अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)
Abhijnanashakuntalam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाकवि कालिदास / डॉ. श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ४ )
तो तुम्हारा विवाह जरूर कर दिया जायेगा। इस प्रकार पण्डितों की बात पर विश्वास कर वह मूर्ख पण्डित बनकर राजसभा में पहुँच गया। पहले से ही उपस्थित विद्वानों ने उसका खूब सत्कार किया और उसे सबसे ऊँचा आसन पर बैठा दिया। बाद में विद्योत्तमा से कहा कि ये बृहस्पति के समान काशी के दिग्गज विद्वान् हैं। आपके साथ शास्त्रार्थ करने के लिए आये हुए हैं। किन्तु इस समय ये तपस्या करने के कारण मौन व्रत लिये हुए हैं। शास्त्रार्थ में आपको जो कुछ कहना हो संकेत से कहिये। यह सुनकर राजकुमारी ने अपने मन से यह सोचकर कि ईश्वर एक है एक अंगुली उठाई। इधर मूर्ख ने समझा कि यह अंगुली दिखाकर मेरी एक आँख फोड़ने का संकेत कर रही है। इसलिए उसकी दोनों आँखों को फोड़ने के अभिप्राय से अपनी दो अंगुलियों को उठाया। इस पर विद्योत्तमा के विरोधी उपस्थित विद्वानों ने इसका यह अर्थ लगाया कि ये यह सङ्केत कर रहे हैं कि आत्मा एक नहीं है, किन्तु दो हैं, एक जीवात्मा तथा दूसरा परमात्मा। विद्वानों के इस कुचक्र के परिणाम स्वरूप उस राजकुमारी को उससे हार मानकर पूर्व में की हुई प्रतिज्ञा के अनुसार अपना विवाह उस महामूर्ख ब्राह्मणकुमार के साथ कर लेना पड़ा।
रात के समय एकान्त में जब दोनों का मिलन हुआ तब तक किसी तरफ से एक ऊँट चिल्ला उठा। राजकुमारी ने पूछा कि कौन शोर मचा रहा है? इस पर उस मूर्ख ने उत्तर दिया कि 'उष्ट्र चिल्लाता है'। राजकुमारी ने चौंककर फिर पूछा कि कैसा शोर है ? तब वह उष्ट्र के बदले 'उट्र बोलता है' ऐसा कहने लगा। क्योंकि वह जन्म से महामूर्ख था उष्ट्र का शुद्ध उच्चारण कैसे कर सकता था। बाद विद्योत्तमा को पण्डितों की धूर्तता का पता चल गया, इस पर वह पश्चात्ताप करती हुई फूट-फूट कर रोने लगीं। बाद अत्यन्त दुखो होकर उस मूर्ख को घर से बाहर निकाल दिया और कहा कि यदि तुम विद्वान् होकर आओगे तो मेरे साथ तुम्हारा सम्बन्ध हो सकता है, अन्यथा नहीं। इस प्रकार भर्त्सना देकर विद्योपार्जन के लिए अनुप्रेरित किया। इधर वह मूर्ख भी इस व्यवहार से बड़ा ही लज्जित हुआ, पहले तो सोचा कि अपना प्राण दे दूँ फिर सोच-समझकर विद्योपार्जन में परिश्रम करने लगा। भगवती काली की उसने बड़ी उपासना की, फलस्वरूप देवी की कृपा से थोड़े दिनों से वह एक ऐसा प्रभावशाली विलक्षण विद्वान् हो गया कि जिसका नाम संस्कृत साहित्य तथा विश्व के इतिहास में अजर-अमर हो गया। सच है सच्ची लगन से क्या नहीं हो सकता है। ये ही हैं हमारे चरितनायक कविवर कालिदास जो उपासना द्वारा भगवती काली की कृपा से भव प्रतिभासम्पन्न महाकवि कालिदास के नाम से नाम से प्रसिद्ध हो गये।
जब वे कवि होकर अपने घर राजकन्या के पास लौटे तब घर का दरवाजा बन्द था। उसे खोलवाने के अभिप्राय से इन्होंने संस्कृत में कहा कि “अनावृतकपाटं द्वारं देहि” तब विदुषी पत्नी ने प्रश्न किया कि “अस्ति कश्चिद् वाग्विशेषः ?” (आपकी वाणी में कुछ विशेषता आई ?) कालिदास की वाणी देवी के प्रसाद से निर्मल हो चुकी थी। इसलिए कवि ने अपनी पत्नी विद्योत्तमा के प्रश्नभूत वाक्य के अन्दर वर्तमान अस्ति—कश्चित् और वाग् इन तीन शब्दों से आरम्भ करके तीन काव्य बना डाले।
अस्ति शब्द से आरम्भ करके—अस्त्युत्तरस्यां दिशि देवतात्मा।
(कुमारसम्भव महाकाव्य)
कश्चित् शब्द से आरम्भ करके—कश्चित्कान्ताविरहगुरुणा।
(मेघदूत खण्डकाव्य)