अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)
Abhijnanashakuntalam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाकवि कालिदास / डॉ. श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी द्वारा
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कोई प्रबल प्रमाण नहीं मिलता तब तक “नह्ममूला जनश्रुतिः” के आधार पर यह मानना सर्वथा न्यायसंगत है कि महाकवि कालिदास विक्रमादित्य की सभा के नवरत्नों ने एक महारत्न थे । पाश्चात्त्य विद्वानों में से केवल सर विलियम जोन्स महोदय ने भारतीय प्राचीन मत को ही प्रमाणित माना है । और अंग्रेजी में शकुन्तला का अनुवाद किया है ।
कालिदास के समय के सम्बन्ध में विभिन्न मत
हमारा संस्कृत साहित्य विश्वसाहित्य में सर्वसम्पन्न और अगाध है । वेद वेदाङ्ग, ब्राह्मण वाङ्मय, उपनिषद्, धर्मशास्त्र, काव्य, नाटक विविध विषयों के अनेकों ग्रन्थ प्रकाशित हो चुके हैं और अनेकों हस्तलिखित रूप वर्तमान हैं । इसके अतिरिक्त अनेकों ग्रन्थ अकाल में ही काल कवलित हो चुके हैं । आदि काल से ही अनेक विद्वान् लेखकों ने अपना बुद्धि वैभव व्यय करके इस विशाल ग्रन्थ भण्डार को भरा है, परन्तु ऐतिहासिक ग्रन्थों की कमी के कारण उन लेखकों का पूर्णपरिचय नहीं प्राप्त होता है । बाण, विल्हण, राजशेखर आदि कवियों ने अपने ग्रन्थों में अपने वंश, पाण्डित्य और आश्रयदाताओं के थोड़ा बहुत उल्लेख अवश्य किया है । पर उससे आधुनिक युग के पुरातत्त्व प्रेमी पाठकों को सन्तोष नहीं होता । फिर भी जिन्होंने अपने विषय में एक अक्षर तक नहीं लिखा है उनकी अपेक्षा इनका दिया हुआ अल्प परिचय भी ऐतिहासिक आधार के लिए सहायक ही है ।
देखिए विश्व के प्रायः समस्त प्राचीन और अर्वाचीन देशी एवं विदेशी विद्वानों ने सरस्वती के वरदपुत्र कविवर कालिदास की मुक्तकण्ठ से प्रशंसा की है और इनको कविकुल-गुरु की उपाधि से सम्मानित कर संस्कृत के कवियों में सर्वोच्च स्थान दिया है, किन्तु इनके वंश, जन्म, चरित, स्वभाव, योग्यता आदि के बारे में जानने लायक विश्वसनीय सामग्री, कहाँ उपलब्ध होती है । उनके शरीर त्याग के अनन्तर ही उनके चरित्र की ऐतिहासिक सामग्री लुप्त हो गई उनकी ऐतिहासिकता का स्थान बेसिरपैर की दन्तकथाओं ने ले लिया । संस्कृत में बल्लाल कविका भोज प्रबन्ध ऐसे ही मनगढ़न्त कथाओं का गट्ठर है । काव्यकला की दृष्टि से इसकी शब्द योजना में भले ही माधुर्य हो, अर्थ वैशद्य में सौन्दर्य हो, परन्तु इतिहास की कसौटी पर वह खरा नहीं उतरता । भोजप्रबन्ध सोलहवीं शताब्दी की रचना है यह कालिदास के बहुत वर्षों बाद लिखा गया था । अतः इसका ऐतिहासिक महत्त्व बहुत कम है । इसमें सबसे आश्चर्यजनक तो यह है कि भिन्नकालीन कवियों को एक समय में तथा एक ही कतार में लाकर वल्लाल कवि ने खड़ा कर दिया है । भोज के दरबार में कालिदास, भवभूति, भारवि, दण्डी, बाण इन सबको समस्यापूर्ति करते पायेंगे । इन कवियों को आश्रयदाता धाराधीश भोज भी उक्त कवियों के कई सौ वर्ष बाद ग्यारहवीं शताब्दी में हुए हैं । जो उनके ताम्रपत्रों से सिद्ध हो चुका है । अतः पाठक स्वयं निर्णय कर लें कि कवियों के काल निर्णय करने में भोजप्रबन्ध कितना विश्वसनीय है । इस प्रकार परम्परागत विश्वसनीय सामग्री के अभाव में कालिदास के जन्मस्थान, स्थितिकाल तथा चरित्र के सम्बन्ध में अनेकानेक कल्पनाएँ की जाती हैं । विभिन्न विद्वानों ने कालिदास के काल की दो सीमाएँ मानी हैं । इन्होंने अपने मालविकाग्निमित्र नाटक का कथानक शुंग-वंशीय राजा अग्निमित्र के चरित्र से लिया है । यह अग्निमित्र मौर्यवंश का उच्छेद कर मगध साम्राज्य को स्वायत्त करने वाले सेनापति पुष्यमित्र का सुयोग्य पुत्र था । जिसका समय ईसा से लगभग १५० वर्ष पूर्व ऐतिहासिक विद्वानों ने निर्धारित किया है । अतः कालिदास का समय इसके पूर्व नहीं हो सकता है । छठी शताब्दी में वर्तमान कन्नौज के