१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)
1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
'बादशाह' की शाब्दिक पदवी भी उनके बाद न चले, यह भी तह कर लिया। ऐसी पिन्नावस्था में अपना पूर्व वैभव प्राप्त करने हेतु एक बार अंतिम प्रयास करके देखें और मरना ही है तो बादशाही की शान से मरें-ऐसा विचार राजमहल में होने लगा। इस काम में प्रमुख इस्लामी सत्ताओं की सहायता मिले, इसलिए मैं सुन्नी पंथ छोड़कर अवध के नवाब और ईरान के शाह का शिया पंथ स्वीकार करता हूं, ऐसी घोषणा भी बादशाह ने की। इसी समय अंग्रेजों की ईरान से लड़ाई शुरू हुई। हिंदुस्थान में भी उसी समय विद्रोह होना अपने लिए लाभदायक है, यह देखकर ईरान के शाह ने सन् 1857 के प्रारंभ में दिल्ली की मस्जिदों से इसी प्रकार की सार्वजनिक घोषणाएं होने लगीं-“फिरंगियों के कब्जे से हिंदुस्थान को मुक्त करने ईरानी फौज जल्दी ही आ रही हैं, इसलिए बूढ़े, जवान, छोटे-बड़े, सुशिक्षित-अशिक्षित, रैयत और लश्कर सारे लोग इन काफिर लोगों के शिकंजे से मुक्त होने के लिए रणांगण में कूद पड़ें।”³²
इस घोषणापत्र को सारे भारतीय समाचार-पत्रों ने प्रकाशित किया और दिल्ली के लोगों में क्रांतियुद्ध की लहर दौड़ गई। दिल्ली के बादशाह के सचिव मुकुंदलाल कहते हैं-‘-6राजमंदिर के द्वार पर और महल में मुगल खुले मन से युद्ध की चर्चा करते रहते थें सिपाही जल्दी ही विद्रोह कर राजमहल की ओर आएंगे और फिरंगियों का जुआ उतार फेंककर फिर से अपना राज्य स्थापित करेंगे, ऐसी निश्चयपूर्वक बातें वे करते और अपना राज्य हो जाने पर अपने देश की सारी सत्त एवं सारे अधिकार अपने ही हाथों में रहेंगे। ऐसी आशा से सब लोग उत्साहित हो जाते।” इस लोक-जागृति को उत्तेजना देने के लिए शहजादे और राजवंश के अन्य पुरुषों ने अलग-अलग उपाय किए और दिल्ली में क्रांति की ज्वालाएं सब ओर से सुलगने लगीं।
इस तरह दिल्ली के दीवाने-आम में और ब्रह्मवर्त के राजमंदिर में स्वतंत्रता संग्राम की गुप्त तैयारी हो रही थी। हिंदुस्थान की क्रांतिकारी शक्तियों को इकट्ठा और संगठित करने के लिए इन दो राजमहलों से जो प्रचंड प्रयास चल रहे थे वे इतने गुप्त रीति से किए जा रहे थे कि अंग्रेजों जैसे धूर्त लोगों को भी सन् 1857 में तोपों की गड़गड़ाहट होने तक उसकी रत्ती भर भनक नहीं थी। हजारों रूपयों की तनख्वाह और हाथियों का पुरस्कार देकर इस राजनीतिक जिहाद का उपदेश करने के लिए बड़े-बड़े मौलवी भेजे गए। वे गांवों और शहरों में इस राजनीतिक धर्मयुद्ध का उपदेश गुप्त सभाओं में देते हुए घूमते थे। सिपाहियों के शिविरों में रात को इनके व्याख्यान होते थे। लखनऊ की मस्जिदों में मौलवी जिहाद शुरू करने संबंधी खुले भाषण किया करते । पटना और हैदराबाद में रात में सभाएं होती और विभिन्न मौलवी सब स्तर के लोगों को
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³² के कृत-इंडियन म्यूटिनी', खंड 2 पृष्ठ 30 ।
स्वतंत्रता की रक्षा करने और स्वधर्म के लिए युद्ध करने की शिक्षा देते थे। जिनके पवित्र नाम से अपने हिंदुस्थान देश का इतिहास भूषित हुआ और जिनके पावन चरित्र का कथन आगे यथासंभव किया जानेवाला है, उन देशभक्त मौलवी अहमद शाह को लखनऊ में हिंदू और मुसलमानों को फिरंगियों के विरूद्ध एक साथ विद्रोह करने का खुला उपदेश देने के कारण फांसी का दंड दिया गया था। उपर्युक्त मौलवी की तरह ही सैकड़ों प्रचारक फकीरों और संन्यासियों का बाना धारण कर स्थान-स्थान पर गुप्त प्रचार करने लगे। भीख मांगने के बहाने हर घर में जाना सुलभ होने से और इस तरह शत्रु के मन में किसी तरह की आशंका उत्पन्न न होने के कारण ये देशभक्त फकीर और संन्यासी दर-दर घूमकर दासता के प्रति घृणा और भावी स्वतंत्रता की अभिलाषा लोक समूह में प्रदीप्त किया करते थे। विशेषतः सेना में इन लोगों का उपयोग बहुत था। क्योंकि हर टुकड़ी में एक पंडित और एक मुल्ला धार्मिक कार्यों के लिए रखना अनिवार्य होने से उस स्थान पर यही लोग जाकर बैठते थे। सिपाहियों के मन पर उनके धर्मगुरू का दबाव और प्रभाव होने से इन्हीं लोगों के द्वारा स्वतंत्रता के पवित्र धर्म की दीक्षा देना आवश्यक था। स्वतंत्रता के बना धर्मरक्षण असंभव है, यह मर्म जानकर हजारों धर्मगुरू इस राजनीतिक जिहाद का आह्वान करने आगे आए। सन् 1857 के अप्रैल माह में ऐसा ही एक देशभक्त फकीर वहां की सैनिक छावनी में आया। उसके पास हाथी-घोड़े आदि तथा अन्य संरजाम भी था। वहां के सिपाहियों को राजनीतिक जिहाद की दीक्षा देने में वह मग्न था-परंतु अंग्रेज अधिकारियों को उसपर शंका हुई और उन्होंने उसे वहां से निकल जाने का आदेश दिया। यह आदेश होते ही फकीर वहां से तो निकल गया, परंतु पास के ही एक गांव में घुसकर फिर अपनी गुप्त रचना का कार्य करने लगा।³³ ऐसे कितने की स्वतंत्रता के भक्त लोग अपनी जान हथेली पर लिये उस अपार रचना का गुप्त कार्य बड़े कौशल से कर रहे होंगे। परंतु वे ˙˙ थे कौन? कहां के? यह भी स्मृति आज जनता में नहीं रही-हाय-हाय! जिस प्रकार मस्जिद, मंदिर और भिक्षा के बहाने घर-घर में स्वतंत्रता की चेतना उत्पन्न करने मौलवी और पंडित, फकीर और संन्यासी भेजे गए वैसे ही विभिन्न स्थानों से अधिक महत्त्व के स्थान पर उपदेशकों और शिक्षकों को भेजा गया था। हिंदुस्थान में विभिन्न प्रदेशों के लोगों के एकत्रित होने के मुख्य स्थान बड़े-बड़े तीर्थ क्षेत्र हैं। ये क्षेत्र एक प्रकार से सारे प्रदेशों के लोगों के राष्ट्रीय सम्मेलन-स्थल ही हैं। मस्जिदों में स्थानीय लोग ही आएंगे, परंतु तीर्थों में भी राजकीय महंत नियुक्त किए गए और जल्दी ही गंगा के पुण्य स्नान के लिए आनेवाले हजारों बंधुओं को हिंदुस्थान के मन में मचल 1857 का स्वातंत्र्य समर – 83 ³³ मि. विलियम कृत-‘द मेरठ नैरटिव' ।
रहे स्वतंत्रता युद्ध में सम्मिलित होने का गुप्त उपदेश देते-देते पंडित लोग प्रत्येक तीर्थ में घूमने लगे।³⁴ विराट् जनसमूह के मन में एक ही इच्छा उत्कटता से उत्पन्न करने और उसकी अक्षय मुद्रा उनके हृदय पर अंकित करने के लिए कविता जैसा उत्तम साधन नहीं है। मार्मिक शब्द और आकर्षक पद्धति से पद्य में गुंथा हुआ सत्य जनता के हृदय में बहुत तेजी से अंकुरित होता है। इसीलिए राष्ट्रगीत की महत्ता बहुत मानी जाती है। राष्ट्रगीत राष्ट्र के हृदय की भावना एक वाक्य में प्रकट कर सकते हैं। जब-जब किसी प्रबल भावना से राष्ट्रीय आत्मा छटपटाने लगती है तब-तब उससे निकले सहज बोल ही तो राष्ट्रगीत हो जाते हैं। फ्रांस कि राष्ट्रीय आत्मा के बोल हैं-ला मार्सेलीज। सन् 1857 में स्वधर्म-रक्षण की उदात्त भावना से भारतभूमि की आत्मा फड़फड़ाते समय उसके मुख-मार्ग से ऐसा कोई राष्ट्रगीत निकला न होता तो आश्चर्य ही होता। दिल्ली के बादशाह के एक निजी गवैया ने सारे हिंदुस्थान के कंठ से निनादित होनेवाले एक राष्ट्रगीत की रचना स्वयं की थी। अपने पूर्वजों के पराक्रम का वर्णन करने के पश्चात् उस राष्ट्रगीत में वर्तमान की अवनति को करुण रस में चित्रित किया गया था। जो लोग एक दिन हिंदुस्थान के इस छोर से उस छोर तक विजयशाली वैभव से अभिषिक्त हुए थे उन्हीं लोगों को आज विश्व में गुलाम कहलाने की बारी आए, उनका धर्म अनाथ हो जाए और उनके अभिषिक्त सिर विदेशियों के पैरों तले कुचले जाएं-इस विपरीत और लज्जास्पद स्थिति के लिए उस राष्ट्रगीत में भारत माता आक्रोश कर रही थी। परंतु अब उसका यह आक्रोश हमें सुनाई देगा क्या? क्या अब वह सन् 1857 का गीत हम फिर सुन सकेंगे? उस राष्ट्रगीत का प्रारूप यदि कोई खोजकर निकाले तो अपने इतिहास पर उसके अक्षय उपकार होंगे। तब तक इतिहास इतना ही कहता है कि अपनी धरती माता सन् 1857 में आक्रोश कर रही थी और कानपुर के मैदान में कूदते समय नाना के कान में वही आक्रोश भयंकर रूप से गूंज रहा था। विस्तीर्ण रचना के साधन भी विस्तीर्ण ही होते हैं। जर्जर हुई मातृभूमि को मदोन्मत्त अत्याचारों के हाथ से छुड़ाने जैसा कार्य करने के लिए पहली मूलभूत एवं 1857 का स्वातंत्र्य समर - 84 ³⁴ 1. ट्रेवेलियन कृत-'कानपुर' । 2. “दिल्ली के राजमहल से बहुत पहले ही एक राजाज्ञा प्रसारित की गई थी, जिसमें मुसलमानों को यह निर्देश दिया गया था कि वे अपने सभी महत्त्वपूर्ण समारोहों पर एक गीत का गायन करें, जिसकी राज-दरबार के संगीतज्ञ ने रचना की है, जिसमें बड़े ही मार्मिक शब्दों में उनकी जाति के पराभव और उनके उस प्राचीन धर्म की अवमानना का वर्णन उपलब्ध है जो कभी उत्तर की हिममालाओं से दक्षिणी राज्यों तक व्याप्त था; किंतु जो अब शैतानों और विदेशियों द्वारा पददलित किया जा रहा है।” –ट्रेवेलियन कृत-'कानपुर' । मेरे मत से-वृत्ति का अभिप्राय समझ पाने में पूरी तरह असमर्थ ग्रंथकार को इतना लिखना ही पड़ा। यह उस राष्ट्रगीत की सुंदरता का परिचायक है।
महत्त्वपूर्ण कोई बात है तो वह है सब लोगों का मनःप्रवर्तन। वस्तुस्थिति के क्रांति करनी हो तो सबसे पहले मनःस्थिति पर विजय पानी चाहिए। यह मनःक्रांति की चौकियां स्थापित करनी चाहिए। यह मनःक्रांति संपादित करने के लिए मन की ओर जो भी रास्ते जाते हैं उन सारे रास्तों का क्रांति की चौकियां स्थापित करनी चाहिए। मानव मन सहज ही उत्सवप्रिय होता है, अतः सामान्य जनसमूह को वश में करने के लिए उत्सव के अतिरिक्त दूसरा राजमार्ग नहीं दिखता। इन उत्सवों को शक्कर में घोलकर सिद्धांतों की गोली दी जाए तो समाज का बालमन उसे रूचि से गटक लेता है और उससे रोग भी ठीक हो जाते हैं। ऐसे गहरे विचार से उस गुप्त संगठन के कार्य में विभिन्न चित्ताकर्षक उत्सवों से सामान्य जन को स्वतंत्रता युद्ध की शिक्षा देने की व्यवस्था की गई थी। विभिन्न प्रकार के चित्रों के खेल तैयार कर, स्वधर्म की और स्वतंत्रता की कसी अवहेलना हुई है-इसका हूबहू नाटक उन चित्रों द्वारा प्रस्तुत कराया जाता था; और उस सारे अपमान, गुलामी और परतंत्रता का प्रतिशोध किस तरह लिया जाए, इसके उद्दीपक और अनिवार्य चेतना देनेवाले चरित्र इन तारों से बंधी गुड़ियों से दरशाए जाते थे। चौपाल, पनघट, चौकी, धर्मशाला आदि बस्ती की खुली जगह में वीर रसोत्पादक गीत गाकर लोगों को चेताया जाता था। उत्तरी हिंदुस्थान का अति प्रिय गीत आल्हा, जिसे सुनने पर आठ दिन में कहीं-न-कहीं लड़ाई होनी ही चाहिए, ऐसी धारणा है, वह वीर रस से भरा गीत-गाते लोगों की बाहें फड़कने लगी। पूर्वजों के पराक्रम के स्मरण से जब उनका रक्त खौलने लगता तो तुरंत विषय घुमाकर वर्तमान दासता की पूरी बात प्रस्तुत की जाती, इस पर जो 'हर-हर महादेव' की गर्जना न करे, ऐसा कापुरुष कौन होगा? राष्ट्रकार्य के लिए केवल उस राष्ट्र के पुरुषों की अनुमति होने से ही बात पूरी नहीं होती। इसके लिए तो पुरुषों को जन्म देनेवाली कोख में भी राष्ट्र-क्षोभ के बीज अंकुरित होना आवश्यक है। भारतीय महिलाओं की शूरता कितनी सहायक होती है-यह सिखों का और राजपूतों का इतिहास अभिमानपूर्वक कहता है। भारतीय स्त्रियों की मन-सामर्थ्य संपादन हेतु इस गुप्त संगठन के कार्यक्रम में वैदू लोगों की महिलाओं को लगाया गया था।³⁵ इन वैदू महिलाओं की घरेलू दवाइयां एवं सामान्य ज्योतिष कार्य के लिए हिंदुस्थान के सामान्य वर्ग की महिलाओं में हमेशा आवाजाही होती है। अतः भारतीय स्त्रियों को ऐसी दवाई देने के लिए जिससे अपनी मातृभूमि का यह गुलामी का रोग ठीक हो और वह दवाई देने पर गुलामी का भूत मां को कब छोड़ेगा और यह भूत-बाधा उतरते ही उसे स्वतंत्रता का सुंदर बालक कब उत्पन्न होगा, यह भविष्य बताने का कार्य ये वैदू महिलाएं जितनी कुशलता से करती थीं उतना कोई धन्वंतरि भी नहीं कर सकता था। इन वैदू महिलाओं ने महिलाओं में और मौलवी तथा पंडितों ने पुरुष समाज 1857 का स्वातंत्र्य समर - 85 ³⁵ ट्रेवेलियन।
में जिस तरह प्रचंड जागृति उत्पन्न कर दी, उसी तरह गांव-गांव घूमनेवाले तमाशेवालों ने भी इस राष्ट्रक्षोभ को बहुत बढ़ाया। ये तमाशगीर अपने खेलों में गुलामी से घृणा उत्पन्न करने का प्रयास करते थे। इस प्रकार हर तरह के और हर स्तर के लोगों में अंग्रेजी शासन पलट देने के लिए सन् 1857 के उस गुप्त संगठन के प्रचंड प्रयास चल रहे थे। इस संगठन के गुप्त केंद्र अब सब स्थानों पर फैल गए थे।³⁶ इस गुप्त संगठन की जिस राजभवन में प्रथम प्राण-प्रतिष्ठा हुई उस ब्रह्मवर्त में तो उसकी बढ़त जोरदार ही रही थी; परंतु श्री नाना के और अजीमुल्ला के पत्रों ने और उपदेशकों ने अब हजारों स्थानों पर उस रचना की शाखाएं खोल दी थी। ब्रह्मवर्त में नाना का निवास आगामी मंगल कार्य की तैयारी में जैसे जुटा दिखता था वैसी ही दिल्ली के महल में भी तैयारी की धूमधाम थी। इधर लखनऊ और आगरा में उस देशभक्त-मौलवी अहमद शाह में जिहाद के बीज इतने गहरे उतर गए कि वह सारा शहर जैसे किसी क्रांतिकारी दल का गढ़ बन गया। मौलवी, पंडित, जमींदार, किसान, व्यापारी, वकील, विद्यार्थी ऐसी सारी जातियां और सारे पंथ स्वधर्मार्थ और स्वदेशार्थ अपने प्राणदान करने की दीक्षा लेकर सज्जित हो गए थे और इस गुप्त रचना की अगुवाई करनेवालों में सबसे अग्रणी नेता एक पुस्तक विक्रेता था। कलकत्ता में तो स्वयं अवध के पूर्व नवाब और उनके मुख्य वजीर अली नक्की खान ठहरे हुए थे। उपर्युक्त मुख्य वजीर ने सन् 1857 की घटना में जितना धैर्य, चतुराई और साहस दिखाया उतना बहुत कम दिखा पाए होंगे। कलकत्ता में मुख्य काम बैरकपुर, दमदम आदि स्थानों पर रह रहे सिपाहियों को राज्य क्रांति के लिए अनुकूल कर लेने का था। वह बहुत नाजुक काम अली नक्की खान ने इतनी सफाई से किया कि सन् 1857 का वर्ष आते ही सारे सिपाही राष्ट्रकार्य में मिल जाने के लिए शिवजी का बेल पत्र उठाकर या गंगाजल हाथ में लेकर या कुरान की कसम लेकर वचनबद्ध हो गए थे और अवध के नवाब ने भी उन्हें उदारता का वचन दिया था। सिपाहियों के सारे ठिकानों पर रात को गुप्त बैठकें होतीं और वहां शपथ-विधि संपन्न होते ही दूसरे दिन उस रेजीमेंट का सूबेदार नवाब के यहां जाकर स्वतंत्रता संग्राम के लिए उनसे मिलने का वचन दे आता। इन सिपाहियों के मिलने के मुख्य स्थान मेरठ और बैरकपुर ही थे। उत्तर में जैसी संगठित और नियमित रचना थी वैसी ही दक्षिण में बनाने के लिए रंगो बापूजी प्रयासरत थे। पटवर्धनी रियासतों ओर कोल्हापुर के दरबार में क्रांतियुद्ध के लिए जाल 1857 का स्वातंत्र्य समर – 86 ³⁶ अपने विस्तृत इतिहास के अंत में मैलसन लिखता है-‘’इस षड्यंत्र का नेता निश्चित रूप से मौलवी ही था। इस संगठन की शाखाएं संपूर्ण भारत में फैल गई थीं। निश्चित रूप से ही आगरा में, जहां यह मौलवी यदा-कदा रहता था और दिल्ली, मेरठ, पटना एवं कलकत्ता में भी वहां अवध का पूर्व नवाब रहता था, इस क्रांति संगठन का प्रभाव प्रायः व्यापक ही था।''
बुना जा रहा था। अधिक क्या कहा जाए, परंतु ठेठ मद्रास तक इस क्रांतियज्ञ की ज्वालाएं भड़कने लगी थी। सन् 1857 की जनवरी में निम्न घोषणापत्र प्रकाशित हुआ- "हे देशबंधुओं और धर्मनिष्ठों, उठो! काफिर अंग्रेजों को अपने देश से भगा देने के लिए सारे उठो! इन अंग्रेजों ने न्याय के सारे सिद्धांत मटियामेट कर दिए हैं। उन्होंने हमारा स्वराज्य लूट लिया है और स्वदेश को धूल में मिलाने का उनका दृढ़ निश्चय है। अंग्रेजों की इन भयानक यातनाओं से अपने हिंदुस्थान को मुक्त करने के लिए केवल एक ही उपाय शेष रह गया है और वह उपाय है तुमुल युद्ध करना। ऐसे युद्ध में जो रण-मैदान में खेत रहेंगे वे अपने देश के शहीद होंगे। जो स्वदेश एवं स्वधर्म के लिए लड़ेंगे और मरेंगे उन वीर्यवान् शहीदों के लिए स्वर्ग के दरवाजे खुल रहे हैं और जो डरपोक और देशद्रोही अधम इस राष्ट्रकार्य से परावृत्त होंगे उनके लिए नरक के द्वार खुले होंगे। देशबंधुओं, इनमें से तुम क्या स्वीकार करोगे?"³⁷ ऐसी स्थिति में सन् 1857 का उदय हुआ और ऐसी सूचनाएं आने लगी कि हिंदुस्थान में यत्र-तत्र सांकेतिक महत्कार्य का मुहूर्त आ गया। इसी समय कारतूसों का बखेड़ा खड़ा हुआ। हर एक सिपाही दिन में अपनी बंदूक को रगड़-रगड़कर साफ करता और रात होते ही अपनी रेजिमेंट के सूबेदार मेजर के बंगले पर आयोजित होनेवाली गुप्त बैठकों में जाकर स्वतंत्रता संग्राम के लिए शपथ दिलाने के लिए भोज के कार्यक्रम आयोजित करते। इन भोजों के समय एक-दूसरे से योजना कही जाती और उन योजनाओं को फिर नाना साहब या अली नक्की खान को बताया जाता। कुछ रेजिमेंटों में ऐसी क्रांति घटना चलते हुए गलती या विश्वासघात से वह जानकारी सरकार के कानों तक गई तो एक-दो रेजिमेंटों को निःशस्त्र कर दूर कर दिया गया। बहुत बढ़िया! ये सारे सिपाही स्वयंसेवक बनकर गांव-गांव जाते और क्रांतियुद्ध के जिहाद का उपदेश करते। सिपाहियों के सब ठिकानों से वचन-पत्र ऐसा था। सातवीं अवध रेजिमेंट का अड़तालीस रेजिमेंट को भेजा गया वचन-पत्र ऐसा था- "रेजिमेंट के हमारे भाई का मत हमें स्वीकार है। कारतूसों के बारे में उनके जैसा ही व्यवहार करेंगे और समय आने पर टूट पड़ेंगे।" बैरकपुर से सियालकोट जैसे दूर देश भेजे गए पत्र पकड़े गए थे। उनमें एक में बैरकपुर के सिपाही सियालकोट के सिपाहियों को लिखते हैं- "भाइयों, शत्रुओं के विरूद्ध उठो!" रूसी क्रांति की तरह ही हिंदुस्थान के क्रांतियुद्ध में भी पुलिसवाले जनता से बहुत सहानुभूति बरतते थे। क्रांति के गुप्त संगठन यंत्र का प्रचंड पहिया अब तीव्र गति से 1857 का स्वातंत्र्य समर – 87 ³⁷ 1. चार्ल्स बाल कृत-'इंडियन म्यूटिनी', खंड 1, पृष्ठ 40 । 2. रेड पैंफलेट, खंड 1 ।
घूमने लगा था। ऐसे समय में विभिन्न पहियों की गति एक लय में घूमने लगे, ऐसा प्रयास आवश्यक था। इसी उद्देश्य से क्रांति पक्ष का एक दूत हाथ में रक्त कमल पुष्प लेकर बंगाल की सैनिक छावनी में प्रवेश करता और अपने हाथ का फूल पहली टुकड़ी के मुख्य भारतीय अधिकारी को देता। भारतीय अधिकारी उसे अपने निचले आदमी को देता-और इस तरह वह कमल हर सिपाही के हाथ से होकर अंतिम सिपाही तक और अंतिम सिपाही से फिर आए हुए उस क्रांतिदूत के हाथ लौट आता। बस, इतना काफी था! इस तरह एक शब्द भी बोले बिना वह क्रांतिदूत तीर की तरह आगे बढ़ता और रास्ते में दूसरी टुकड़ी मिलते ही उसके मुखिया के हाथ में वह रक्त कमल दे देता। इस रीति से कमल काव्य में पूर्ण हुआ संगठन क्रांति के एक ही रक्तमय विचार से भर जाता। यह रक्त कमल मानों क्रांति की अंतिम राजमुद्रा ही थी। इस रक्त कमल को स्पर्श करते ही सिपाहियों के मन में किन भावनाओं का उछाल आता, इसकी कल्पना नहीं की जा सकती। वस्तुतः किसी महान् वक्ता को अपने अतुल्य शब्दों से श्रोताओं में जो वीर वृत्ति जागृत कर पाना कठिन था उस वीर वृत्ति का संचार इन लड़ाके सैनिकों में उस निर्वाक् कमल पुष्प ने अपने रक्तिम वर्णीय संकेत से किया। कमल पुष्प! शुचि, यश और प्रकाश का कविजनों का मान्य काव्य प्रतीक! और उसका वर्ण? रक्तोज्ज्वल ! रक्तोज्ज्वल!! उस पुष्प में स्पर्श मात्र से हृदय पुष्प विकसित हो उठे, इतना वह मृदुचेतन! सैकड़ों सिपाहियों द्वारा जब वह कमल पुष्प इस हाथ से उस हाथ में दिया गया होगा तब उस पुष्प के मूक वाक् संदेश से भी बहुत बड़े गूढ़ार्थ एवं उदात्त ध्येय की स्फूर्ति संचरित हो जाती होगी, यह बात निश्चित है। इस रक्त कमल के कारण सबके हृदय सच में एक हो गए। क्योंकि बंगाल में सिपाही और किसान दोनों ही एक ही बात बोलते हुए दिखाई देते कि 'सबकुछ लाल होगा!' सब ओर अब लाल होना है।³⁸ उस रक्त कमल और उसके द्वारा संचरित भावना ने हर व्यक्ति के हृदय में एक ही ध्वनि का निर्माण किया था। सिपाही द्वारा सिपाही को लिखे पत्र भी इसी रीति से लिखे होते थे। परंतु इस संगठन के नेताओं के पत्र अत्यंत महत्त्वपूर्ण होते थे, अतः उन्हें बहुत सावधानी से लिखा जाता। अधिकतर योजना एवं रचना प्रत्यक्ष व्यक्ति भेजकर ही निश्चित की जाती। परंतु पत्र भेजना ही हो तो अत्यंत अस्पष्ट भाषा में लिखे जाते थे। इतना ही नहीं अपितु ये अस्पष्ट पत्र पकड़े जाने पर कदाचित् मुश्किल हो जाएगी, इसलिए चतुर नेता लोग अपना सारा पत्राचार सांकेतिक भाषा में ही करते थे। कुछ बूंदों 1857 का स्वातंत्र्य समर – 88 ³⁸ ट्रेवेलियन कृत-'कानपुर'।
की और आंकड़ों की लिपि बनाकर उसका इस गुप्त संगठन में उपयोग किया जाता।1³⁹ परंतु इन संकेत चिह्नों और इन गुप्त पत्रों में भी जो राष्ट्रीय उद्बोध न दिया जा सका वह उद्बोध हिंदुस्थान की भविष्यवाणी ने दिया। भविष्य कथन मन के आगामी काल में होनेवाली कूद है। मन दिव्यत्व पर भविष्य का दिव्यत्व अवलंबित होता है। सन् 1857 में हिंदुस्थान का मन स्वतंत्रता के प्रकाश से दिव्य हो गया, इसलिए सन् 1857 में हिंदुस्थान के भविष्य कथन में अति महत्त्वपूर्ण और 1857 के इतिहास पर उसके कितने ही पृष्ठों पर मुद्रांकित हुआ वह भविष्य यह था कि कंपनी का राज ठीक सौ साल में समाप्त हो जाएगा। प्लासी की लड़ाई को सन् 1857 में सौ वर्ष पूरे हो रहे थे। अतः इस वर्ष की जनवरी से एक विलक्षण आशा और एक विलक्षण चेतना पूरे दे के कण–कण में संचार कर रही थी। इस एक भविष्य कथन ने देखते–ही–देखते राष्ट्र में ऐसी आशा उछाल दी कि अंग्रेजी राज डूब जाएगा। इस भविष्य काल को वर्तमान काल में बदलने के लिए हर कोई सज्जित होने लगा। सन् 1857 के साल में अंग्रेजी राज डूबेगा, इस भविष्य कथन द्वारा राष्ट्र विभूति को स्वतंत्रता–प्राप्ति के लिए पहले ही तैयार किया गया। वह इसीलिए कि रण–देवता से स्वतंत्रता का दान मिलते ही किसी तरह का आकस्मिक घोटाला न होने पाए; सिपाही, सेनापति, पटेल, जमींदार आदि अंग्रेजी शासन में जिस–जिस पद पर थे उसी पद पर रहकर स्वतंत्र राज्य की सेवा किसी तरह की गड़बड़ी न करते हुए करें, ऐसी योजना बनी थी। गुप्त संगठन के नेताओं ने कितनी कुशलता से सारे राष्ट्र को सूचिबद्ध कर दिया था, इसे ध्यान से देखने पर मन धन्य हो जाता है। जन–क्षोभ को उत्तेजित करने रोज लखनऊ में उत्तेजक और क्रांतिकारी घोषणापत्र लगाए जाते। इन घोषणापत्रों में–सारे भाई एक साथ उठें और हिंदुस्थान का राज्य वापस लें, ऐसा उपदेश अति उत्तेजक भाषा में दिया जाता। सुबह होते ही शहर के हर चौराहे पर इस अर्थ के नए घोषणापत्र और पर्चे लगे मिलते। ये बातें अंग्रेज अधिकारियों के कानों में पहले ही पड़ी होने पर भी उन्हें ये पत्र और उनके लेखकों को गाली देते हुए कुढ़ते रहने के सिवाय कुछ करते बनता नहीं था। क्योंकि पुलिसवाले कहते कि ये पत्र–परचे लिखता कौन है? इसे खोज पाना कठिन है। कुछ ही दिनों में अंग्रेजों को ज्ञात हो गया कि ये पुलिसवाले ही क्रांतिपक्ष के नेता थे। गुलामी की सुरक्षा की अपेक्षा स्वतंत्रता की रक्षा करनेवाले पुलिसवाले रूस की राज्य क्रांति में दिखते हैं, ऐसा नहीं, वे हिंदुस्थान की राज्य क्रांति में भी थे। उत्तरी हिंदुस्थान में जैसे यह गुप्त संगठन कुशलता से खड़ा हो गया था वैसे ही यदि दक्षिण में भी होता तो कैसी बहार आ जाती! 1857 का स्वातंत्र्य समर - 89 ³⁹ 1- इन्स कृत-'सेपॉय रिवॉल्ट', पृष्ठ 55 । 2. रेड पैंफलेट, खंड 2 ।
इस तरह इधर-उधर मन-प्रवर्तन की लहरें उठा देने के बाद श्री नाना साहब फिर सारे केंद्रों को भी सूत्रबद्ध कर डालने के लिए और मुख्य-मुख्य गुप्त संगठनों में एकवाक्यता लाने के लिए ब्रह्मवर्त के बाहर निकले। सन् 1857 के अप्रैल में श्रीमंत अपने साथ अपने भाई बाबा साहब और अपने मंत्री अजीमुल्ला खान को लेकर दिल्ली की ओर गए। दिल्ली के वातावरण में उस समय नाना ने क्या मंत्र पढ़े और दिल्ली के दीवाने-आम में बादशाह से नाना ने क्या निजी बातें की, इसकी स्मृति केवल उस वातावरण और दीवाने-आम को ही होगी! अंग्रेज लोगों में से मोर्लड नाम का अधिकारी आगरा में जज के पद पर था। वह उस समय नाना से मिलने गया था और उसका नाना द्वारा उत्तम स्वागत हुआ था, इस कारण अगले तीन माह बाद अंग्रेजों के कैसे स्वागत की तैयारी नाना कर रहे थे, इसकी उसको हवा भी नहीं लगी। दिल्ली की सारी तैयारी देख और वहां के सारे काम जांच नाना लखनऊ चले गए। सन् 1857 के गुप्त संगठन के केंद्रों में लखनऊ अत्यंत महत्त्वपूर्ण केंद्र था। 18 अप्रैल को नाना साहब लखनऊ की ओर चले। उसी दिन सुबह लखनऊ के चीफ कमिश्नर सर हेनरी लॉरेंस की बग्घी के पीछे दौड़ते हुए लोगों ने उस पर कीचड़ के लड्डू फेंके थे और जल्दी ही इससे अधिक प्रभावी लड्डू कैसे फेंके जाए, यह बताने के लिए नाना की सवारी वहां आई थी। फिर क्या? उस लखनऊ शहर के उत्साह और सहस की कोई सीमा नहीं रही। लखनऊ शहर देखने का अर्थ क्या है, इसकी उस समय उस पगले को क्या कल्पना होती। नाना इसी माह कालपी शहर देखने भी गए। आगे स्वतंत्रता संग्राम में जिन्होंने अपने अतुल देशाभिमान और रण-कुशलता से पूरे जग को चकित किया उस जगदीशपुर के कुंवर सिंह से नाना की राजनीति चल रही थी और उधर के सारे आंदोलन का नक्शा भी इसी समय अंतिम आकार ले पाया था। इस रीति से दिल्ली, लखनऊ, कालपी, जगदीशपुर आदि स्थानों पर स्थित प्रमुख नेताओं से प्रत्यक्ष मिलकर और उनकी सलाह से भावी क्रांति का पक्का नक्शा बनाकर श्री नाना साहब अप्रैल के अंत में ब्रह्मवर्त लौट आए। प्रमुख नेताओं से मिलकर बात पक्की करने नाना साहब जब इधर प्रवास कर रहे थे तब उधर सारे देश में भावी मंगल कार्य की सुपारी देने के लिए राज्य क्रांति के संदेश वाहक अपने कार्य में संलग्न थे। वे आज ही अवतरित हुए हैं, ऐसा बिल्कुल नहीं हैं; क्योंकि वेल्लोर के विद्रोह के पहले भी उधर ऐसी ही रोटियां भेजी गई थी। सन् 1857 के आरंभ में गुप्त पंखों के ये देवदूत सारे हिंदुस्थान में भावी मंगल कार्य का समाचार देते हुए भ्रमण करने लग गए थे। वे कहां से आए और किधर जाएंगे, यह कोई 1857 का स्वातंत्र्य समर - 90
भी नहीं जान पा रहा था। ये देवदूत जिसे समझ में आता उसी को मुख्य संदेश देते और जिसे ठीक न समझते उससे खूब बतियाते। इस विचित्र रोटी को कुछ पगले अंग्रेज अधिकारियों ने पकड़-पकड़कर उसका चूरा किया और फिर उस चूरे का भ चूरा बनाकर उससे कुछ कहलवाने के प्रयास किए; परंतु किसी चुड़ैल की तरह उस चपाती को बोलने को कहते ही वह अपने मुंह की जीभ ही नष्ट कर देती और जिससे मन होता उसी से बोलती। वह रोटी गेहूं या बाजरे के आटे की बनी होती थी। उस पर यद्यपि कुछ भी लिखा हुआ नहीं होता था, फिर भ वह हाथ में आते ही, उसका स्पर्श होते ही हर व्यक्ति की देह में क्रांति चेतना संचार करने लगती। हर गांव में मुखिया के पास वे रोटियां आती। वह स्वयं उसका एक टुकड़ा खाता और उसका प्रसाद के रूप में सारे गांव में बांट देता। फिर उतनी ही जाता रोटियां बनवाकर वे गांववाले पड़ोस के गांव में भिजवा देते। जा, हे क्रांति के देवदूत ! ऐसे ही आगे जा। अपनी प्रिय माता, अपनी स्वतंत्रता के लिए जिहाद करने को तैयार हो गई है, यह शुभ वार्त्ता उसके बच्चों को सुनाने दसों दिशाओं में दौड़कर जा। तुम्हारी मां पर संकट है, अतः उसके बचाव के लिए दौड़! दौड़! ऐसी कर्कश चिल्लाहट करते हुए आधी रात में भी न रुकते निरंतर दौड़ता रह! गढ़ और कोट के दरवाजे बंद हैं, तथापि उनके खुलने तक न रुकते वहां आकाश मार्ग से पहुंच जा। घाटियां गहरी हैं, कगार टूटे हुए हैं, नदियां विराट् हैं, वन भयानक हैं। परंतु इस कारण एक क्षण भी न सहमते हुए यह भयंकर राष्ट्र-संदेश लेकर तू तीर की गति से बढ़ता जा। तेरी गति पर हमारी इस माता का जीवन और मृत्यु अवलंबित है। इसलिए तेरे पंख जितने काट सकें उतनी दूरी कम करते हुए पूरे वातावरण में उड़ान भरता जा। शत्रु ने तेरी दे हके किसी अंग का भंग किया तो भी हे मायावी देवदूत! हमारे राष्ट्र के इस संकट के समय में तू हजारों-लाखों देह धारण कर उस हर देह में जीभ लगाकर बढ़। पत्नी एवं पति, माता एवं बालक, बहन एवं भाई सबको स्वतंत्रता संग्राम की कार्य-सिद्धि के लिए सपरिवार आने का निमंत्रण देना। कानपुर के देवता को बुलाना; शंख, भेरी, दुंदुभि, ध्वज, पताका, रणगीत, गर्जना, गड़गड़ाहट आदि सारे सगे-संबंधियों को इस युद्ध कार्य की इष्ट सिद्धि के लिए बुला लाना। कुल देवता, ग्राम देवता एवं राष्ट्र देवता अपने-अपने अनुचरों सहित स्वातंत्र्य समर के मंगल समारोह के लिए सुसज्ज होकर उत्सुक हैं-उन सबसे कह-'अति समयों वर्तते' सावधान! सावधान, मित्रों! सावधान!! और अपनी ही अकड़ में उस हरे-भरे पर्वत पर षांति से लेटे षत्रुओं, अब सावधान! यह पर्वत ऊपर से जितना हरा-भरा दिखता है उतना ही वह अंदर से भी हरा-भरा होगा, इस विश्वास से* तुम इसके माथे पर लातें मार रहे हो 1857 का स्वातंत्र्य समर - 91
क्या? मारो, वैसे ही मारते जाओ लातें! जल्दी ही तुम्हें कालिदास के शमप्रधानेषु तपोधनेषु गूढं हि दाहात्मकमस्ति तेजः-इस वचन की सच्चाई ज्ञात होगी। हे विश्व! यह हमारा तपोधन हिंदुस्थान शम-प्रधान है, यह सच है; पर इसलिए तुम इसके इस शम-प्रधानत्व का अनुचित लाभ मत उठाना। क्योंकि इस तपोनिधि के शरीर में प्रदाहक, प्रचंड शक्तियां भी गूढ़ता से भरी हुई है। शंकर के तीसरे नेत्र की कथा क्या तुमने कभी सुनी है? वह नेत्र जब तक खुलता नही तब तक बहुत शांत रहता है। परंतु उसके खुलते ही पूरे विश्व को राख करने में सक्षम ज्वालाएं उसी में से निकलती हैं। तूने कभी ज्वालामुखी को देखा है। वह ज्वालामुखी ऊपर से हरा-भरा रहता है, पर यदि वह एक बार अपना जबड़ा खोलने लगे तो उसके उबलते अग्नि रस से दसों दिशाएं जलने लगती हैं। परंतु इस सामान्य ज्वालामुखी से भी जाज्वल्यतर यह हिंदुस्थान का जीवित ज्वालामुखी अब खौलने लग गया है। उसके उदर के भयंकर अग्नि रस में लहरें उठने लगी हैं। उसके दाहक द्रव्य एक-दूसरे में मिल रहे हैं और उनपर स्वातंत्र्य-प्रेम की चिंगारी गिर गई है। उसके मस्तक पर नाचनेवालो, एक क्षण और ˙˙˙˙कि दिग्गजों के कान भी बधिर हो जाएं, ऐसी गड़गड़ाहट होनेवाली है, फिर मदांध जुल्म को यह ज्ञात होगा कि हिंदुस्थान के ज्वालामुखी का प्रतिशोध कैसा होता है। 40 1857 का स्वातंत्र्य समर – 92 40 अंग्रेजों को हिंदुस्थान की मनोवृत्तियां इतनी ज्ञात थीं कि 87 की फरवरी में अंग्रेजी पत्र एवं अंग्रेजी सरकारी रिपोर्ट कहती है-“संपूर्ण देश पूर्णरूपेण शांत है।” –चार्ल्स बाल
भाग-2 विस्फोट
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प्रकरण-9 शहीद मंगल पांडे सन् 1857 के क्रांतियुद्ध के इतिहास में एक आश्चर्यजनक बात थी उसकी परम गोपनीयता। पूरे युद्ध की रचना गुप्त रीति से हुई। सारे हिंदुस्थान भर में क्रांति रचना का दौर-दौरा चलते हुए भी अंग्रेजों जैसे धूर्त राज्यकर्ताओं को उस विद्रोह की इतनी कम जानकारी मिल पाई थी कि प्रत्यक्ष विद्रोह होने के एक वर्ष बीत जाने के बाद भी अंग्रेजों के अनेक अधिकारियों को विद्रोह का प्रमुख कारण कारतूस ही लगता था। कारतूस कितना निमित्त मात्र कारण था, यह अब कहीं जाकर अंग्रेजी इतिहासकारों को ज्ञात होने लगा है और सन् 1857 के भयंकर युद्ध में स्वदेशाभिमान और स्वधर्माभिमान का पवित्र स्फुरण उन योद्धाओं में कैसे संचरित हुआ था, यह स्पष्ट रीति से कुछ इतिहासकार डरते-डरते अब स्वीकार करते हैं।41 1857 का स्वातंत्र्य समर – 95 41 मैलसन ने लिखा है-"एक बहाने मात्र के रूप में ही और केवल इसी रूप में ही कारतूस क्रांति का कारण सिद्ध हुए थे। षड्यंत्रकारियों ने इस बहाने का पूर्ण लाभ उठाया था और उन्हें यह अवसर इसलिए उपलब्ध हुआ था, जैसाकि मैंने सिद्ध करने का प्रयास भी किया है कि सैनिकों तथा जनता के कतिपय वर्गों के मन में यह विश्वास बद्धमूल करा दिया गया था कि उनके विदेशी स्वामी प्रत्येक कार्य ही दृष्ट हेतु को लेकर कर रहे हैं। मेडली ने अपनी पुस्तक में लिखा है-'वस्तुतः चरबी से चिकने किए गए कारतूसों की बात ने तो केवल उस सुरंग में अंगार मात्र ही लगाया था जिसका निर्माण अनेक द्वारा किया गया था।" श्री डिजराइली ने तो सुस्पष्ट शब्दों में इस धारणा को अस्वीकार किया था कि "चिकने कारतूस ही इस विद्रोह का मूल कारण थे।" -चार्ल्स बाल कृत- 'इंडियन म्युटिनी', खंड 1, पृष्ठ 629
हिंदुस्थान जैसे विस्तीर्ण देश में राज्य क्रांति जैसे गंभीर काम को अंग्रेजों जैसे धूर्त अधिकारियों को हवा भी न लगने देते हुए इतनी गोपनीयता से संगठित करने का कार्य जिन्होंने किया उन श्रीमंत नाना साहब, मौलवी अहमद शाह, वजीर अली नक्की खान आदि नेताओं की जितनी प्रशंसा की जाए, वह कम है। सिपाही, पुलिस, जमींदार, राजस्व अधिकारी, किसान, व्यापारी, साहूकार आदि सारे वर्गों में और हिंदू और मुसलमान इन दोनों जातियों में अपूर्व दोस्ती और प्रचंड क्रांति के बीज बो दिए और वे बीज अंकुरित होते ही उन सबने उत्कृष्ट संगठन कर अंग्रेजों को उस प्रचंड हलचल की हवा भी लगने नहीं दी। यह गुप्त संगठन पूर्ण आकार ले पाए, इससे पहले 19 वीं पलटन पर प्रयोग किया जाएगा, ऐसा रंग दिखने लगा। बंगाल में फरवरी माह में सारी पलटनों की अपेक्षा 34वीं पलटन राज्य क्रांति के लिए अति उत्सुक हो गई थी। इस 34वीं पलटन का मुख्यालय बैरकपुर में होने से और वजीर अली नक्की खान उसके पास कलकत्ता में होने से उन्होंने सारी पलटन को शपथपूर्वक राज्य क्रांति-कार्य से जोड़ लिया था। इस पलटन की कुछ टुकड़ियां 19 वीं पलटन में भेजी गई थी। इस कारण उन टुकड़ियों ने 19 वीं पलटन को भी राष्ट्रकार्य में खींच लिया। परंतु परिस्थिति यह हो गई कि राज्य क्रांति की प्रचंड घटना की बिल्कुल भनक न लगने, अंग्रेज अधिकारियों को उसकी कोई जानकारी न होने से उन्होंने उस 19 वीं पलटन में भेजी गई थी। इस कारण उन टुकड़ियों ने 19वीं पलटन पर ही कारतूसों का पहला प्रयोग किया। परंतु वे कारतूस लेने से वह पलटन खुले रूप से मुकर गई और समय आया तो शस्त्र उठाने तक का अपना निश्चय है, यह प्रकट किया। वह कृत्य देखते ही हमेशा की तरह अंग्रेजों ने 'नेटिवों' को धौंस-पट्टी दिखाना चालू किया। परंतु अब वहां पहले के 'नेटिव' नहीं थे, यह बात उस पलटन में हो रही तलवारों की खनखनाहट से जल्दी ही गोरे अधिकारियों की समझ में आ गई। अब यह मानभंग चुपचाप पी जाने के सिवाय दूसरा रास्ता नहीं था; क्योंकि उस सारे प्रदेश में ऐसी एक भी पलटन नहीं थी जो इस नेटिव सेना को नियंत्रण में रख सके। यह बाधा दूर करने के लिए मार्च के प्रारंभ में ब्रह्मदेश में स्थित फिरंगी पलटन कलकत्ता लाई गई और 19वीं पलटन को निःशस्त्र कर काम से हटाने का आदेश जारी हुआ। इस आदेश पर कार्यवाही बैरकपुर में की जाए, यह निश्चित किया गया। 42 1857 का स्वातंत्र्य समर - 96 42 इससे भी एक पग आगे रखकर एक लेखक ने अपने ग्रंथ में लिखा है-“यह तो असंदिग्ध रूप से सिद्ध कर दिया गया है कि कारतूसों का भय था, तो अनेक के लिए बहाना मात्र ही था। जिन कारतूसों की टोपी दांत से तोड़ने पर अपने धर्म से ही हाथ धो बैठने का भय निर्माण कर बात का बतंगड़ बनाया गया था, हमसे युद्ध करते समय उन्हीं को वे ही सिपाही हमपर चलाते समय किसी प्रकार के संकोच का प्रदर्शन नहीं करते थे।”
अपने बंधुओं को अपनी आंखों से सामने दंडित किया जाएगा, यह सुनकर भी शांत रहनेवाला बैरकपुर नहीं था। वहां स्वतंत्रता की ज्योति हर तलवार में चमकने लग गई थी। परंतु इन सबसे अधिक मंगल पांडे की तलवार म्यान में अधीर हो रही थी। 19वीं पलटन की तरह ही 34वीं पलटन को भी समय आते ही कंपनी की नौकरी को लात मारकर निकल जाने की इच्छा थी। इसलिए 19वीं पलटन को कंपनी अपने आप ही निकाल रही है, यह बहुत बढ़िया हो रहा है-ऐसा सारे स्वदेशाभिमानियों को लग रहा था। सब ओर का एकमत होने तक एक माह रूका जाए, ऐसा चतुर नेता कह रहे थे और सारे हिंदुस्थान में अलग-अलग पलटनों में कौन सा दिन निश्चित किया जाए, को धीरज कौन बंधाएं? मंगल पांडे ब्राह्मण कुल में जनमा और क्षात्रधर्म में दीक्षित हट्टा-कट्टा जवान था। स्वधर्म पर प्राणों से अधिक निष्ठा रखनेवाला, आचरण से सुशीलवान, स्वभाव से तेजस्वी और आयु से तरूण मंगल पांडे के पवित्र रक्त में देश - स्वातंत्र्य की विद्युत चेतना प्रवेश कर गई थी। फिर उसकी तलवार कैसे धीरज रखे? शहीदों की तलवार को कभी धैर्य रहता है क्या! जय-पराजय की रत्ती भर भी परवाह न करते हुए अपनी तत्त्वनिष्ठा पर जो स्वयं के रक्त का अभिषेक करते हैं, ऐसे ही लोगों के सिर पर बलिदानी मुकुट झिलमिलाता है और इस निष्फल-से लगते उष्ण रक्त से ही विजय की मूर्ति प्रकट हुआ करती है। अपने स्वदेश बंधुओं का अपनी आंखों के सामने अपमान हो, यह बात मंगल पांडे के अंतरतम को असह्य पीड़ा देने लगी और अपनी रेजिमेंट उसी दिन विद्रोह करे, वह ऐसा आग्रह करने लगा। गुप्त समिति के नेता आज विद्रोह करने को अनुमति नहीं दे रहे हैं, ऐसा ज्ञात होते ही उस जवान का साहस रुकना दुष्कर हो गया। उसने लपककर अपनी बंदूक उठाई और 'मर्द हो वो उठो', ऐसी गर्जना करते हुए परेड मैदान में कूद पड़ा। “अरे, अब पीछे क्यों रहते हो? भाइयों, आओ, टूट पड़ो। तुम्हें तुम्हारे धर्म की सौगंध है-चलो, अपनी स्वतंत्रता के लिए शत्रु पर टूट पड़ो।” ऐसी गर्जना करते हुए वह अपने स्वदेश बंधुओं को अपने पीछे आने का आह्वान करने लगा। यह देखते ही सार्जेंट मेजर ह्यूसन ने सिपाहियों को मंगल पांडे को पकड़ने का आदेश दिया। परंतु अंग्रेजों को आज तक मिले देशद्रोही सिपाही मंगल पांडे को पकड़ने नहीं हिला। और इधर मंगल पांडे की बंदूक से सन्-सन् करके निकली गोली ने उस ह्यूसन का शव तत्काल भूमि पर पटक दिया। यह गड़बड़ हो ही रही थी कि इतने में लेफ्टिनेंट बॉ भी वहां आ गया। इससे पहले कि उसका घोड़ा नाचते-नाचते आगे सरकता, मंगल पांडे की बंदूक से दूसरी गोली छूटी और वह उस घोड़े के पेट में घुसते ही घोड़ा लेफ्टिनेंट को लेकर धड़ाम से गिरा। मंगल पांडे को बंदूक भरने का अवसर मिले, इसके
1857 का स्वातंत्र्य समर – 97
पहले ही धूल में पड़े लेफ्टिनेंट ने अपनी पिस्तौल निकाल ली। यह देखते ह मंगल पांडे ने तिल भर भी डगमगाए बिना अपनी शमशीर निकाली। बॉ ने पिस्तौल चलाई, पर गोली चूक गई और वह तलवार निकाले, उसके पहले ही मंगल पांडे की तलवार का बार हुआ और बॉ मिट्टी सूंघने लगा। इतने में मंगल पांडे पर उस पहलेवाले गोरे की हमले की तैयारी में बढ़ता देख पास के एक सिपाही ने बंदूक के दस्ते से उसका सिर फोड़ दिया और सारे सिपाहियों ने गर्जना की-'मंगल पांडे को कोई हाथ न लगाए।' तभी कर्नल हीलर वहां आया और मंगल पांडे को पकड़ने का आदेश देने लगा। "हम अपने आदरणीय ब्राह्मण के बाल को भी नहीं छुएंगे", फिर ऐसी गर्जना हुई और अंग्रेजों के गाढ़े लाल रक्त के उस दृष्य के आगे अधिक न रूकते हुए वह कर्नल जनरल के बंगले की ओर भाग गया। इधर मंगल पांडे अपने रक्तरंजित हाथ उठाकर- "मर्दों, बढ़ो!" ऐसी भयानक गर्जना करते हुए इधर-उधर घूम रहा था। जनरल हीर्से को यह समाचार मिलते ह ीवह कुछ और युरोपियन सैनिक लेकर मंगल पांडे की ओर दौड़ता आया। अब निश्चित ही षत्रु पकड़ लेगा, यह जान उस देशवीर मंगल पांडे ने फिरंगियों के हाथों पकड़े जाने की अपेक्षा मृत्यु को अपनाने का निश्चय किया और अपनी बंदूक अपने ही सीने की ओर कर ली और तत्काल उसकी पवित्र देह घायल होकर गिर गई। तुरंत उस घायल युवक को अस्पताल ले जाया गया; और उस एक सिपाही ने जो बहादुरी दिखाई उससे लज्जित होकर सारे अंग्रेज अधिकारी अपने-अपने तंबू में चले गए। यह सन् 1987 के मार्च की 29 तारीख थी। मंगल पांडे का कोर्ट मार्शल कर जांच-पड़ताल हुई। उस जांच में वह अन्य षड़यंत्रकारियों के नाम बताएं, इसके लिए बहुत प्रयास हुए। परंतु उस तेजस्वी युवक ने 'वह किसी के भी नाम बताने को तैयार नहीं है, 'यह उत्तर दिया। उसने यह भी बताया कि मैंने जिनपर गोलियां चलाई उन अंग्रेज अधिकारियों से मेरा किसी तरह का व्यक्तिगत द्वेष नहीं था। यदि व्यक्तिगत द्वेष होता तो उनकी हत्या खून मानी जाती। मंगल पांडे का मंगल नाम शहीदों की सूची में न जाकर खूनी मनुष्यों की सूची में डालना पड़ता। परंतु मंगल पांडे का वह साहस सिद्धांतों के लिए था। स्वदेश और स्वधर्म की रक्षा के लिए सुखे-दुःखे समे कृत्वा' मंगल पांडे की तलवार म्यान से बाहर निकली थी। स्वदेश ओर स्वधर्म का अपमान देखने से मृत्यु भली है-यह वज्र निश्चय करके ही वह बाहर निकला था। इस कार्य में जैसी उसकी स्वदेश-भक्ति और स्वधर्म-प्रीति दिखाई दी, वैसा ही उस युवा की तलवार का पानी भी दिखाई दिया। ऐसे युवा को फांसी का दंड सुनाया गया। दिनांक 8 अप्रैल उसकी फांसी के लिए तय हुआ। शहीदों के रक्त में क्या तेज होता है, यह तो ज्ञात नहीं, परंतु उसके नाम-स्मरण से भी मन की उदात्त वृत्तियां खिलने लगती हैं। परंतु जिनकी दृष्टिट को मंगल पांडे के प्रत्यक्ष दर्षन का लाभ हुआ था- 1857 का स्वातंत्र्य समर - 98
बैरकपुर के ऐसे सारे नागरिकों के हृदय में उसके प्रति दिव्य प्रीति उत्पन्न हुई हो तो इसमें क्या आश्चर्य! उस सारे बैरकपुर षहर में मंगल पांडे को फांसी देने के लिए एक भी जल्लाद नहीं मिला। अंत में उस अमंगल कार्य के लिए कलकत्ता से चार जल्लाद लाए गए। दिनांक 8 अप्रैल को सुबह मंगल पांडे को फांसी-स्थल की ओर ले जाया गया। चारों ओर लष्करी लोगों का पहरा था। उनके बीच से मंगल पांडे गर्व से चलता चला गया और फांसी पर चढ़ गया। “मैं किसी के नाम नहीं बताऊंगा,” यह एक बार फिर से कहते ही उसके पैर के नीचे का सहारा निकाल लिया गया और मंगल पांडे की देह से उसकी पवित्र आत्मा स्वर्ग चली गई। इस तरह सन्1857 के क्रांतियुद्ध की पहली भिड़त हुई और इस रीति से उस क्रांतियुद्ध का पहला षहीद स्वर्गवासी हो गया। जिसके रक्त से सन् 1857 की षहादत की नदी का उद्गम हुआ उस देषवीर, धर्मवीर मंगल पांडे का नाम हर एक के कंठ एवं हृदय में अक्षय बना रहना चाहिए। सन् 1857 में हिंदुस्थान के स्वतंत्रता बीज में अंकुर फोड़ने के लिए मंगल पांडे ने अपना उश्ण रक्त सबसे पहले अर्पित किया। उस स्वतंत्रता की फसल आगे-पीछे कभी लहलहा उठी तो उसके पहले नैवेद्य का अधिकारी मंगल पांडे है। मंगल पांडे नहीं है, पर उसका चैतन्य सारे हिंदुस्थान में फैला हुआ है और जिस सिद्धांत के लिए मंगल पांडे मरा वह सिद्धांत चिरंजीवी हो गया है। मंगल पांडे ने सन् 1857 के क्रांतियुद्ध को अपना रक्त दिया, इतना ही नहीं अपितु उस क्रांति में जो-जो स्वदेश के और स्वधर्म के लिए लड़े उन सबको 'पांडे' उपाधि लगाने का प्रयत्न षुरू हो गया।43 और इसीलिए यह नाम हर माता अपनी संतान को साभिमान बताने लगी। 1857 का स्वातंत्र्य समर – 99 43 “यह नाम भारत भर में सभी विद्रोही सिपाहियों के लिए उपनाम के रूप में ख्याति प्राप्त कर गया।” –चार्ल्स बाल “सिपाहियों को सामान्यतः 'पांडे कहकर संबोधित किए जाने का उद्गम स्थल यह नाम ही था।” –लॉर्ड रॉबर्ट कृत–'फोरटी वन ईयर इन इंडिया'
प्रकरण-२ मेरठ देशवीर मंगल पांडे के बलिदान से सन् 1857 का बीज जमते ही उसे अंकुरित होने में देर क्यों हो? जिस 19वीं रेजिमेंट में मंगल पांडे था उस रेजिमेंट के सूबेदार को भी इस आरोप में फांसी दी गई कि उसने रात में क्रांतिकारी बैठकें कीं और 19वीं रेजिमेंट व 34वीं रेजिमेंट इन दोनों ने मिलकर पूरे प्रदेश में विद्रोह करने का गुप्त षड्यंत्र रख-यह उनके पास मिले कागज-पत्रों से सिद्ध हो जाने पर उन्हें निःशस्त्र कर नौकरी से निकाल देने का दंड दिया गया। सरकार के हिसाब से वह दंड था; परंतु इन दोनों ही रेजिमेंट के सिपाहियों को यह अपना बड़ा सम्मान लग रहा था। जिस दिन उन्हें शस्त्र नीचे रखने का आदेश हुआ उस दिन युरोपियन सेना को पूरी तरह तैयार रखा गया था। अंग्रेज अधिकारियों को विश्वास था कि नौकरी से निकाल देने के दंड से सिपाही पश्चात्ताप करेंगे; परंतु उन हजारों सिपाहियों ने किसी बहुत ही अपवित्र वस्तु की तरह कंपनी की दासता पर खुशी से लात मारी। अपने बूट और यूनिफार्म फाड़-फूड़कर फेंक दिए। उन सिपाहियों को अपने वेतन से सैनिक टोपियां लेनी पड़ती थी। अतः उसे उनकी निजी संपत्ति मान कंपनी ने उन्हें छूट दी थी कि वे चाहें तो उसे ले जाएं । परंतु नदी में नहाकर बाहर आने के बाद फिर से गुलामी का चिह्न को स्पर्श किया तो। अब हिंदुस्थान को कोई दूसरा आकर टोपी पहनाए, वे दिन लद गए हैं। फेंक दो दासता की टोपियां। हजारों टोपियां आकाश में दिखने लगी। परंतु गुरूत्वाकर्षण के जिददी स्वभाव के कारण वे फिर से हिंदुस्थान की भूमि पर ही गिरी। फिर से भू देवी को 1857 का स्वातंत्र्य समर - 100
दासता की छूत लगी। दोड़ो सिपाहियों, उन दास्य चिन्हों को उन अंग्रेजी अधिकारियों के सामने फाड़कर और पैरों तले कुचलकर धूल में मिला दो। हजारों सिपाही उन दास्य-दूषित टोपियों को कुचलने लगे और बलहीन हुए अंग्रेज अधिकारी अपनी सत्ता का खुला अपमान करता यह भारतीय नृत्य देखते रहे।⁴⁴ उत्तर प्रदेश के उच्च पुरबिया ब्राह्मण कुल में जनमे मंगल पांडे का रक्त केवल बंगाल में ही स्वतंत्रता के बीज नहीं जमा रहा था, उधर अंबाला में भी उसकी विद्युत चेतना का संचार हो गया था। अंबाला में सिपाहियों ने एक नई पद्धति चालू की थी। वह था-यदि कोई अधिकारी उनके विरूद्ध जाए तो उसका घर-बार जलाकर भस्म कर डालना। रोज रात को देशद्रोहियों और विदेशियों के घर जलने लगे। यह काम इस झटके से और गुप्त ढंग से होता मानो प्रत्यक्ष अग्नि नारायण ही क्रांति पक्ष की गुप्त समिति का सदस्य बन गया है। बहुत आग गली और जो आग लगानेवाले को पकड़वा देगा, उसको हजारों रुपयों के इनाम भी घोषित किए गए। पर एक आदमी भी सूचना न देता। अंत में परेशान होकर स्वयं कमांडर-इन-चीफ ॲन्सन गवर्नर जनरल को लिखता है- “It is really strange that the incendiaries should never be detected. Everyone is on the alert here, but still there is no clue to trace the offenders.” फिर अप्रैल के अंत में वह लिखता है – “We have not been able to detect any of the incendiaries at Ambala. This appears to me extraordinary; but it shows how close the combinations among the conceive to be their wrongs and how great the dread of retaliation to any one who would dare to become an informer.” हिंदुस्थान के देशद्रोहियों पर तो अंग्रेजी साम्राज्य आधारित था! परंतु अंबाला में एक भी देशद्रोही न मिला। इससे स्वयं कमांडर-इन-चीफ गऊ बन गया और सिपाहियों के गुप्त षड्यंत्र की स्तुति करते हुए उनपर गुस्सा करता रहा तो इसमें आश्चर्य की बात क्या थी! अब यह आग हिंदुस्थान में जगह-जगह आरंभ हो गई थी। अंतिम विशाल आग भड़काने के पहले इधर-उधर छोटी-बड़ी गड़बड़ शुरू हो गई थी। अंबाला की भांति वहां भी अधिकारियों और देशद्रोहियों के घर सुलगने लगे थे। दिनांक 31 मई को सारा हिंदुस्थान एक साथ सुलगा दिया जाए, जिससे इधर-उधर जान छिपाने का अवसर न पाकर परतंत्रता अंदर-ही-अंदर राख हो जाएगी, यह निर्धारित योजना-लखनऊ की गुप्त समिति को यद्यपि मान्य थी, फिर भी वहां के तेजस्वी सिपाही बहादुरों को अपना गुस्सा दबाए रखना कठिन हो गया। उसमें भी हर रात की गुप्त सभाओं में चल रहे उद्दीपक भाषणों और जलनेवाले घरों के भयंकर दृश्यों से सिपाहियों को रुकना और अपने को रोकना कठिन 1857 का स्वातंत्र्य समर – 101 ⁴⁴ रेड पैफलेट, खंड 1, पृष्ठ 34।