भारतकोश
अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)

अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)

Abhijnanashakuntalam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाकवि कालिदास / डॉ. श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished540 पृष्ठ

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भूमिका

स विश्ववन्द्यो महतां कवीनां गुरुर्मनीषी कविकालिदासः।
यत्काव्य-पीयूष रस-प्रवाह-स्वादान्मितानन्दमयो हि लोकः ॥

कविकलाधर कविवर कालिदास भारतीय साहित्य की सर्वश्रेष्ठ विभूति हैं तथा प्राचीन भारतीय इतिहास के प्रतिनिधि कवि हैं। इनकी कृतियों में हमारी संस्कृति के प्राणतत्त्व सुरक्षित हैं। वस्तुतः भारतीय दार्शनिक मनीषियों ने सत्यं शिवं सुन्दरं के अनुसन्धान में जो बहुमूल्य मणिरत्न प्राप्त किये हैं वे सभी कालिदास की रचनाओं में सन्निविष्ट हैं। भारतीय संस्कृति ने जिन मूल्यों को अपनी साधना एवं अनुभव के आलोक में प्रतिष्ठित किया है उनकी मञ्जुल व्यञ्जना इनके काव्यों में रक्षित है।

संस्कृत साहित्य से परिचित कौन-सा ऐसा व्यक्ति होगा, जिसने इसका नाम न सुना हो। जिस कालिदास के अभिज्ञान शाकुन्तल नाटक ने उनकी कीर्तिकौमुदी को विश्वव्यापी एवं अमर बना दिया है और जिनकी कविताकामिनी की माधुरी पर मुग्ध होकर विदेशी विद्वान् भी आश्चर्यचकित हैं, उस कालिदास का नाम कौन नहीं जानता है।

कालिदास की महत्ता

न केवल भारतवर्ष में ही अपितु सारे संसार के सर्वश्रेष्ठ कवियों में कालिदास का सर्वोच्च एवं प्रमुख स्थान माना गया है। विश्व की किसी भी भाषा का कोई भी कवि अभी तक कालिदास की बराबरी नहीं कर पाया है।

इनके अभिज्ञानशाकुन्तल नाटक की नाट्यकला पर मुग्ध होकर एक जर्मन आलोचक ने ठीक ही कहा है कि “अंग्रेजी नाटककार शेक्सपीयर की तुलना कालिदास से करना अपनी अज्ञता का परिचय देना है, क्योंकि यदि शेक्सपीयर के सारे नाटक एक तरफ रख दिये जाँय और कालिदास का एक ही नाटक अभिज्ञानशाकुन्तल दूसरे तरफ रख दिया जाय तब भी शेक्सपीयर के सारे नाटक कालिदास के एक नाटक अभिज्ञानशाकुन्तल की बराबरी नहीं कर सकते हैं।” जर्मन भाषा में शकुन्तला का अनुवाद देखकर महाकवि गोटे ने आनन्दविभोर होकर इसकी प्रशंसा करते हुए कहा है कि यदि स्वर्ग एवं मर्त्यलोक को एक ही स्थान पर देखना हो तो शकुन्तला को देखो।

इनकी सर्वातिशायिनी अद्भुत विलक्षण प्रतिभा ने सारे विश्व को आश्चर्यचकित कर दिया है। आपके काव्यों में नाट्यकला की सुन्दरता, महाकाव्य की वर्णनशैली, गीतिकाव्य के सरस हृदयोद्गार को पढ़कर किस सहृदय का हृदय गद्गद नहीं हो उठता है। काव्य, नाटक, गीति जिस दिशा में देखा जाय उसी दिशा में इनकी अद्भुत प्रतिभा ने एक नयी कल्पना को प्रश्रय देकर संस्कृत साहित्य के स्तर को ऊँचा कर दिया है। इनके काव्यों में सरलता, प्रसादगुणसम्पन्नता, उपदेशप्रदता, धार्मिकता एवं भारतीयता का भाव कूट-कूट कर भरा हुआ है। इसीलिए संस्कृत साहित्य में इनकी बहुत बड़ी प्रतिष्ठा है।

यद्यपि संस्कृत साहित्य के काव्यसंसार में माघ, भारवि, श्रीहर्ष, सुबन्धु, दण्डी, बाणभट्ट, भास, भवभूति आदि बहुत से विद्वान हुए हैं, जिनकी कीर्तिकौमुदी दिग्-दिगन्तर में