अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)
Abhijnanashakuntalam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाकवि कालिदास / डॉ. श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३२ | अभिज्ञानशाकुन्तलम्
**अनसूया—**हला सउन्दले तुवत्तो वि तादकस्सवस्स अस्समरुक्खआ पिअदरेत्ति तक्केमि। जं इमिणा णोमालिआकुसुमपेलवा तुमं वि एदाणं आलवालपूरणे णिउत्ता। [ हला शकुन्तले त्वत्तोऽपि तातकाश्यपस्याश्रमवृक्षकाः प्रियतरा इति तर्कयामि यदनेन नवमालिकाकुसुमपेलवा त्वमप्येतेषामालवालपूरणे नियुक्ता। ]
**शकुन्तला—**ण केवलं तादणिओओ एव्व। अत्थि मे सोदरसिणेहो एदेसु। [ न केवलं तातनियोग एव अस्ति मे सोदरस्नेह एतेषु। ] (वृक्षसेचनं रूपयति)
राजा—( आत्मगतम् ) कथमिदं सा कण्वदुहिता। ^१असाधुदर्शी खलु तत्रभवान् ^२काश्यपः य इमामाश्रमधर्मे नियुङ्क्ते।
**अनसूया—**कथयति यत् हला शकुन्तले ! अयि सखि शकुन्तले ! त्वत्तोऽपि = त्वदपि, तातस्य = पितुः कण्वस्य **आश्रमवृक्षकाः—**अल्पा वृक्षा वृक्षकाः आश्रमस्य वृक्षका आश्रमवृक्षकाः = तपोवनपोतकाः प्रियतरा = अतिशयेन प्रियाः प्रियतराः = प्रेयांसः इति = एवं तर्कयामि = मन्ये यत् अनेन = अमुना पित्रा कण्वेन, नवमालिकाकुसुमपेलवा = नवमालिकायाः कुसुमं नवमालिकाकुसुमं तद्वत् पेलवा इति नवमालिकाकुसुमपेलवा = नवमालिकाख्यसुमनसुकुमारा त्वं = भवती अपि एषां = अमीषां वृक्षाणां आलवालस्य = वृक्षमूलस्य जलाधारस्य पूरणे = पूर्तौ नियुक्ता = आदिष्टा असीति शेषः।
**शकुन्तला—**कथयति यत् न केवलं = पर तातस्य = पितुः नियोगः तातनियोगः—एव = कण्वादेश एव अस्ति = वर्तते मे = मम हृदये सोदरस्य = सहोदरस्य स्नेहः = प्रेम एतेषु = अमीषु वृक्षेषु ( वृक्षसेचनं निरूपयति = तरोरक्षणं नाटयति )।
**राजा—**राजा = नृपो दुष्यन्तः कथयति यत् कथं = किम् इयं = एषा पुरोवर्तमाना
**अनसूया—**सखि शकुन्तले ! मैं तो समझती हूँ कि तात कण्व को आश्रम के ये छोटे-छोटे पौधे तेरे से भी अधिक प्रिय हैं। इसीलिए तो नेवारी के फूलों के समान कोमल अङ्गवाली तुमको इनके थालों के जल देने के लिए उन्होंने लगा रखा है।
**विशेष—**भरतमुनि ने अपने नाट्यशास्त्र में बताया है कि समान कोटिकी स्त्रियाँ परस्पर हला का सम्बोधन करती हैं—
'समानाभिस्तथा सख्यो हला भाष्याः परस्परम्' = १७।८९
अमरसिंह ने अमरकोश में भी कहा है—'हण्डे हञ्जे हलाह्वाने नीचां चेटीं सखीं प्रति।' तदनुसार अनसूया ने अपनी प्रिय सखी शकुन्तला को हला सम्बोधन करके कहा है।
**शकुन्तला—**अरी प्रिय सखि ! पिताजी की ही आज्ञा है ऐसी बात नहीं, अपितु इन वृक्षों में मेरा सहोदर भाई का स्नेह है। ( वृक्षों को सींचने का अभिनय करती है। )
**विशेष—**यहाँ अनसूया की धारणा है कि इन वृक्षों को सींचना सुकुमारी शकुन्तला के योग्य नहीं फिर भी पिता महर्षि कण्व के आदेश से इसे सींचना पड़ रहा है। इस अनसूया की धारणा को गलत बताकर शकुन्तला कहती है—केवल पिताजी का आदेश नहीं, किन्तु इन वृक्षों में मेरा सहोदर भाई-सा स्नेह है। इसलिए मैं इन्हें सींचती हूँ।
राजा—( मन ही मन ) क्या यही वह कण्व की कन्या शकुन्तला है। ( आश्चर्य के साथ ) अहो, महर्षि कण्व तो बड़ा ही अनुचित कार्य कर रहे हैं जो इस कोमलाङ्गी बाला को इस आश्रमोचित धर्म एवं वृक्षों को जल देना आदि कठिन कार्यों में लगा रहे हैं। क्योंकि—
पाठा०—१. अहो, असाधुदर्शी। २. भगवान् कण्वः।