१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)
1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंस्वतंत्रता की रक्षा करने और स्वधर्म के लिए युद्ध करने की शिक्षा देते थे। जिनके पवित्र नाम से अपने हिंदुस्थान देश का इतिहास भूषित हुआ और जिनके पावन चरित्र का कथन आगे यथासंभव किया जानेवाला है, उन देशभक्त मौलवी अहमद शाह को लखनऊ में हिंदू और मुसलमानों को फिरंगियों के विरूद्ध एक साथ विद्रोह करने का खुला उपदेश देने के कारण फांसी का दंड दिया गया था। उपर्युक्त मौलवी की तरह ही सैकड़ों प्रचारक फकीरों और संन्यासियों का बाना धारण कर स्थान-स्थान पर गुप्त प्रचार करने लगे। भीख मांगने के बहाने हर घर में जाना सुलभ होने से और इस तरह शत्रु के मन में किसी तरह की आशंका उत्पन्न न होने के कारण ये देशभक्त फकीर और संन्यासी दर-दर घूमकर दासता के प्रति घृणा और भावी स्वतंत्रता की अभिलाषा लोक समूह में प्रदीप्त किया करते थे। विशेषतः सेना में इन लोगों का उपयोग बहुत था। क्योंकि हर टुकड़ी में एक पंडित और एक मुल्ला धार्मिक कार्यों के लिए रखना अनिवार्य होने से उस स्थान पर यही लोग जाकर बैठते थे। सिपाहियों के मन पर उनके धर्मगुरू का दबाव और प्रभाव होने से इन्हीं लोगों के द्वारा स्वतंत्रता के पवित्र धर्म की दीक्षा देना आवश्यक था। स्वतंत्रता के बना धर्मरक्षण असंभव है, यह मर्म जानकर हजारों धर्मगुरू इस राजनीतिक जिहाद का आह्वान करने आगे आए। सन् 1857 के अप्रैल माह में ऐसा ही एक देशभक्त फकीर वहां की सैनिक छावनी में आया। उसके पास हाथी-घोड़े आदि तथा अन्य संरजाम भी था। वहां के सिपाहियों को राजनीतिक जिहाद की दीक्षा देने में वह मग्न था-परंतु अंग्रेज अधिकारियों को उसपर शंका हुई और उन्होंने उसे वहां से निकल जाने का आदेश दिया। यह आदेश होते ही फकीर वहां से तो निकल गया, परंतु पास के ही एक गांव में घुसकर फिर अपनी गुप्त रचना का कार्य करने लगा।³³ ऐसे कितने की स्वतंत्रता के भक्त लोग अपनी जान हथेली पर लिये उस अपार रचना का गुप्त कार्य बड़े कौशल से कर रहे होंगे। परंतु वे ˙˙ थे कौन? कहां के? यह भी स्मृति आज जनता में नहीं रही-हाय-हाय! जिस प्रकार मस्जिद, मंदिर और भिक्षा के बहाने घर-घर में स्वतंत्रता की चेतना उत्पन्न करने मौलवी और पंडित, फकीर और संन्यासी भेजे गए वैसे ही विभिन्न स्थानों से अधिक महत्त्व के स्थान पर उपदेशकों और शिक्षकों को भेजा गया था। हिंदुस्थान में विभिन्न प्रदेशों के लोगों के एकत्रित होने के मुख्य स्थान बड़े-बड़े तीर्थ क्षेत्र हैं। ये क्षेत्र एक प्रकार से सारे प्रदेशों के लोगों के राष्ट्रीय सम्मेलन-स्थल ही हैं। मस्जिदों में स्थानीय लोग ही आएंगे, परंतु तीर्थों में भी राजकीय महंत नियुक्त किए गए और जल्दी ही गंगा के पुण्य स्नान के लिए आनेवाले हजारों बंधुओं को हिंदुस्थान के मन में मचल 1857 का स्वातंत्र्य समर – 83 ³³ मि. विलियम कृत-‘द मेरठ नैरटिव' ।