१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)
1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंरहे स्वतंत्रता युद्ध में सम्मिलित होने का गुप्त उपदेश देते-देते पंडित लोग प्रत्येक तीर्थ में घूमने लगे।³⁴ विराट् जनसमूह के मन में एक ही इच्छा उत्कटता से उत्पन्न करने और उसकी अक्षय मुद्रा उनके हृदय पर अंकित करने के लिए कविता जैसा उत्तम साधन नहीं है। मार्मिक शब्द और आकर्षक पद्धति से पद्य में गुंथा हुआ सत्य जनता के हृदय में बहुत तेजी से अंकुरित होता है। इसीलिए राष्ट्रगीत की महत्ता बहुत मानी जाती है। राष्ट्रगीत राष्ट्र के हृदय की भावना एक वाक्य में प्रकट कर सकते हैं। जब-जब किसी प्रबल भावना से राष्ट्रीय आत्मा छटपटाने लगती है तब-तब उससे निकले सहज बोल ही तो राष्ट्रगीत हो जाते हैं। फ्रांस कि राष्ट्रीय आत्मा के बोल हैं-ला मार्सेलीज। सन् 1857 में स्वधर्म-रक्षण की उदात्त भावना से भारतभूमि की आत्मा फड़फड़ाते समय उसके मुख-मार्ग से ऐसा कोई राष्ट्रगीत निकला न होता तो आश्चर्य ही होता। दिल्ली के बादशाह के एक निजी गवैया ने सारे हिंदुस्थान के कंठ से निनादित होनेवाले एक राष्ट्रगीत की रचना स्वयं की थी। अपने पूर्वजों के पराक्रम का वर्णन करने के पश्चात् उस राष्ट्रगीत में वर्तमान की अवनति को करुण रस में चित्रित किया गया था। जो लोग एक दिन हिंदुस्थान के इस छोर से उस छोर तक विजयशाली वैभव से अभिषिक्त हुए थे उन्हीं लोगों को आज विश्व में गुलाम कहलाने की बारी आए, उनका धर्म अनाथ हो जाए और उनके अभिषिक्त सिर विदेशियों के पैरों तले कुचले जाएं-इस विपरीत और लज्जास्पद स्थिति के लिए उस राष्ट्रगीत में भारत माता आक्रोश कर रही थी। परंतु अब उसका यह आक्रोश हमें सुनाई देगा क्या? क्या अब वह सन् 1857 का गीत हम फिर सुन सकेंगे? उस राष्ट्रगीत का प्रारूप यदि कोई खोजकर निकाले तो अपने इतिहास पर उसके अक्षय उपकार होंगे। तब तक इतिहास इतना ही कहता है कि अपनी धरती माता सन् 1857 में आक्रोश कर रही थी और कानपुर के मैदान में कूदते समय नाना के कान में वही आक्रोश भयंकर रूप से गूंज रहा था। विस्तीर्ण रचना के साधन भी विस्तीर्ण ही होते हैं। जर्जर हुई मातृभूमि को मदोन्मत्त अत्याचारों के हाथ से छुड़ाने जैसा कार्य करने के लिए पहली मूलभूत एवं 1857 का स्वातंत्र्य समर - 84 ³⁴ 1. ट्रेवेलियन कृत-'कानपुर' । 2. “दिल्ली के राजमहल से बहुत पहले ही एक राजाज्ञा प्रसारित की गई थी, जिसमें मुसलमानों को यह निर्देश दिया गया था कि वे अपने सभी महत्त्वपूर्ण समारोहों पर एक गीत का गायन करें, जिसकी राज-दरबार के संगीतज्ञ ने रचना की है, जिसमें बड़े ही मार्मिक शब्दों में उनकी जाति के पराभव और उनके उस प्राचीन धर्म की अवमानना का वर्णन उपलब्ध है जो कभी उत्तर की हिममालाओं से दक्षिणी राज्यों तक व्याप्त था; किंतु जो अब शैतानों और विदेशियों द्वारा पददलित किया जा रहा है।” –ट्रेवेलियन कृत-'कानपुर' । मेरे मत से-वृत्ति का अभिप्राय समझ पाने में पूरी तरह असमर्थ ग्रंथकार को इतना लिखना ही पड़ा। यह उस राष्ट्रगीत की सुंदरता का परिचायक है।