भारतकोश
१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

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कर सकते हैं, यह आत्मविश्वास हर सिपाही और हर नागरिक में मन में इन राजनीतिक संन्यासियों ने किस तरह उत्पन्न किया था, यह उस समय के देशभक्तों के उद्गार में पग-पग पर दिखता है। काली नदी की लड़ाई में हारे हुए अंग्रेजों ने प्रश्न किया कि "हमारे विरुद्ध उठने की तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई?' इस अक्खड़ प्रश्न के उत्तर में सिपाहियों ने कहा, "हिंदुस्थानी सिपाही एक हो गया तो गोरा चटनी के लिए भी नहीं मिलेगा।" अंग्रेज सरकार ने सन् 1857 के आरंभ में ही सिपाहियों की चिट्ठियां खोलनी शुरू कर दी थी। उन पत्रों में से एक पत्र हिंदुस्थान के लोगों की शक्ति के संबंध में कहता है-"विदेशियों को हम ही सिर चढ़ाए हुए हैं! यदि हम उठे तो फिरंगियों के मुट्ठी भर लोगों को तलवार के एक झटके में गारद कर सकते हैं। कलकत्ते से पेशावर तक मैदान साफ है।" श्रीमंत नाना साहब के स्वयं के हस्ताक्षर के पत्रों ने और ब्रह्मवर्त से भेजे गए संन्यासियों ने ऐसी उदात्त आत्मनिष्ठा के बीज भारतीय मन में बो दिए। परंतु आज उपलब्ध जानकारी से ऐसा दिखता है कि अवध का राज्य अधिगृहीत होने तक इन बीजों में जोरदार अंकुर नहीं फूटे थे।³¹ सन् 1856 में अवध का राज्य अधिगृहीत होते ही अकस्मात् सब लोगों में परतंत्रता के प्रति घृणा उत्पन्न हुई। स्वतंत्रता का रम्य एवं पुण्य दर्शन श्रीमंत नाना की तीक्ष्ण दृष्टि को इसके पहले ही हो चुका था और गुलामी की गंदगी की दुर्गंध बड़ी दूर से उन्हें आने लगी थी। परंतु जड़बुद्धि सामान्य जनसमूह प्रत्यक्ष साक्ष्य के बिना उसे ग्रहण न कर सका। फिर भी, अवध का राज्य अधिगृहीत होते ही हर कोई अपने अस्तित्व को धिक्कारने लगा और गुलामी में सड़ने की अपेक्षा मरना भला, ऐसी गर्जना कर अपनी तलवारों पर पानी चढ़ाने लगा। इसी समय हिंदुस्थान की इतिहास-प्रसिद्ध राजधानी को भी मानो नई चेतना मिल गई और दिल्ली के राजमहलों में स्वतंत्रता संग्राम की मंत्रणाएं शुरू हो गई। दिल्ली के बादशाह की बादशाही लेकर ही अंग्रेज नहीं रुके अपितु उनकी 1857 का स्वातंत्र्य समर - 81 ³¹ विभिन्न प्रांतों में भेजे गए राजकीय दूतों में से एक दूत मैसूर में पकड़ा गया। उसका कहा निम्न भाग बहुत महत्त्वपूर्ण होने से पूरा-का-पूरा यहां दिया जा रहा है-"श्रीमंत नाना ने अवध अधिगृहीत होने के पूर्व दो-तीन माह से पत्र-प्रेषक शुरू किया था। परंतु पहले उन्हें उत्तर नहीं आए। किसी को भी आशा नहीं थी। अवध का राज्य अधिगृहीत हो जाने पर नाना ने पत्रों की अधिक मार की, तब जाकर केवल लखनऊ के साहूकार नाना के विचार पड़ने लगे। पुरबिया लोगों का राजा मान सिंह भी मिल गया। फिर सिपाही लोगों ने अपनी-अपनी 'तजवीजें' करनी शुरू कीं और लखनऊ के साहूकारों से उन्हें सहायता मिलने लगी।" अवध अधिगृहीत होने तक बिलकुल उत्तर नहीं आया; परंतु वह राज्य अधिगृहीत होते ही सैकड़ों लोगों ने हिम्मत से आगे आकर नाना को वचन-पत्र भेजे। सिपाहियों की तजवीजें पहले से ही शुरू हो गई थी। फिर कारतूसों की घटना हुई और उस असंतोष पर नाना के पत्रों की बरसात होने लगी। जम्मू के गुलाब सिंह ने मैं सेना और खजाना लेकर तैयार हूं-ऐसा पत्र लिखा। और लखनऊ के साहूकारों ने धराशियां भी भेज दीं।