भारतकोश
१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished418 पृष्ठ

पृष्ठ 76, कुल 418 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 76

हिस्से में आया है, इसलिए जय या पराजय जो भी मिले, मुझे तो स्वतंत्रता का नूतन 'शिवराज' या प्रथम पेशवा का मान बढ़ानेवाला अंतिम पेशवा बनना है-उनमें मन ने यह दृढ़ निश्चय किया। अपने देश और स्वराज्य का भविष्य निश्चित काने का वीरोचित निर्णय हो जाने के बाद श्रीमंत नाना का एकमात्र लक्ष्य था उस निर्णय को कार्य-रूप देना। स्वराज्य-प्राप्ति के लिए जो क्रांतियुद्ध लड़ना है उसे सफलता मिले, इसके लिए दो बातें अनिवार्य थी। पहली बात हिंदुस्थान के समस्त लोगों में स्वतंत्रता की जंगी और अनिवार्य इच्छा उत्पन्न होना और फिर उस इच्छा की सिद्धि के लिए-एक ही समय में पूरे देश द्वारा विद्रोह करना, हिंदुस्थान के समस्त लोगों में स्वतंत्रता की जंगी और अनिवार्य इच्छा उत्पन्न होना और फिर उस इच्छा की सिद्धि के लिए-एक ही समय में पूरे देश द्वारा विद्रोह करना, हिंदुस्थान के इतिहास को स्वतंत्रतागामी करना-ये दोनों ही काम विदेशियों को चकमा देकर ही किए जा सकते थे। क्योंकि जिस किसी परतंत्र देश के मन में स्वतंत्रता संग्राम छेड़ने की इच्छा हो उस देश में उस संग्राम की तैयारी गुप्त रीति से ही करनी पड़ती है। अन्यथा आरंभ में ही अमोघ शक्ति से हमला कर बलवान शत्रु उस प्रयास को चूर-चूर कर सकता है। यह ऐतिहासिक सत्य जानकर दोनों महान् विभूतियों-श्रीमंत नाना साहब और अजीमुल्ला खान ने सन् 1856 के प्रारंभ में स्वतंत्रता के लिए हिंदुस्थान को तन और मन से जाग्रत करने के लिए युद्ध संगठन बनाया। हिंदुस्थान में जितने राजे-रजवाड़े हैं उन सभी में यदि अंग्रेजों के विरूद्ध उठने की इच्छा उत्पन्न हो गई तो एक क्षण में ही अपना देश अपने हाथ आ जाएगा, यह तथ्य नाना के ध्यान में पहले ही आ गया था। इन हिंदुस्तानी सिर चढ़े राजाओं से आगे-पीछे अंग्रेजी राज को धोखा होगा, यह जानकर ही अंग्रेजी सरकार एक के बाद दूसरी रियासत छीनती चली जा रही है, यह वास्तविक स्थिति सारे राजे-राजवाड़ों के आगे रख उनके मन को स्वतंत्रतागामी करने के लिए नाना ने हर दरबार में अपना दूत भेजना प्रारंभ किया। कोल्हापुर, दक्षिण की सारी पटवर्धनी रियासतों, अवध के जमींदारों और दिल्ली से मैसूर तक की सारी राजधानियों में नाना के दूत और उनके पत्र सारे हिंदुस्थान को स्वतंत्रता युद्ध के लिए उड़ने की चेतना देते हुए घूम रहे थे। अंग्रेजी सत्ता के नीचे स्वराज्य और स्वधर्म की कैसी छीछालेदर होती जा रही है; जो रियासतें आज जीवित हैं, वे भी कल किस तरह नामशेष होनेवाली हैं तथा अंग्रेजों की विश्वासघाती गुलामी में अपने प्राणप्रिय हिंदुस्थान की कैसी बरबादी हो रही है-यह सब स्पष्ट और मार्मिक रीति से जनता के मन में भरते हुए मौलवी, पंडित एवं राजनीतिक संन्यासी सारे हिंदुस्थान भर में गुप्त रीति से विचरने लगे। दासता और गुलामी के प्रति गुस्सा उत्पन्न करते हुए यह दास्य नामशेष करना कितना सुलभ है, हिंदुस्थान के हृदय में हिंदुस्तान की तलवार ही कैसे धंसाई जा रही है और हिंदुस्तानी लोग स्वदेश के लिए मर मिटने के लिए तैयार हो जाएं तो एक क्षण में उन्हें अपना देश फिरंगियों के चुंगल से मुक्त करना कितना सरल है-यह सब राजा से रंक तक हर भारतीय हृदय को वे राजनीतिक संन्यासी भी प्रकार समझाकर कहते थे। हम सब देशबुंध एक ही जाएंगे तो मुट्ठी भर गोरों को धूल चटाकर स्वदेश को क्षण भर में स्वतंत्र 1857 का स्वातंत्र्य समर - 80