अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)
Abhijnanashakuntalam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाकवि कालिदास / डॉ. श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी द्वारा
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है वैसे ही आदि कालिदास के समान कविता करने वाले कवि को भी कालिदास कहने लग गये थे । इसीलिए संस्कृत में अनेक कालिदासों की उपलब्धि विभिन्न समयों में होती है । जो कुछ हो विद्वान् लोग इस कल्पना को स्वयं समझ लें ।
कालिदास की प्रसिद्धि का कारण
अन्य ग्रन्थों के रहते हुए भी प्राच्य और पाश्चात्त्य देशों में कालिदास की इतनी महती प्रतिष्ठा का कारण उनका अभिज्ञानशाकुन्तल है । जब कलकत्ता हाईकोर्ट के चीफजस्टिस सर विलियम जोन्स ने शकुन्तला का अंग्रेजी में अनुवाद किया । तब उसे पढ़कर पाश्चात्त्य विद्वानों की आँखें खुलीं और कालिदास की कवि-कल्पना पर मुग्ध होकर उन्होंने बड़े हर्ष के साथ कालिदास को “भारतीय शेक्सपीयर” की उपाधि से विभूषित किया । और संस्कृत की तरफ उनकी रुचि बढ़ी यहाँ तक कि वेदों तक भी छान-बीन शुरू हो गयी ।
देखिए—पाश्चात्त्य विद्वानों की कैसी श्लाघनीय गुणग्राहिता है ? इसी से वे इतनी शीघ्रता से अपनी इतनी उन्नति कर गये हैं । एक तरफ पाश्चात्त्य विद्वान् हैं जिन्होंने अपने देश के कवियों की तो बात ही क्या है कहीं के भी विद्वानों के गुण प्रकाश करने के लिए सदा उद्यत रहते हैं । दूसरे तरफ भारतीय विद्वान् हैं जिन्हें इस दिशा में थोड़ी भी अभिरुचि नहीं है । खेद का विषय है कि पाश्चात्त्य अनुकरण करने में प्रवीण भारतीय विद्वानों में भी विशेष अभिरुचि नहीं । कालिदास ही क्या महाराजाधिराज विक्रमादित्य भोज, भास, भारवि, माघ, श्रीहर्ष, बाणभट्ट और प्रातःस्मरणीय स्वामी शङ्कराचार्य आदि विद्वानों का वास्तविक स्वरूप ही भारतीय विद्वानों ने अभी तक नहीं समझा है । पाश्चात्त्य विद्वान् इनका जो कुछ मूल्यांकन कर देते हैं उन्हीं के बल पर ये भी कुछ कहने लग जाते हैं । जहाँ विदेशों में एक शेक्सपीयर की कृतियों की आलोचना की असंख्य पुस्तकें लिखी जा चुकी हैं और बराबर लिखी भी जा रही हैं वहां भारतीय विद्वान मौनावलम्बन में मस्त हैं । यह बड़े खेद का विषय है ।
कालिदास की जन्मभूमि
इसी प्रकार कालिदास की जन्मभूमि तथा समय के सम्बन्ध में भी विद्वानों का बहुत बड़ा मतभेद है । वंगदेशीय विद्वान् इन्हें बंगाली मानते हैं और नवद्वीप को इनकी जन्मभूमि बतलाते हैं । बहुत विद्वान् कहते हैं कि इनकी जन्मभूमि कश्मीर है, क्योंकि इन्होंने हिमालय का जैसा सुन्दर वर्णन किया है वैसा दूसरे का नहीं । कुछ लोग इन्हें पंजाबी, कुछ लोग मालवीय मानते हैं । किन्तु विशिष्ट विद्वान् इन्हें उज्जयिनीनिवासी कहते हैं, क्योंकि इन्होंने अपने काव्यों में उज्जयिनी के लिये विशेष पक्षपात दिखलाया है जिससे इनकी जन्मभूमि उज्जयिनी मालूम पड़ती है ।
इनके मेघदूत में कान्ताविरही यक्ष रामगिरि से सीधे उत्तर अलकापुरी जाने वाले मेघ के लिए रास्ता टेढ़ा होने पर भी सकलसम्पत्सम्पन्न उज्जयिनी को देखने के लिए मेघ से आग्रह करते हुए कहा है कि यदि तुम उज्जयिनी के विशाल महलों और मृगाक्षी रमणियों के कुटिल कटाक्षों को देखने से वञ्चित रह गये, तो तुम्हारा जीवन ही निष्फल है ।
वक्रः पन्था यदपि भवतः प्रस्थितस्योत्तराशां
सौधोत्सङ्गप्रणयविमुखो मास्मभूरुज्जयिन्याः ।
विद्युद्दामस्फुरितचकितैस्तत्र पौराङ्गनानां
लोलापाङ्गैः यदि न रमसे लोचनैर्वञ्चितोऽसि ॥ ( पूर्वमेघ २९ )