भारतकोश
१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

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पृष्ठ 78

'बादशाह' की शाब्दिक पदवी भी उनके बाद न चले, यह भी तह कर लिया। ऐसी पिन्नावस्था में अपना पूर्व वैभव प्राप्त करने हेतु एक बार अंतिम प्रयास करके देखें और मरना ही है तो बादशाही की शान से मरें-ऐसा विचार राजमहल में होने लगा। इस काम में प्रमुख इस्लामी सत्ताओं की सहायता मिले, इसलिए मैं सुन्नी पंथ छोड़कर अवध के नवाब और ईरान के शाह का शिया पंथ स्वीकार करता हूं, ऐसी घोषणा भी बादशाह ने की। इसी समय अंग्रेजों की ईरान से लड़ाई शुरू हुई। हिंदुस्थान में भी उसी समय विद्रोह होना अपने लिए लाभदायक है, यह देखकर ईरान के शाह ने सन् 1857 के प्रारंभ में दिल्ली की मस्जिदों से इसी प्रकार की सार्वजनिक घोषणाएं होने लगीं-“फिरंगियों के कब्जे से हिंदुस्थान को मुक्त करने ईरानी फौज जल्दी ही आ रही हैं, इसलिए बूढ़े, जवान, छोटे-बड़े, सुशिक्षित-अशिक्षित, रैयत और लश्कर सारे लोग इन काफिर लोगों के शिकंजे से मुक्त होने के लिए रणांगण में कूद पड़ें।”³²

इस घोषणापत्र को सारे भारतीय समाचार-पत्रों ने प्रकाशित किया और दिल्ली के लोगों में क्रांतियुद्ध की लहर दौड़ गई। दिल्ली के बादशाह के सचिव मुकुंदलाल कहते हैं-‘-6राजमंदिर के द्वार पर और महल में मुगल खुले मन से युद्ध की चर्चा करते रहते थें सिपाही जल्दी ही विद्रोह कर राजमहल की ओर आएंगे और फिरंगियों का जुआ उतार फेंककर फिर से अपना राज्य स्थापित करेंगे, ऐसी निश्चयपूर्वक बातें वे करते और अपना राज्य हो जाने पर अपने देश की सारी सत्त एवं सारे अधिकार अपने ही हाथों में रहेंगे। ऐसी आशा से सब लोग उत्साहित हो जाते।” इस लोक-जागृति को उत्तेजना देने के लिए शहजादे और राजवंश के अन्य पुरुषों ने अलग-अलग उपाय किए और दिल्ली में क्रांति की ज्वालाएं सब ओर से सुलगने लगीं।

इस तरह दिल्ली के दीवाने-आम में और ब्रह्मवर्त के राजमंदिर में स्वतंत्रता संग्राम की गुप्त तैयारी हो रही थी। हिंदुस्थान की क्रांतिकारी शक्तियों को इकट्ठा और संगठित करने के लिए इन दो राजमहलों से जो प्रचंड प्रयास चल रहे थे वे इतने गुप्त रीति से किए जा रहे थे कि अंग्रेजों जैसे धूर्त लोगों को भी सन् 1857 में तोपों की गड़गड़ाहट होने तक उसकी रत्ती भर भनक नहीं थी। हजारों रूपयों की तनख्वाह और हाथियों का पुरस्कार देकर इस राजनीतिक जिहाद का उपदेश करने के लिए बड़े-बड़े मौलवी भेजे गए। वे गांवों और शहरों में इस राजनीतिक धर्मयुद्ध का उपदेश गुप्त सभाओं में देते हुए घूमते थे। सिपाहियों के शिविरों में रात को इनके व्याख्यान होते थे। लखनऊ की मस्जिदों में मौलवी जिहाद शुरू करने संबंधी खुले भाषण किया करते । पटना और हैदराबाद में रात में सभाएं होती और विभिन्न मौलवी सब स्तर के लोगों को

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³² के कृत-इंडियन म्यूटिनी', खंड 2 पृष्ठ 30 ।