अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)
Abhijnanashakuntalam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाकवि कालिदास / डॉ. श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी द्वारा
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( स्मितं कृत्वा ) एवमात्माभिप्रायसम्भावितेष्टजनचित्तवृत्तिः प्रार्थयिता ¹विप्रलभ्यते। कुतः—
कामं=यथेच्छं प्रीणातीति प्रियेत्यन्वर्थगुणा शकुन्तला सुलभा न=सुखप्राप्या न, दुर्लभैत्यर्थः, तस्याः प्रदानस्य गुर्वधीनत्वात्, गुरोश्चासान्निध्यात्, बलात्तदपहरणस्यायुक्तत्वाच्चेति भावः। मनः=तु मननशीलं मे चेतस्तु तस्याः=शकुन्तलायाः भावानां=मय्यनुरागसूचकानां स्निग्धवीक्षण-मन्दगमनचेष्टाविशेषादीनां दर्शनेन अवलोकनेन आश्वसिति तच्छीलम् आश्वसि=आश्वासयुक्तमिति तद्भावदर्शनाश्वासि=तदनुरागनिश्चयात्कृताश्वासम् प्रियाया दुर्लभत्वेऽपि मे चेतस्या अनुरागचिह्नं दृष्ट्वा आश्वस्तं वर्तते । मनसिजे=मन्मथे अकृतः=अद्यावधि अप्राप्तः अर्थः मनोरथो यस्य स तस्मिन् अकृतार्थेऽपि=भोगसामग्रीसम्पादन-द्वारा अनुरक्तयोः स्त्रीपुरुषयोः मिथः संयोजनमेव कामस्यार्थः तदसम्पपादनात् अकृतकृत्ये सत्यपि अचरितार्थेऽपि उभयप्रार्थना-उभयोः=स्त्रीपुरुषयोः प्रार्थना अनुराग इत्युभयप्रार्थना-= परस्परमीङ्गित-चेष्टित-कटाक्षपातादिव्यतिरेकेण स्वानुरागसूचनमेव रतिं=प्रीतिं कुरुते सुखं जनयति। नायिकासमागमसुखालाभेऽपि तच्चेष्टादिभिरेव मनो मे मोदते इत्याशयः। अत्रार्थान्तरन्यास-विभावना-श्रुत्यनुप्रास-अप्रस्तुतप्रशंसालङ्काराः आर्या च जातिः॥ १॥
( स्मितं कृत्वा = ईषद् विहस्य, स्मितमभिनीयेति भावः ) स्मितलक्षणं यथा—
‘ईषद्विकसितैर्गण्डैः कटाक्षैः सौष्ठवान्वितैः।
अलक्षितद्विज धीरमुत्तमानां स्मितं भवेत् ॥’
कामिजनमनोवृत्तेर्लोकविलक्षणत्वावगमोत्थो विस्मयः स्मितस्य हेतुः। अलीकेऽपि सत्यबुद्धिं विदधानाः कामिनोऽवश्यं विडम्ब्यन्ते इत्याह—एवमिति। एवं=तस्या मय्यनु-
मेरे प्रति उसके भावों = अनुरागसूचक कटाक्षपूर्वक निरीक्षण, मन्दगमन आदि चेष्टा को देखकर मेरे मन में कुछ धीरज तो बँधी हुई है। क्योंकि कामवासना यद्यपि कृतार्थ न हो फिर भी दोनों की चाह ही सुखप्रद होती है। अर्थात् शकुन्तला के न मिलने से सुरति सुख के अभाव में मेरी काम-वासना तो पूरी नहीं हुई है, किन्तु मेरे प्रति उसके प्रेमानुराग को जान कर मुझे आनन्द सुख तो हो ही रहा है ॥ १ ॥
विशेष—'समीहा रतिभोगार्था विलास इति कथ्यते।' के अनुसार राजा दुष्यन्त ने शकुन्तला की आशा लगाई है। अतः यहाँ प्रतिमुख सन्धि का अङ्ग विलास नामक अवस्था है। नायक-नायिका के मिलन से काम की सफलता मानी जाती है, क्योंकि काम का काम दोनों को मिलाना ही है। काम की सफलता से रति की प्राप्ति होती है। इस पद्य में दुष्यन्त और शकुन्तला दोनों के परस्पर अनुराग से रति का होना निश्चित है। अतः बीज रूप से दोनों में कामना निहित है। अतः प्रतिमुख सन्धि है, क्योंकि जहाँ मिलन के निमित्ति किया गया अनुराग लक्ष्य तथा अलक्ष्य रहता है वहाँ प्रतिमुख सन्धि होती हैं यहाँ दुष्यन्त का अनुराग लक्ष्य है तथा शकुन्तला का अलक्ष्य। प्रतिमुख सन्धि का लक्षण साहित्यदर्पण में विश्वनाथ ने इस प्रकार स्पष्ट किया है—
‘फलप्रधानोपायस्य मुखसन्धिनिवेशिनः।
लक्ष्यालक्ष्य इवोद्भेदो यत्र प्रतिमुखं च तत् ॥’
( कुछ हँसकर ) अपने अभिप्राय के अनुसार ही अपने प्रिय जनों की भी चित्तवृत्तिकी संभावना करके ही प्रार्थयिता = कामीजन अपने मन को विविध कल्पनाओं से बहलाया करता है।
पाठा०—१. विडम्ब्यते ।