अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)
Abhijnanashakuntalam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाकवि कालिदास / डॉ. श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी द्वारा
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वाग् शब्द से आरम्भ करके—वागर्थाविव संपृक्तौ
( रघुवंश महाकाव्य )
बाद विद्योत्तमा को इस प्रकार पति को एक प्रतिभासम्पन्न महाकवि के रूप में पाकर जैसा आनन्द का अनुभव हुआ होगा वह लिखने के बाहर है। सुन्दरी नारी मनुष्य के जीवन प्रवाह में मोड़ देकर सुधार सकती है। इसमें कोई सन्देह नहीं। तुलसीदास नारी की भर्त्सना से ही भक्तशिरोमणि बन गये।
इसी प्रकार कालिदास और विक्रमादित्य तथा कालिदास और भोज के सम्बन्ध में भी कई किम्वदन्तियाँ विद्वत्समाज में प्रसिद्ध हैं जिन्हें यहाँ लिखकर भूमिका का कलेवर बढ़ाना उचित नहीं।
कालिदास कब हुए, कहाँ हुए किस वंश में हुए और उन्होंने कितने ग्रन्थ बनाये इत्यादि प्रश्नों का अभी तक ठीक-ठीक निर्णय नहीं हो पाया है। क्योंकि उन्होंने अपने सम्बन्ध में अपने ग्रन्थों के अन्दर कहीं कुछ भी नहीं लिखा है। फिर भी विद्वानों ने उनके ग्रन्थों के आधार पर अब तक जो कल्पनाएँ की हैं उसी के आधार पर बराबर ही विचार होता आ रहा है।
कालिदास के ग्रन्थ
किस कालिदास ने कौन से ग्रन्थ बनाये हैं? इसका निर्णय करना एक प्रकार से असम्भव-सा है, फिर भी अधिक आलोचकों तथा विद्वानों के मत में उज्जयिनी नरेश महाराजा विक्रमादित्य की अभिरूपभूयिष्ठा सभा को अलंकृत करने वाले कालिदास के ८ ग्रन्थ माने जाते हैं। दो महाकाव्य-एक कुमारसम्भव, दूसरा रघुवंश, एक खण्डकाव्य-मेघदूत, दो स्फुट काव्य-ऋतुसंहार और श्रृंगारतिलक और तीन नाटक—१—अभिज्ञानशाकुन्तल, २—मालविकाग्निमित्र, ३—विक्रमोर्वशीय। कुछ लोग नलोदय और श्रुतबोध को भी इन्हीं की कृति मानते हैं।
राजसभा में रहते समय कालिदास ने अपनी प्रतिभा तथा समस्यापूर्ति से बड़े बड़े विद्वानों एवं अपने आश्रयदाता विक्रमादित्य को भी अनेकों बार चकित कर दिया था।
कालिदास के ग्रन्थों के अध्ययन से मालूम पड़ता है कि ये बड़े विनोदी थे। इनके सभी ग्रन्थों में शृङ्गार रस की प्रधानता है। इसलिए राजशेखर ने कहा है—शृंगार रस के वर्णन में और मधुर शैली में एक कालिदास की बराबरी करने वाला आज तक कोई नहीं हुआ, फिर तीन कालिदास को भिन्न भिन्न विषयों में परास्त करने वाला कहाँ मिलेगा।
एको न जीयते हन्त कालिदासो न केनचित् ।
शृंगारे ललितोद्गारे कालिदासत्रयी नु किम् ॥
विद्वानों की परम्परा में अनेक कालिदास होने की बात प्रसिद्ध है। दशम शताब्दी में वर्तमान राजशेखर कवि ने अपनी काव्यमीमांसा के उक्त छन्द में तीन कालिदासों का स्पष्ट उल्लेख किया है।
इसके अतिरिक्त एकादश शताब्दी में राजा भोज के दरबार में भी एक कालिदास थे, इसका पता वल्लाल कविप्रणीत भोजप्रबन्ध से लगता है।
अनेक कालिदासों को देखकर कुछ आलोचकों ने यह भी माना है कि जैसे आद्य स्वामी शंकराचार्य की परम्परा पर चलने वाले आगे के संन्यासियों को शंकराचार्य कह दिया जाता