अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)
Abhijnanashakuntalam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाकवि कालिदास / डॉ. श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी द्वारा
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मेघदूत में कालिदास ने उज्जयिनी प्रदेश की भौगोलिक स्थिति का जैसा सूक्ष्म वर्णन करते हुए छोटी से छोटी नदियों का भी नाम निर्देश किया है और उनका जमकर वर्णन किया है वैसा अन्यत्र नहीं।
इस प्रकार उज्जयिनी के प्रति विशेष पक्षपात पूर्ण वर्णन तथा भौगोलिक परिचय के आधार पर यही कहा जा सकता है कि कालिदास उज्जयिनी के ही निवासी थे । पर्वतों में हिमालय, नगरियों में उज्जयिनी, देवताओं में शिव, अलंकारों में उपमा और छन्दों में मन्दाक्रान्ता कालिदास को परमप्रिय थे। इनका भौगोलिक ज्ञान बहुत ही समुन्नत है जिसका पता मेघदूत, रघुवंश में रघु का दिग्विजय और इन्दुमती के स्वयम्बर में देश देश के राजाओं के वर्णन से स्पष्ट मालूम पड़ता है। कुमारसम्भव, मेघदूत और शकुन्तला के वर्णन से स्पष्ट है कि इन्हें हिमालय तथा उत्तर भारत जितना प्रिय था उतना विन्ध्य तथा दक्षिण भारत नहीं।
कालिदास का समय
कालिदास के समय के सम्बन्ध में प्राच्य और पाश्चात्त्य विद्वानों में बहुत बड़ा मतभेद है। विभिन्न विद्वानों ने आन्तरिक प्रमाणों के आधार पर कालिदास की सत्ता ई० पू० प्रथम से लेकर छठी शताब्दी तक मानी है। इस सम्बन्ध में प्रधान रूप से दो मत हैं। एक प्राचीन और दूसरा अर्वाचीन। प्राचीन मत के पोषक संस्कृत के भारतीय विद्वान् हैं और अर्वाचीन मत के अनुयायी अंग्रेजी के पाश्चात्त्य विद्वान् तथा उनका अनुकरण करनेवाले कुछ भारतीय विद्वान् हैं।
धन्वन्तरि-क्षपणकामरसिंह-शङ्कु-
बेतालभट्ट-घट-खर्पर-कालिदासाः ।
ख्यातो वराहमिहिरो नृपतेः सभायां
रत्नानि वै वररुचिर्नवविक्रमस्य ॥
इस 'ज्योतिर्विदाभरण' जनश्रुति के आधार पर भारतीय संस्कृत के विद्वान् मानते हैं कि कविवर कालिदास विद्वत्प्रिय विक्रमसंवत् के प्रवर्तक उज्जयिनी के राजा महाराजाधिराज वीर विक्रमादित्य की सभा के नवरत्नों में से एक प्रमुख रत्न थे जिनके बिना महाराज को एक क्षण भी अच्छा नहीं लगता था। इनकी अद्भुत कवि कल्पना पर महाराज सदा मुग्ध रहते थे। कालिदास के ग्रन्थों से भी विक्रमादित्य के दरबार में रहने का संकेत मिलता है। शकुन्तला की प्रस्तावना में विक्रम की अभिरूपभूयिष्ठा परिषद् में विश्व-विख्यात शकुन्तला नाटक का अभिनय करने का संकेत है। विक्रमोर्वशीय नाटक में यद्यपि राजा पुरूरवा नायक है तथापि विक्रम का स्पष्ट नामोल्लेख है। "अनुत्सेकः खलु विक्रमालङ्कारः" इत्यादि वचनों से भी इसकी पुष्टि होती है कि कालिदास का विक्रम से सम्बन्ध अवश्य था। रामचन्द्र महाकाव्य में तो स्पष्ट उल्लेख है कि शकाराति वीर विक्रमादित्य ने कालिदास की बहुत बड़ी ख्याति की थी। देखिए—ख्यातिं कामपि कालिदासकवयो नीताः शकारातिना और सुभाषित में तो कहा गया है कि—
वाल्मीकिप्रभवेण रामनृपतिर्व्यासेन धर्मात्मजः ।
व्याख्यातः किल कालिदास श्रीविक्रमार्को नृपः ॥
इसलिए जब तक परम्परागत इन जनश्रुतियों के खण्डन करने के लिए इसके विरुद्ध