। सब ओर का एकमत होने तक एक माह रूका जाए, ऐसा चतुर नेता कह रहे थे और सारे हिंदुस्थान में अलग-अलग पलटनों में कौन सा दिन निश्चित किया जाए, को धीरज कौन बंधाएं? मंगल पांडे ब्राह्मण कुल में जनमा और क्षात्रधर्म में दीक्षित हट्टा-कट्टा जवान था। स्वधर्म पर प्राणों से अधिक निष्ठा रखनेवाला, आचरण से सुशीलवान, स्वभाव से तेजस्वी और आयु से तरूण मंगल पांडे के पवित्र रक्त में देश - स्वातंत्र्य की विद्युत चेतना प्रवेश कर गई थी। फिर उसकी तलवार कैसे धीरज रखे? शहीदों की तलवार को कभी धैर्य रहता है क्या! जय-पराजय की रत्ती भर भी परवाह न करते हुए अपनी तत्त्वनिष्ठा पर जो स्वयं के रक्त का अभिषेक करते हैं, ऐसे ही लोगों के सिर पर बलिदानी मुकुट झिलमिलाता है और इस निष्फल-से लगते उष्ण रक्त से ही विजय की मूर्ति प्रकट हुआ करती है। अपने स्वदेश बंधुओं का अपनी आंखों के सामने अपमान हो, यह बात मंगल पांडे के अंतरतम को असह्य पीड़ा देने लगी और अपनी रेजिमेंट उसी दिन विद्रोह करे, वह ऐसा आग्रह करने लगा। गुप्त समिति के नेता आज विद्रोह करने को अनुमति नहीं दे रहे हैं, ऐसा ज्ञात होते ही उस जवान का साहस रुकना दुष्कर हो गया। उसने लपककर अपनी बंदूक उठाई और 'मर्द हो वो उठो', ऐसी गर्जना करते हुए परेड मैदान में कूद पड़ा। “अरे, अब पीछे क्यों रहते हो? भाइयों, आओ, टूट पड़ो। तुम्हें तुम्हारे धर्म की सौगंध है-चलो, अपनी स्वतंत्रता के लिए शत्रु पर टूट पड़ो।” ऐसी गर्जना करते हुए वह अपने स्वदेश बंधुओं को अपने पीछे आने का आह्वान करने लगा। यह देखते ही सार्जेंट मेजर ह्यूसन ने सिपाहियों को मंगल पांडे को पकड़ने का आदेश दिया। परंतु अंग्रेजों को आज तक मिले देशद्रोही सिपाही मंगल पांडे को पकड़ने नहीं हिला। और इधर मंगल पांडे की बंदूक से सन्-सन् करके निकली गोली ने उस ह्यूसन का शव तत्काल भूमि पर पटक दिया। यह गड़बड़ हो ही रही थी कि इतने में लेफ्टिनेंट बॉ भी वहां आ गया। इससे पहले कि उसका घोड़ा नाचते-नाचते आगे सरकता, मंगल पांडे की बंदूक से दूसरी गोली छूटी और वह उस घोड़े के पेट में घुसते ही घोड़ा लेफ्टिनेंट को लेकर धड़ाम से गिरा। मंगल पांडे को बंदूक भरने का अवसर मिले, इसके
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पहले ही धूल में पड़े लेफ्टिनेंट ने अपनी पिस्तौल निकाल ली। यह देखते ह मंगल पांडे ने तिल भर भी डगमगाए बिना अपनी शमशीर निकाली। बॉ ने पिस्तौल चलाई, पर गोली चूक गई और वह तलवार निकाले, उसके पहले ही मंगल पांडे की तलवार का बार हुआ और बॉ मिट्टी सूंघने लगा। इतने में मंगल पांडे पर उस पहलेवाले गोरे की हमले की तैयारी में बढ़ता देख पास के एक सिपाही ने बंदूक के दस्ते से उसका सिर फोड़ दिया और सारे सिपाहियों ने गर्जना की-'मंगल पांडे को कोई हाथ न लगाए।' तभी कर्नल हीलर वहां आया और मंगल पांडे को पकड़ने का आदेश देने लगा। "हम अपने आदरणीय ब्राह्मण के बाल को भी नहीं छुएंगे", फिर ऐसी गर्जना हुई और अंग्रेजों के गाढ़े लाल रक्त के उस दृष्य के आगे अधिक न रूकते हुए वह कर्नल जनरल के बंगले की ओर भाग गया। इधर मंगल पांडे अपने रक्तरंजित हाथ उठाकर- "मर्दों, बढ़ो!" ऐसी भयानक गर्जना करते हुए इधर-उधर घूम रहा था। जनरल हीर्से को यह समाचार मिलते ह ीवह कुछ और युरोपियन सैनिक लेकर मंगल पांडे की ओर दौड़ता आया। अब निश्चित ही षत्रु पकड़ लेगा, यह जान उस देशवीर मंगल पांडे ने फिरंगियों के हाथों पकड़े जाने की अपेक्षा मृत्यु को अपनाने का निश्चय किया और अपनी बंदूक अपने ही सीने की ओर कर ली और तत्काल उसकी पवित्र देह घायल होकर गिर गई। तुरंत उस घायल युवक को अस्पताल ले जाया गया; और उस एक सिपाही ने जो बहादुरी दिखाई उससे लज्जित होकर सारे अंग्रेज अधिकारी अपने-अपने तंबू में चले गए। यह सन् 1987 के मार्च की 29 तारीख थी। मंगल पांडे का कोर्ट मार्शल कर जांच-पड़ताल हुई। उस जांच में वह अन्य षड़यंत्रकारियों के नाम बताएं, इसके लिए बहुत प्रयास हुए। परंतु उस तेजस्वी युवक ने 'वह किसी के भी नाम बताने को तैयार नहीं है, 'यह उत्तर दिया। उसने यह भी बताया कि मैंने जिनपर गोलियां चलाई उन अंग्रेज अधिकारियों से मेरा किसी तरह का व्यक्तिगत द्वेष नहीं था। यदि व्यक्तिगत द्वेष होता तो उनकी हत्या खून मानी जाती। मंगल पांडे का मंगल नाम शहीदों की सूची में न जाकर खूनी मनुष्यों की सूची में डालना पड़ता। परंतु मंगल पांडे का वह साहस सिद्धांतों के लिए था। स्वदेश और स्वधर्म की रक्षा के लिए सुखे-दुःखे समे कृत्वा' मंगल पांडे की तलवार म्यान से बाहर निकली थी। स्वदेश ओर स्वधर्म का अपमान देखने से मृत्यु भली है-यह वज्र निश्चय करके ही वह बाहर निकला था। इस कार्य में जैसी उसकी स्वदेश-भक्ति और स्वधर्म-प्रीति दिखाई दी, वैसा ही उस युवा की तलवार का पानी भी दिखाई दिया। ऐसे युवा को फांसी का दंड सुनाया गया। दिनांक 8 अप्रैल उसकी फांसी के लिए तय हुआ। शहीदों के रक्त में क्या तेज होता है, यह तो ज्ञात नहीं, परंतु उसके नाम-स्मरण से भी मन की उदात्त वृत्तियां खिलने लगती हैं। परंतु जिनकी दृष्टिट को मंगल पांडे के प्रत्यक्ष दर्षन का लाभ हुआ था- 1857 का स्वातंत्र्य समर - 98
बैरकपुर के ऐसे सारे नागरिकों के हृदय में उसके प्रति दिव्य प्रीति उत्पन्न हुई हो तो इसमें क्या आश्चर्य! उस सारे बैरकपुर षहर में मंगल पांडे को फांसी देने के लिए एक भी जल्लाद नहीं मिला। अंत में उस अमंगल कार्य के लिए कलकत्ता से चार जल्लाद लाए गए। दिनांक 8 अप्रैल को सुबह मंगल पांडे को फांसी-स्थल की ओर ले जाया गया। चारों ओर लष्करी लोगों का पहरा था। उनके बीच से मंगल पांडे गर्व से चलता चला गया और फांसी पर चढ़ गया। “मैं किसी के नाम नहीं बताऊंगा,” यह एक बार फिर से कहते ही उसके पैर के नीचे का सहारा निकाल लिया गया और मंगल पांडे की देह से उसकी पवित्र आत्मा स्वर्ग चली गई। इस तरह सन्1857 के क्रांतियुद्ध की पहली भिड़त हुई और इस रीति से उस क्रांतियुद्ध का पहला षहीद स्वर्गवासी हो गया। जिसके रक्त से सन् 1857 की षहादत की नदी का उद्गम हुआ उस देषवीर, धर्मवीर मंगल पांडे का नाम हर एक के कंठ एवं हृदय में अक्षय बना रहना चाहिए। सन् 1857 में हिंदुस्थान के स्वतंत्रता बीज में अंकुर फोड़ने के लिए मंगल पांडे ने अपना उश्ण रक्त सबसे पहले अर्पित किया। उस स्वतंत्रता की फसल आगे-पीछे कभी लहलहा उठी तो उसके पहले नैवेद्य का अधिकारी मंगल पांडे है। मंगल पांडे नहीं है, पर उसका चैतन्य सारे हिंदुस्थान में फैला हुआ है और जिस सिद्धांत के लिए मंगल पांडे मरा वह सिद्धांत चिरंजीवी हो गया है। मंगल पांडे ने सन् 1857 के क्रांतियुद्ध को अपना रक्त दिया, इतना ही नहीं अपितु उस क्रांति में जो-जो स्वदेश के और स्वधर्म के लिए लड़े उन सबको 'पांडे' उपाधि लगाने का प्रयत्न षुरू हो गया।43 और इसीलिए यह नाम हर माता अपनी संतान को साभिमान बताने लगी। 1857 का स्वातंत्र्य समर – 99 43 “यह नाम भारत भर में सभी विद्रोही सिपाहियों के लिए उपनाम के रूप में ख्याति प्राप्त कर गया।” –चार्ल्स बाल “सिपाहियों को सामान्यतः 'पांडे कहकर संबोधित किए जाने का उद्गम स्थल यह नाम ही था।” –लॉर्ड रॉबर्ट कृत–'फोरटी वन ईयर इन इंडिया'
प्रकरण-२ मेरठ देशवीर मंगल पांडे के बलिदान से सन् 1857 का बीज जमते ही उसे अंकुरित होने में देर क्यों हो? जिस 19वीं रेजिमेंट में मंगल पांडे था उस रेजिमेंट के सूबेदार को भी इस आरोप में फांसी दी गई कि उसने रात में क्रांतिकारी बैठकें कीं और 19वीं रेजिमेंट व 34वीं रेजिमेंट इन दोनों ने मिलकर पूरे प्रदेश में विद्रोह करने का गुप्त षड्यंत्र रख-यह उनके पास मिले कागज-पत्रों से सिद्ध हो जाने पर उन्हें निःशस्त्र कर नौकरी से निकाल देने का दंड दिया गया। सरकार के हिसाब से वह दंड था; परंतु इन दोनों ही रेजिमेंट के सिपाहियों को यह अपना बड़ा सम्मान लग रहा था। जिस दिन उन्हें शस्त्र नीचे रखने का आदेश हुआ उस दिन युरोपियन सेना को पूरी तरह तैयार रखा गया था। अंग्रेज अधिकारियों को विश्वास था कि नौकरी से निकाल देने के दंड से सिपाही पश्चात्ताप करेंगे; परंतु उन हजारों सिपाहियों ने किसी बहुत ही अपवित्र वस्तु की तरह कंपनी की दासता पर खुशी से लात मारी। अपने बूट और यूनिफार्म फाड़-फूड़कर फेंक दिए। उन सिपाहियों को अपने वेतन से सैनिक टोपियां लेनी पड़ती थी। अतः उसे उनकी निजी संपत्ति मान कंपनी ने उन्हें छूट दी थी कि वे चाहें तो उसे ले जाएं । परंतु नदी में नहाकर बाहर आने के बाद फिर से गुलामी का चिह्न को स्पर्श किया तो। अब हिंदुस्थान को कोई दूसरा आकर टोपी पहनाए, वे दिन लद गए हैं। फेंक दो दासता की टोपियां। हजारों टोपियां आकाश में दिखने लगी। परंतु गुरूत्वाकर्षण के जिददी स्वभाव के कारण वे फिर से हिंदुस्थान की भूमि पर ही गिरी। फिर से भू देवी को 1857 का स्वातंत्र्य समर - 100
दासता की छूत लगी। दोड़ो सिपाहियों, उन दास्य चिन्हों को उन अंग्रेजी अधिकारियों के सामने फाड़कर और पैरों तले कुचलकर धूल में मिला दो। हजारों सिपाही उन दास्य-दूषित टोपियों को कुचलने लगे और बलहीन हुए अंग्रेज अधिकारी अपनी सत्ता का खुला अपमान करता यह भारतीय नृत्य देखते रहे।⁴⁴ उत्तर प्रदेश के उच्च पुरबिया ब्राह्मण कुल में जनमे मंगल पांडे का रक्त केवल बंगाल में ही स्वतंत्रता के बीज नहीं जमा रहा था, उधर अंबाला में भी उसकी विद्युत चेतना का संचार हो गया था। अंबाला में सिपाहियों ने एक नई पद्धति चालू की थी। वह था-यदि कोई अधिकारी उनके विरूद्ध जाए तो उसका घर-बार जलाकर भस्म कर डालना। रोज रात को देशद्रोहियों और विदेशियों के घर जलने लगे। यह काम इस झटके से और गुप्त ढंग से होता मानो प्रत्यक्ष अग्नि नारायण ही क्रांति पक्ष की गुप्त समिति का सदस्य बन गया है। बहुत आग गली और जो आग लगानेवाले को पकड़वा देगा, उसको हजारों रुपयों के इनाम भी घोषित किए गए। पर एक आदमी भी सूचना न देता। अंत में परेशान होकर स्वयं कमांडर-इन-चीफ ॲन्सन गवर्नर जनरल को लिखता है- “It is really strange that the incendiaries should never be detected. Everyone is on the alert here, but still there is no clue to trace the offenders.” फिर अप्रैल के अंत में वह लिखता है – “We have not been able to detect any of the incendiaries at Ambala. This appears to me extraordinary; but it shows how close the combinations among the conceive to be their wrongs and how great the dread of retaliation to any one who would dare to become an informer.” हिंदुस्थान के देशद्रोहियों पर तो अंग्रेजी साम्राज्य आधारित था! परंतु अंबाला में एक भी देशद्रोही न मिला। इससे स्वयं कमांडर-इन-चीफ गऊ बन गया और सिपाहियों के गुप्त षड्यंत्र की स्तुति करते हुए उनपर गुस्सा करता रहा तो इसमें आश्चर्य की बात क्या थी! अब यह आग हिंदुस्थान में जगह-जगह आरंभ हो गई थी। अंतिम विशाल आग भड़काने के पहले इधर-उधर छोटी-बड़ी गड़बड़ शुरू हो गई थी। अंबाला की भांति वहां भी अधिकारियों और देशद्रोहियों के घर सुलगने लगे थे। दिनांक 31 मई को सारा हिंदुस्थान एक साथ सुलगा दिया जाए, जिससे इधर-उधर जान छिपाने का अवसर न पाकर परतंत्रता अंदर-ही-अंदर राख हो जाएगी, यह निर्धारित योजना-लखनऊ की गुप्त समिति को यद्यपि मान्य थी, फिर भी वहां के तेजस्वी सिपाही बहादुरों को अपना गुस्सा दबाए रखना कठिन हो गया। उसमें भी हर रात की गुप्त सभाओं में चल रहे उद्दीपक भाषणों और जलनेवाले घरों के भयंकर दृश्यों से सिपाहियों को रुकना और अपने को रोकना कठिन 1857 का स्वातंत्र्य समर – 101 ⁴⁴ रेड पैफलेट, खंड 1, पृष्ठ 34।
हो गया। मई की 3 तारीख को ऐसे ही चार अटल सिपाही बहादुर बलपूर्वक लेफ्टिनेंट मेशम के तंबू में घुसे और बोले, “आपसे यद्यपि हमारा कोई व्यक्तिगत द्वेष नहीं हैं, फिर भी चूंकि आप फिरंगी हैं, इसलिए आपको मरना होगा।”⁴⁵ राक्षस रूप में आए उन सिपाहियों को देखते ही भयभीत हुआ वह लेफ्टिनेंट उनसे घिघियाकर कहने लगा, “आप चाहें तो मुझे एक क्षण में मार सकते हैं, परंतु मुझ गरीब को मारने से आपको क्या मिलेगा? दूसरा कोई आएगा और मेरा काम करने लगेगा। अपराध मेरा न होकर इस राज्य व्यवस्था का है। फिर मुझे क्यों नहीं छोड़ते?” इन बातों से सिपाही बहादुर थोड़े होश में आए और सारी राज्य व्यवस्था को एकदम मारना चाहिए, यह मानकर लौट आए। पर यह बात अधिकारियों तक गई और तुरंत ही हेनरी लॉरेंस ने पलटन को धोखे से तोपखाने की मार में खड़ा करके निःशस्त्र कर दिया। परंतु मेरठ की ओर तो दांव इससे भी अधिक रंगत पकड़ रहा था। कारतूसों के संबंध में सिपाही वास्तविक शिकायत करते हैं या नहीं, यह पक्का जानने के लिए एक टुकड़ी को वे कारतूस देने का निश्चय किया। उस परेड में आए नब्बे सिपाहियों में से पूरे पांच ने भी उन कारतूसों को नहीं छुआ। परंतु वे कारतूस फिर से दिए गए। फिर से सिपाहियों ने उन्हें स्पर्श करने से मना किया और वे अपने-अपने स्थान पर चले गए। उनका यह आचरण जनरल के कानों तक जाते ही उसने कोर्ट मार्शल के सामने उस सारे सिपाहियों को खड़ा कर पचासी घुड़सवारों को आठ से दस वर्ष तक सश्रम कारावास का दंड दिया। मई की 9 तारीख को एक हृदयद्रावक घटना घटी। यूरोपियन कंपनी और तोपखाने की मार के पहरे में ऊंचाई पर पचासी सिपाहियों को खड़ा किया गया। शेष नेटिव सिपाहियों को यह तमाशा देखने को जान-बूझकर बुलाया गया और फिर उन पचासी देशभक्त सैनिकों को अपने कपड़े उतरवाकर लोहे की भारी-भारी बेड़ियां उनके पैरों और हाथों में ठोंक दी गई। शत्रु की छाती में घुसनेवाली तलवार के सिवाए जिनके हाथों में अन्य कुछ भी न पड़ा था, अपने उन मर्द स्वदेश बंधुओं के हाथ में आज फिरंगियों ने लोहे की बेड़ियां ठोक दीं, यह देखकर सारे भारतीय सिपाहियों के शरीर थर्रा उठे। पर सामने ही खड़ी तोपों को देखकर हर तलवार म्यान में ही फड़फड़ाती रही। फिर उन पचासी शूर सिपाहियों को-तुम्हें दस वर्ष के कठोर कारावास का दंड दिया गया है-यह सुनाया गया और हाथ-पैर की भारी-भारी बेड़ियों के बोझ तले झुके वे धर्मवीर 1857 का स्वातंत्र्य समर - 102 ⁴⁵ “व्यक्तिगत रूप से तो तुम्हारे प्रति मन में कोई द्वेष भावना नहीं है; किंतु तू फिरंगी है, अतः तुझे मरना ही चाहिए।” -चार्ल्स बाल कृत-'इंडियन म्यूटिनी', खंड 1, पृष्ठ 42
कारावास की ओर चल दिए। उस समय अपने धर्म की रक्षा के लिए कारावास में जा रहे उन सिपाहियों को स्वदेश बंधुओं ने कैसे नेत्र संकेत किए, यह भविष्य शीघ्र ही कहेगा। गाय और सूअर के रक्त से बने कारतूस अपने पर जबरन लादे जाएं और उसे कोई रोके तो उसे दस वर्ष के कठोर कारावास का दंड भुगतना पड़े, ऐसा भयंकर अपराध जिस दासता में होता है, उस फिरंगी दासता का हम टेंटुआ दबाएंगे और दस वर्ष के लिए तुम्हें पहनाई गई बेड़ियां और सौ वर्षों से अपनी मातृभूमि के पैरों में पड़ी गुलामी की बेड़ियां इन दोनों को जल्दी ही तोड़ देंगे, यह उन नेत्र संकेतों का अर्थ हो सकता है। यह घटना प्रातःकाल की थी। प्रिय देशबंधुओं को अपनी आंखों के सामने परदेशी और परधर्मी लोग बेड़ियां डालकर कारावास में डालें और उस दृश्य को खुली आंखों से देखें, इसका दुःख झेलते, मन-ही-मन जलते सिपाहियों का अपनी-अपनी बैरकों में लौटते ही धीरज टूटने लगा। शहर के बाजार में वे गए तो वहां की महिलाएं उनका तिरस्कार कर कहने लगी-‘‘तुम्हारे बाप कारावास में भेजे गए हैं और तुम यहां मक्खियां मारते फिर रहे हो। थू तुम्हारी जिंदगी पर!!’’46 पहले ही गुस्से से पगलाए सिपाहियों को यह कैसे सहन होता कि रास्ते में औरतें उनके जीवन पर थूकें! उस दिन रात में सारी लाइन पर सिपाहियों की गुप्त बैठकें होती रही। क्या अब भी मई की 31 तारीख तक रुकना है!? इधर अपने भाइयों के कारावास में पड़े होते हुए हम नामर्दों की तरह चुप होकर बैठें! रास्ते में औरतें-बच्चे अपने पर देशद्रोही कहकर थूकने लगें, फिर भी दूसरों की राह देखते चुप बैठना? 31 मई की तारीख अभी कितनी दूर है। तब तक उन फिरंगियों के झंडे तले रहना? नहीं-नहीं, कल ही रविवार है। इस रविवार का सूर्य नारायण अस्तमान होने के पहले कारावास के उन देशवीरों की बेड़ियां टूट ही जानी चाहिए। स्वदेश जननी की बेड़ियां टूटनी ही चाहिए और स्वतंत्रता का झंडा लहराना ही चाहिए। तत्काल दिल्ली संदेश भेजे गए-‘‘हम तारीख 11 या 12 को वहां आ रहे हैं; सारी तैयारी करके रखो।—’’ 10 मई का रवि उदय हुआ। सन् 1857 की गुप्त तैयारी की अंग्रेजों को इतनी कम जानकारी थी कि मेरठ के सिपाहियों की दूसरों से तो क्या आपस में भी कुछ सामान्य योजना बन रही है, इसकी भी उनको आशंका नहीं हुई। रविवार को सुबह उनका नित्यकर्म शांति से शुरू हुआ। घोड़े की गाड़ियां, शीत उपचार, सुगंधित फूल, हवाखोरी, गाना-बजाना-सारी बातें हमेशा की तरह चालू हो गई। साहबों के घर के नेटिव नौकर अकस्मात् नौकरी पर नहीं आए, इसका भी उन्हें कोई अधिक आश्चर्य नहीं हुआ। 1857 का स्वातंत्र्य समर – 103 46 1. जे.सी. विल्सन। 2. रेड पैंफलेट, खंड 1 ।
इधर सिपाहियों के बीच बहस चल रही थी कि पूरा कत्लेआम करना है या नहीं। 20वीं पलटन और तीसरी घुड़सवार पलटन के सिपाही बोले, "चर्च में फिरंगियों के जाते ही 'हर-हर महादेव" बोलो। और लश्करी ओर मुलुकी, सैनिक और नागरिक बच्चे-औरतें-मर्द-जो मिले उसे काटते दिल्ली चलो।" यहीं अंत में तय हुआ। इधर मेरठ में पास-पड़ोस के गांवों से भी टूटे-टाटे शस्त्र हाथ में लिये हजारों लोग आकर मिल रहे थे। स्वदेश-कार्य के लिए आए उन ग्रामीणों की तरह मेरठ के नागरिक भी सज्जत होने लगे। फिर भी अंग्रेजों को तिनके भर जानकारी नहीं थी। रविवार की शाम के पांच बजे चर्च का घंटा उस शांत वातावरण में हल्के-हलके बजने लगा और अंग्रेज लोग अपनी-अपनी पत्नियों सहित हंसते-खेलते चर्च की ओर जाने लगे। परंतु उस दिन का चर्च का घंटा अंग्रेजों के लिए प्रार्थना नहीं बजा रहा था-वह तो उनकी मृत्यु वेला बजा रहा था। क्योंकि उधर सिपाहियों की लाइन में एक ही गर्जना उठ रही थी-'मारो फिरंगी को'। इस ध्वनि से सारा वातावरण भर गया। सबसे पहले कारावास में पड़े धर्मवीरों की बेड़ियां तोड़ने सैकड़ों घुड़सवार उधर गए। उस कारावास के रक्षक भी क्रांतिपक्ष के ही थे, अतः 'मारो फिरंगी की' की रण-ध्यानि सुनते ही वे कारागृह छोड़कर अपने साथियों से मिल गए। दूसरे ही क्षण उस अभागे कारागृह की दीवारें ढहने लगीं। दस वर्ष कठोर कारावास भोगने के लिए फिरंगियों द्वारा पहनाई गई बेंडियां थर-थर कांपने लगी। एक देशभिमानी लुहार आगे आया और उसने जल्द ही उन बेड़ियों के टुकड़े-टुकड़े कर दिए। प्रचंड वीर गर्जना करते वे कारावास भोग रहे धर्मवीर बाहर आए, घोड़ों पर चढ़े और अपनी मुक्ति के लिए आए देशबंधुओं के साथ उस कारावास को पीछे छोड़ चर्च की ओर पूरे जोश से दौड़े। इधर पैदल टुकड़ी ने दंगा शुरू कर दिया। ग्यारह पलटनों का कर्नल फिनीस अपने घोड़े पर बैठ यों ही उधर आया था। सिपाहियों के सामने खड़ा होकर हमेशा की अकड़ के साथ उन्हें डांटने-डपटने लगा तो सिपाही उसका काल बन उस पदा दौड़ पड़े। 20वीं पलटन के एक सिपाही ने अपनी पिस्तौल उस पर चलाई और वह कर्नल अपने घोड़े के साथ भूमि पर गिर गया। पैदल और घुड़सवार, हिंदू और मुसलमान सारे-के-सारे गोरे रक्त के लिए इतने बेचैन हो गए थे कि यह फिनीस का रक्त तो दरिया में खसखस थी। मेरठ के बाजार में यह समाचार पहुंचते ही वह पूरा शहर जलने लगा और जहां-जहां भी अंग्रेज मिला वहां-वहां उसे गारद किया गया। सदर बाजार के सारे लोग हाथ में तलवारें, भाले, लाठियां, छुरियां-जो जिसके हाथ में लगा वह शस्त्र लेकर गली-गली में दौड़ने लगे। जिस किसी भवन पर अंग्रेजी सत्ता के चिह्न थे वे सारे भवन, बंगले, कार्यालय सब आग में जलने लगे। आकाश में धुएं के बादल, अग्नि, अग्नि की रंग-बिरंगी ज्वालाएं हजारों लोगों के हल्ले-गुल्ले की मिली-जुली आवाजें और सबसे ऊंची आवाज-मारों फिरंगी को- 1857 का स्वातंत्र्य समर - 104
से मेरठ का आकाश भयानक हो उठा। विद्रोह प्रारंभ होते ही पूर्व संकेतों के अनुसार मेरठ से दिल्ली की ओर जानेवाली तार तोड़ डाली गई और उस रास्ते पर अपना कड़ा पहरा बैठा दिया। वह अंधियारी रात होने से अंग्रेजों को बड़ी आफत हुई। कोई तबेले में छुपा तो कोई सारी रात पेड़ के नीचे बैठा रहा-कोई घर की तीसरी मंजिल पर तो कोई जमीन के गड़ढे में। किसी ने किसान का वेश बनाया तो कोई बटलर के पांव पकड़े रहा। विद्रोही सिपाही अंधियारी होते ही दिल्ली की ओर कूच करने लगे थे; परंतु उनके प्रतिशोध का अधूरा काम मेरठ के लोगों ने स्वयं ही पूरा किया। अंग्रेजों के लिए इतना गुस्सा उत्पन्न हुआ था कि अंग्रेजों के स्पर्श होने से जो घर जलाने लायक हो गए थे, पर पत्थर के हाने से जलाए नहीं जा सकते थे, उन्हें चूर-चूर कर दिया गया। वहां के कमिश्नर ग्रीडेड के बंगले को आग लगा दी गई, फिर वह वह अंदर ही छिपा बैठा रहा। यह बात बाहर ज्ञात हुई तो मेरठ के लोग सशस्त्र होकर कर्कश गर्जना करते इकट्ठा हो गए। त बवह कमिश्नर अपने बटलर के पांव पड़ने लगा और पैरों के नीचे फैली आग और चारों ओर शत्रुओं का घेराव, मृत्यु के ऐसे जबड़े से अपने परिवार को बचाने के लिए उसकी चिरौरी करने लगा। वह बटलर उस पर द्रवित हो गया और क्रांतिकारियों से बोला, "कमिश्नर घर में नहीं है" और जहां वह छिपा था उसकी विपरीत दिशा में चलने का आग्रह करते हुए उन्हें दूर तक ले गया। इतने में वह कमिश्नर गिरते घर से भाग गया। मिसेज चैबर्स के बंगले में विद्रोहियों ने उसे छुरा भोंककर, खींच-घसीटकर फेंक दिया। कैप्टन क्रेजी ने अपनी पत्नी और बच्चों का गोरा रंग छिपाने के लिए उन्हें घोड़े की जीन पहनने को दी और उन्हें काले रंग से रंगकर एक मंदिर के खंडहर में रात भर छिपाके रखा। डॉक्टर ख्रिस्टे और व्हेटरनरी सर्जन फिलिप्स को पत्थरों से कुचलकर मारा गया। लेफ्टिनेंट हेंडरसन और लेफ्टिनेंट पेंट का पीछा कर उन्हें गारद कर दिया गया। घरों में आग लगाने से कितने ही औरत-बच्चें जल मरे। जैसे-जैसे अंग्रेजी रक्त अधिकाधिक गिरता गया वैसे-वैसे विद्रोहियों की कर्कश गर्जना और भयानक अट्टाहस का उत्साह बढ़ने लगा। रास्तों में पड़े अंग्रेजों के शवों को लोग लतियाने लगे। बीच में किसी विद्रोही को गोरे लोगों पर वार करते किंचित् दया आ जाती तो अन्य हजारों लोग 'मारो फिरंगी को' कहते-चिल्लाते-दौड़ते आते और कारावास में डाले गए उन पचासी निरपराध धर्मवीरों में से एकाध वहां होता तो उसके हाथ पर चढ़ाई गई फिरंगी बेड़ी के निशान की ओर अंगुली दिखाकर-'इसका प्रतिशोध लेना है' कहते हुए वार-पर-वार करने लगते।⁴⁷
वास्तविकता यह थी कि यदि कहीं पहले विद्रोह खड़ा होने की संभावना नहीं थी तो वह मेरठ में; क्योंकि वहां नेटिव सिपाहियों की दो पैदल रेजिमेंट और एक
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⁴⁷ एक हिंदू द्वारा लिखित 'विद्रोह के कारण'।
घुड़सवार रेजिमेंट थी। परंतु गोरे सिपाहियों की एक पूरी राठफलमेंस बटालियन और एक ड्रवून रेजिमेंट के साथ एक उत्तम तोपखाना उनके पास था। ऐसी स्थिति में सिपाहियों को सफलता मिलने की संभावना बिल्कुल नहीं थी। विद्रोह होते ही वहां अंग्रेजों से प्रतिशोध लेने का कार्य मेरठ शहर को सौंपकर विद्रोही सिपाही तत्काल इसी उद्देश्य से दिल्ली की ओर जा रहे थे। उनका पीछा कर उन्हें रोकना और पूर्ण नाश करने का काम भी बड़ा सरल था। पर अंग्रेजी सेना और उनके अधिकारियों में उस समय जो भीरूता, अव्यवस्था और चिंता दिखाई दी उस पर तो अंग्रेज इतिहासकारों को भी बहुत लज्जा आती है। नेटिव घुड़सवारों का कर्नल स्मिथ उसकी पलटन विद्रोह कर गई है, यह ज्ञात होते ही उधर देखे बिना भाग खड़ा हुआ। तोपखाने का अधिकारी तैयार होकर कुछ करे इससे पहले सिपाही दिल्ली की ओर चल पड़े थे। उसमें भी आगे न बढ़ते हुए अंग्रेजी सेना घबराई-सी जगह-जगह सारी रात पड़ी रही। वास्तविकता यह है कि मेरठ के ब्रिदोह से अंग्रेजों का बड़ा नुकसान हुआ। यह अभूतपूर्व और अकस्मात् घटित प्रचंड घटना क्या है, इसका दूसरे दिन तक उन्हें कुछ पता न चला। इधर सिपाहियों ने नक्शा अच्छी तरह बनाया हुआ था। विद्रोह करते ही कारागार से बंदियों को छुड़ाना और बाद में अंग्रेजी रक्त की बरसात करना। इस अकस्मात् हमले से अंग्रेज लोग बुरी तरह घबरा उठे। उस एक झटके में मेरठ शहर ने विद्रोह करके सब ओर आग लगाकर एवं चारों ओर से मार-पीटकर अंग्रेजों के लिए यह पता तब तक सैनिक दिल्ली की ओर रवाना हो गए। यह दिल्ली की ओर जाने की योजना बहुत चतुराई भरी थी। पहले झटके में दिल्ली पर कब्जा कर विद्रोह को एक क्षण में राष्ट्रीय होने की सूचना अंग्रेज अधिकारियों के कानों तक पहुंचती, तभी दिल्ली की ओर जानेवाले तार तोड़कर और रास्ता रोककर, कारागृह से अपने धर्मवीरों को मुक्त करके, अंग्रेजों के रक्त के नाले बहाकर, वे दो हजार सिपाही गोरे रक्त से रंगी अपनी तलवारें ऊंची उठाकर गर्जना करने लगे-'दिल्ली! दिल्ली!! चलो दिल्ली!!!' 1857 का स्वातंत्र्य समर – 106
प्रकरण-3 दिल्ली श्रीमंत नाना साहब पेशवा अप्रैल के अंतिम भाग में दिल्ली आ गए थे। तब निश्चित हुई बातों के अनुसार 31 मई के रविवार की सारे लोग उत्सुकता से राह देख रहे थे। दिनांक 31 मई को सारे हिंदुस्थान भर में 'हर-हर महादेव' एक साथ गूंज उठा होता तो सच में अंग्रेजी साम्राज्य की इतिश्री होने और स्वतंत्रता की विजय दुंदुभि बजाने के लिए इतिहास को अधिक देर ठहरना न पड़ता; परंतु मेरठ के अग्रिम विद्रोह से क्रांति की तुलना में अंग्रेजों को अधिक लाभ हुआ।48 मेरठ के बाजार में जिन तेजस्विनी महिलाओं ने सिपाहियों की जिंदगी पर थूका और मर्द हो तो कारागृह के वीरों को छुड़ाकर लाओ, 'ऐसा कहकर हमारे इतिहास की नारियों की तेजस्विनी चेतना में एक स्फूर्तिदायी कथा तो 1857 का स्वातंत्र्य समर - 107 48 "इतना सुनिश्चित था कि यदि संपूर्ण हिंदुस्थान में सहसा ही विद्रोह की ज्वाला धध उठती और अंग्रेजों को इस विद्रोह के होने से पूर्व इसका पता न लग पाता तो हमारे (गोरे) बहुत ही थोड़े व्यक्ति इस वेगवान संहार से बच पाते। ऐसी स्थिति में ब्रिटिश राष्ट्र के लिए भारत पर पुनः विजय प्राप्त कर पाना एक अत्यंत ही कठिन कार्य होता अथवा अपने पूर्वी साम्राज्य में पराजय एक एक अमिट कलंक सर्वदा के लिए हमारे मस्तक पर अंकित हो जाता।" "मेरठ के इस भयानक विद्रोह से हमें एक महान् लाभ अवश्य हुआ। वह यह था कि समूचे भारत के सैनिकों के विद्रोह का कार्यक्रम 31 मई, 1857 के निश्चित दिन कार्यान्वित होना था। किंतु इस समय से पूर्व भड़के उभार ने हमें समय से ही जाग्रत् कर दिया।" -व्हाइट का इतिहास, पृष्ठ 17
जोड़ी, फिर भी उन्होंने परदेशियों में सारे सिपाही नेटिव ही थे। उन्हें भी मंगल पांडे का समाचार सुनने के बाद से धीरज रखना कठिन हो रहा था। पर बादशाह और बेगम जीतन महलने बड़ी कुशलता से सारी दिल्ली की गुप्त समिति को संदेश आया कि हम कल आ रहे हैं, तैयारी रखो!! यह अपूर्व और आकस्मिक संदेश दिल्ली में पहुंचते -न-पहुंचते मेरठ से दो हजार सिपाही ‘दिल्ली! दिल्ली! की गर्जना करते हुए निकल गए। उस रविवार की रात को पूर्ण रतजगा रहा। हजारों घोड़े दौड़ रहे हैं, हिनहिना रहे हैं, तलवारों और बैनेटों की खनखनाहट हो रही है-ऐसा यह भयानक दृश्य देखते हुए रात जाग रही थी। अंत में भोर हुई और अपना पीछा करता मेरठ का तोपखाना अभी भी नहीं आया, यह देखकर उत्साहित वे सिपाही रात भर हुए कष्टों को भूलकर एक क्षण भी कहीं न ठहरकर वैसे ही आगे बढ़े। मेरठ से दिल्ली कोई 32 मील है। सुबह के आठ बजे सेना के प्रमुख हिस्से को यमुना का पवित्र दर्शन हुआ। स्वतंत्रता के पवित्र कार्य के लिए जानेवाले योद्धाओं को अपने शातल जल से सिंचित कर प्रोत्साहन देनेवाली भगवती यमुना उन्हें दिखते ही उन हजारों योद्धाओं ने ‘जय जमुनाजी’ कहकर उसका वंदन किया। यमुना से दिल्ली शहर को जोड़नेवाले नाव के पुल पर से भारतीय घोड़े दौड़ते चले जा रहे थे। पर वे किसलिए दौड़ रहे हैं, यह यमुना नदी को ज्ञात है क्या? उसे यह बताए बिना जाना इष्ट नहीं है तो पकड़ो, वह कोई अंग्रेज पुल पर से जा रहा है; उसे और उसके गोरे रक्त को फेंक दो इस काली कालिंदी में। सिपाही क्यों दौड़े जा रहे हैं, इसका पूरा समाचार वह रक्त यमुना नदी को दे देगा। वह नाव का पुल उतरकर सिपाही दिल्ली की प्राचीर से भिड़ गए। यह भनक लगते ही दिल्ली में स्थित अंग्रेज अधिकारी नेटिव सिपाहियों को परेड पर बुलाकर उन्हें राजनिष्ठा के व्याख्यान देने लगे। फिर 54वीं पलटन को लेकर कर्नल रिप्ले विद्रोहियों का सामना करने निकला। 54 वीं पलटन के नेटिव सिपाहियों ने निकलते समय ही कहा किय कर्नल साहब, उन मेरठ के सिपाहियों को दिखाइए तो सही; फिर हम उन्हें देख लेंगे। क्या देख लेंगे, यह उस कर्नल को क्या मालूम? उसने बड़े गर्व से उन्हें शाबासी दी और वह पलटन विद्रोहियों का सामना करने चल दी। थोड़ा आगे जाते ही प्राचीर से मेरठ के घुड़सवार दौड़ते हुए आते दिखाई दिए। गुस्से से उग्रतम हुए और गोरे रक्त की अनिवार्य मांग करनेवाले उन घुड़सवारों के पीछे लाल रंग की वरदी में मेरठ का पैदल दल भी था। एक-दूसरे को देखते ही उन्होंने एक-दूसरे को सलामी दी और मेरठ की सेना दिल्ली की सेना से मिलने लगी। मेरठ की सेना ने ‘फिरंगी राज्य का नाश हो’ और ‘बादशाह की जय हो’ के नारे लगाए ये नारे सुनते ही दिल्ली की सेना ने ‘मारो फिरंगी को’ की प्रति गर्जना की। यह क्या है? कहनेवाला कर्नल रिप्ले क्षण में ही गोलियों की बौछार में भूमि 1857 का स्वातंत्र्य समर — 108
पर गिर गया और फिर उस रेजिमेंट के साथ आए सारे अंग्रेजों को एक साथ कत्ल कर दिया गया। इस तरह अपने स्वदेश-प्रेम पर फिरंगी रक्त की मुहर लगाकर मेरठ के घुड़सवार नीचे उतरे और दिल्ली के सिपाहियों से गले मिलने लगे। यह समाचार सुनते ही शहर का कश्मारी दरवाजा खुल गया और उस इतिहास-प्रसिद्ध दरवाजे से 'दीन-दीन' की गजना करते स्वतंत्रता योद्धा दिल्ली में प्रवेश कर गए। मेरठ सेना की दूसरी टुकड़ी कलकत्ता दरवाजे से अंदर घुसने लगी। वह दरवाजा पहले बंद किया हुआ था, परंतु इन सिपाहियों की भयानक थपकी पड़ते ह ीवह धीरे-धीरे हटने लगा और जल्दी ही उस दरवाजे पर नियुक्त पहरेवालों ने 'दीन-दीन' कहते विद्रोहियों को अंदर कर लिया। कलकत्ता दरवाजे से अंदर घुसे सिपाही प्रथम दरियागंज के यूरोपीय बंगलों की ओर गए और वे भवन कुछ क्षणों में आग बन गए। जो विदेशी लोगों को आश्रय दिया हुआ है, यह ज्ञात हुआ। विलायती आदमियों को अंदर लेने के कारण दरियागंज के घरों को जो दंड मिला उसे देखने के बाद भी यह अस्पताल यदि विलायती लोगों को अंदर लेने का साहस करे तो किसी को भी गुस्सा आना स्वाभाविक है। उस अस्पताल की जमकर पिटाई करने के बाद वह शस्त्रधारी उग्रता अपने असंख्य अवयवों के साथ दिल्ली के घर-घर में गोरे रक्त को सूंघने चली! पर निशान के बिना सेना कैसी? और ऐसी सेना का कपड़े का निशान किस काम का? इसलिए जहां भी गोरा सिर मिले वहां उसे भाले पर टांगकर उसका भयानक निशान 'दीन' के ताल पर नाचते हुए वह अपूर्व सेना आगे बढ़ती गई। बादशाह के नाम का जयघोष करते हुए सिपाही और शहर के सैकड़ों लोग दिल्ली के राजमहल में घुसने लगे। रास्ते से घायल होकर भागता आया कमिश्नर फ्रेजर एक छोटे दरवाजे पर खड़ा था। उसे देखते ही मुगल बेग नाम के आदमी ने उसके गाल पर वार किया। यह इशारा होते ही सब विद्रोही दौड़ पड़े और सीढ़ियों पर क्षत-विक्षत हुआ कमिश्नर फ्रेजर आने-जानेवालों के पैरों तले कुचला जाने लगा। उसे कुचलते सिपाही वहां न रुककर ऊपर चढ़ गए और जिस कमरे में जेनिंग और उसका परिवार रहता था, वहां जाकर वे डरावने राक्षस की तरह खड़े हो गए। इतने में किसी ने उस कमरे का दरवाजा लगाने का प्रयास किया; पर वह एक धक्के से चरमरा गया और सिपाहियों की तलवार के नीचे वह जेनिंग, उसकी युवा कन्या, उसके यहां की मेहमान एक अंग्रेज स्त्री का खात्मा हो गया। दिल्ली के रास्ते पर से मरते-मरते दौड़ा कैप्टन डगलस कहां है? भेजो उसे यम के घर! और ये कोने में घुसे कलेक्टर साहब! उन्हें भी जीवन की पेंशन पर भेजो। अब दिल्ली के राजमहल में फिरंगी सत्ता कानाम भी शेष नहीं रहा। अब जरा शांत बैठने में कोई हानि नहीं। घुड़सवारों ने अपने घोड़े राजमहल के मैदान में बांधे और सारी रात दौड़ते आए सिपाही दीवानेखास के राजमहल में अपना सामान रख विश्राम करने लगे। इस तरह दिल्ली का राजमहल लोक-सेना के हाथ आ गया और अब आगे क्या 1857 का स्वातंत्र्य समर – 109