अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)
Abhijnanashakuntalam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाकवि कालिदास / डॉ. श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी द्वारा
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पाठक प्रफुल्ल हो उठता है, इनमें विचारगाम्भीर्य है, संसार का अनुभव है, बहुमूल्य सिद्धान्त हैं, इनके पदों से उपदेश भी मिलता है और इनकी उक्तियाँ आज भी हमारा पथप्रदर्शन करती हैं। इनकी कविता में प्रसाद गुण की अगाधता, माधुर्य का मधुर सन्निवेश, कोमलकान्तपदावली का प्राचुर्य, उपमा को अपूर्वता, अलङ्कारों की रमणीयता, छन्दों की छटा और भावसौष्ठव पर्याप्तमात्रा में विद्यमान है। इनके काव्यों को जिस दृष्टि से देखा जाय उसी से काव्यकला की कमनीयता प्रगट होती है। इनकी कविता में सरस, सरल, सुबोध तथा सुन्दर शब्द एवं भावों का साम्राज्य, सहृदयों की तो बात हो क्या है, साधारण मनुष्यों के मन को भी मुग्ध कर देता है। व्यंग्यार्थप्रतिपादन की विलक्षण शैली, रसप्रकर्ष का प्रकाशन, विस्तृत विषय का थोड़े में वर्णन, वर्ण्य विषय को सुन्दर क्रम में रखकर रोचक बनाना, स्वाभाविक भाव के द्वारा लोकोत्तरानन्दप्रदान का ढंग आदि कालिदास की कविता के विशेष गुण हैं।
कालिदास संस्कृत साहित्य के अद्वितीय महाकवि हैं। इनकी कविता की मधुरिमा के सामने अन्य कवियों की कविता फीकी पड़ जाती है। आपने जैसा मानवहृदय के सूक्ष्म भावों का निरीक्षण किया है वैसा अन्य कवियों ने नहीं। कालिदास अन्तर तथा बाह्य दोनों जगत् के सूक्ष्म निरीक्षक महाकवि हैं।
कालिदास का जीवनवृत्त
कालिदास ने अपने जीवन के सम्बन्ध में अपने ग्रन्थों में कहीं भी कुछ नहीं लिखा है। किन्तु प्राचीन विचार परम्परा के अनुयायी विद्वत्समाज में यह किम्बदन्ती प्रसिद्ध है कि कालिदास उज्जयिनी के राजा महाराज विक्रमादित्य की सभा के नवरत्नों में एक महारत्न थे। ये ब्राह्मण बालक हैं। जब पांच-छ मास के थे तब मां बाप चल बसे और बालक अनाथ हो गया। संयोगवश उस पर एक ग्वाले की दृष्टि पड़ी वह उस मातृपितृविहीन बालक को अपने घर ले जाकर पाल पोसकर बढ़ाया। बचपन में इन्होंने कुछ भी नहीं पढ़ा-लिखा था। एक स्त्री के कारण इन्होंने अनमोल विद्यारत्न प्राप्त हुआ। इसकी कथा इस प्रकार प्रसिद्ध है—महाराज सदानन्द की पुत्री विद्योत्तमा बड़ी विदुषी और सुन्दरी थी। उसको अपनी विद्या का बहुत बड़ा गर्व था। उसने यह प्रतिज्ञा की थी कि शास्त्रार्थ में मुझे जो हरा देगा उसी से मैं अपना विवाह करूँगी। उस राजकुमारी के रूप, यौवन और विद्या की प्रशंसा सुनकर दूर दूर से विद्वान् आते थे पर शास्त्रार्थ में उससे पराजित होकर चले जाते थे। जब विद्वानों ने देखा कि यह राजकुमारी किसी प्रकार भी वश में नहीं आती है, सबको हरा देती है। तब उसकी विद्वत्ता से लज्जित होकर सभी ने राय की कि किसी ढंग से इसका विवाह ऐसे महामूर्ख से साथ करा दिया जाय जिससे यह जीवन भर अपने अहंकार पर पश्चात्ताप करती रहे। परिणामस्वरूप वे लोग एक मूर्ख की खोज से पड़ गये। एक दिन कहीं रास्ते में जाते हुए देखा कि भेड़ चरानेवाला एक आदमी पेड़ के ऊपर जिस डाल पर बैठा है उसी को जड़ से काट रहा है। विद्वानों ने उसे देखकर समझा कि बहुत बड़ा मूर्ख है, इसी से विद्योत्तमा का विवाह हो जाय तो अच्छा है। बाद बड़े प्रेम से उसे नीचे बुलाया और कहा कि चलो हम लोग तुम्हारा विवाह एक राजकुमारी के साथ करा देंगे। पर देखना राजसभा में मुँह से कुछ भी नहीं बोलना जो कुछ कहना वह इशारे से कहना। लो यह धोती चादर, जामा और पगड़ी पहन लो पण्डित बन कर हम लोगों के साथ चलो