१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)
1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंबुना जा रहा था। अधिक क्या कहा जाए, परंतु ठेठ मद्रास तक इस क्रांतियज्ञ की ज्वालाएं भड़कने लगी थी। सन् 1857 की जनवरी में निम्न घोषणापत्र प्रकाशित हुआ- "हे देशबंधुओं और धर्मनिष्ठों, उठो! काफिर अंग्रेजों को अपने देश से भगा देने के लिए सारे उठो! इन अंग्रेजों ने न्याय के सारे सिद्धांत मटियामेट कर दिए हैं। उन्होंने हमारा स्वराज्य लूट लिया है और स्वदेश को धूल में मिलाने का उनका दृढ़ निश्चय है। अंग्रेजों की इन भयानक यातनाओं से अपने हिंदुस्थान को मुक्त करने के लिए केवल एक ही उपाय शेष रह गया है और वह उपाय है तुमुल युद्ध करना। ऐसे युद्ध में जो रण-मैदान में खेत रहेंगे वे अपने देश के शहीद होंगे। जो स्वदेश एवं स्वधर्म के लिए लड़ेंगे और मरेंगे उन वीर्यवान् शहीदों के लिए स्वर्ग के दरवाजे खुल रहे हैं और जो डरपोक और देशद्रोही अधम इस राष्ट्रकार्य से परावृत्त होंगे उनके लिए नरक के द्वार खुले होंगे। देशबंधुओं, इनमें से तुम क्या स्वीकार करोगे?"³⁷ ऐसी स्थिति में सन् 1857 का उदय हुआ और ऐसी सूचनाएं आने लगी कि हिंदुस्थान में यत्र-तत्र सांकेतिक महत्कार्य का मुहूर्त आ गया। इसी समय कारतूसों का बखेड़ा खड़ा हुआ। हर एक सिपाही दिन में अपनी बंदूक को रगड़-रगड़कर साफ करता और रात होते ही अपनी रेजिमेंट के सूबेदार मेजर के बंगले पर आयोजित होनेवाली गुप्त बैठकों में जाकर स्वतंत्रता संग्राम के लिए शपथ दिलाने के लिए भोज के कार्यक्रम आयोजित करते। इन भोजों के समय एक-दूसरे से योजना कही जाती और उन योजनाओं को फिर नाना साहब या अली नक्की खान को बताया जाता। कुछ रेजिमेंटों में ऐसी क्रांति घटना चलते हुए गलती या विश्वासघात से वह जानकारी सरकार के कानों तक गई तो एक-दो रेजिमेंटों को निःशस्त्र कर दूर कर दिया गया। बहुत बढ़िया! ये सारे सिपाही स्वयंसेवक बनकर गांव-गांव जाते और क्रांतियुद्ध के जिहाद का उपदेश करते। सिपाहियों के सब ठिकानों से वचन-पत्र ऐसा था। सातवीं अवध रेजिमेंट का अड़तालीस रेजिमेंट को भेजा गया वचन-पत्र ऐसा था- "रेजिमेंट के हमारे भाई का मत हमें स्वीकार है। कारतूसों के बारे में उनके जैसा ही व्यवहार करेंगे और समय आने पर टूट पड़ेंगे।" बैरकपुर से सियालकोट जैसे दूर देश भेजे गए पत्र पकड़े गए थे। उनमें एक में बैरकपुर के सिपाही सियालकोट के सिपाहियों को लिखते हैं- "भाइयों, शत्रुओं के विरूद्ध उठो!" रूसी क्रांति की तरह ही हिंदुस्थान के क्रांतियुद्ध में भी पुलिसवाले जनता से बहुत सहानुभूति बरतते थे। क्रांति के गुप्त संगठन यंत्र का प्रचंड पहिया अब तीव्र गति से 1857 का स्वातंत्र्य समर – 87 ³⁷ 1. चार्ल्स बाल कृत-'इंडियन म्यूटिनी', खंड 1, पृष्ठ 40 । 2. रेड पैंफलेट, खंड 1 ।