भारतकोश
अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)

अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)

Abhijnanashakuntalam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाकवि कालिदास / डॉ. श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished540 पृष्ठ

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व्यास हैं एवं जिनकी विलक्षणा कविता प्रलयपर्यन्त सहृदयों के सरस हृदय को नवीन ज्योति प्रदान करती रहेगी तथापि इनमें जैसी अद्भुत कल्पना की छटा तथा काव्यकला दीख पड़ती है वैसी अन्य कवियों में नहीं। कालिदास के ग्रन्थों को देखकर निःसंकोच कहना पड़ता है कि ये सभी कवियों में शिरोमणि हैं। इनकी कविता की प्रशंसा करते हुए एक आलोचक ने ठीक ही कहा है—

महिषं दधि सशर्करं पयः कालिदासकविता नवं वयः । शारदेन्दुरबला च कोमला स्वर्गशेषमुपभुञ्जते जनाः ॥

सोढ्ढल कवि ने अवन्तिसुन्दरी कथा में कहा है कि धन्य है कालिदास जिनकी कीर्ति कविता के समान दोष रहित अमृत तुल्य और मधुर है। इनकी वाणी जैसे सूर्य वंश का वर्णन कर सकी है वैसे ही उनकी कीर्ति भी समुद्र के पार पहुँच चुकी है—

ख्यातः कृती सोऽपि च कालिदासः शुद्धा सुधा स्वादुमती च यस्य । वाणीमिषाखण्डमरीचिगोत्र सिन्धोः परं पारमवाप कीर्तिः ॥

महाकवि बाणभट्ट ने (जिनके विषय में कहा जाता है कि “बाणोच्छिष्टं जगत्सर्वम्”) अपने हर्षचरित में कालिदास की कविता पर इस प्रकार सद्भावना व्यक्त की है—

निर्गतासु न वा कस्य कालिदासस्य सूक्तिषु । प्रीतिर्मधुरसान्द्रासु मञ्जरीष्विव जायते ॥

संस्कृत साहित्य में कालिदास के काव्यों में रस, माधुर्य, कोमलभाव और साभिप्राय वर्णन अद्वितीय है। इनकी अद्वितीयता के सम्बन्ध में किसी मर्मज्ञ आलोचक ने बड़े ही सुन्दर कल्पना की है।

पुरा कवीनां गणनाप्रसंगे कनिष्ठिकाधिष्ठितकालिदासः । अद्यापि तत्तुल्यकवेरभावादनामिका सार्थवती बभूव ॥

किसी समय जब श्रेष्ठ कवियों की गणना होने लगी तब सबसे पहले कालिदास को सर्वप्रथम स्थान देकर उनका नाम कनिष्ठ अंगुलि पर रखा गया। बाद यह विचार उपस्थित हुआ कि द्वितीय स्थान किस कवि को दिया जाय ? पर कालिदास जैसे विलक्षण प्रतिभा-सम्पन्न कवि के न रहने के कारण दूसरी अङ्गुली अनामिका पर किसी कवि का नाम पड़ा-ही नहीं। इसलिए अमानिका (जिस पर किसी का नाम न पड़े) का नाम सार्थक हो गया। अर्थात् यह बिना नाम की ही रह गयी। गणना की सर्वानुभूत पद्धति यह है कि कुछ गिनते समय सबसे पहले कनिष्ठ (छोटा) अङ्गुली पर ही अङ्गुष्ठ को रखते हैं। बाद अनामिका, मध्यमा तथा तर्जनी पर।

विश्वविख्यात गीतिकाव्य के रचयिता पीयूषवर्षी कवि जयदेव ने तो कालिदास को कविताकामिनी का विलास मानते हुए इन्हें कविकुलगुरू की उपाधि से विभूषित किया है।

कालिदास की कमनीयकलेवर कविता विश्व के किस सहृदय हृदय को आनन्दमग्न नहीं कर देती ? महाकवि कालिदास हमारे राष्ट्रीय कवि थे तथा भारतीय संस्कृति के प्रमुख परिपोषक थे। भारत की संस्कृति इनकी काव्यवाणी में बोलती है और इनके नाटकों में अपना मनोरम रूप दिखाकर मानवमात्र के हृदय का मनोरञ्जन करती है। कालिदास ने अपने काव्य चमत्कार से समस्त संसार में ख्याति प्राप्त की है। इनके काव्यों में पदलालित्य, रचनाचातुर्य, कल्पनाशक्ति, प्रकृतिवर्णन, एवं चरित्र-चित्रण पढ़कर विश्व का प्रत्येक