भारतकोश
अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)

अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)

Abhijnanashakuntalam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाकवि कालिदास / डॉ. श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished540 पृष्ठ

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द्वितीयोऽङ्कः

भोदु अंग-भंग विअलो भविअ चिट्ठिअस्सं एव्वं वि णाम विस्सामं लहेअं ।
( इति दण्डकाष्ठमवलम्ब्य स्थितः । ) [ भवतु । अङ्ग-भङ्गविकलो भूत्वा स्थास्यामि । एवमपि नाम विश्रामं लभेय । ] ( इति काष्ठदण्डमवलम्ब्य स्थितः )
( ततः प्रविशति यथानिर्दिष्टो राजा )

राजा—( आत्मगतम् )

कामं प्रिया न सुलभा मनस्तु तद्भावदर्शनाश्वासि ।
अकृतार्थेऽपि मनसिजे रतिमुभयप्रार्थना कुरुते ॥ १ ॥

प्रत्युत्पन्नमतिर्विदूषकः विश्रामलाभे उपायं विमृशन्नाह भवत्विति । भवतु = अस्तु किं करणीयमधुना इति ज्ञातमित्यर्थः । अङ्गस्य = शरीरस्य पादादेः अवयवस्य वा भङ्गेन = घातेन विकलः = पीडित इति अङ्गभङ्गविकलः = पश्यतां यथा सर्वाङ्गपीडासम्भावना स्यात्तथा भूत्वा तद्वदाचरन् स्थास्यामि = उपवेशयामि, एवं = अनेन प्रकारेण पीडाव्याजेन विश्रामं = मृगयाया मुक्तिं लभेय = प्राप्नुयाम् ( इति = इत्थं विचिन्त्य दण्डकाष्ठं = लगुडं अवष्टभ्य = अवलम्ब्य आश्रित्य स्थितः । )
( ततः = तदनन्तरं यथानिर्दिष्टः पूर्वोक्तप्रकारको राजा दुष्यन्तः प्रविशति = रङ्गमञ्चे उपतिष्ठते )

अन्वयः—कामं प्रिया न सुलभा कामम्, मनस्तु तद्भावदर्शनाश्वासि मनसिजे अकृतार्थेऽपि उभयप्रार्थना रतिं कुरुते ।

अथ राजा दुष्यन्तो विरहेणोद्विग्नमना शकुन्तला मनसा स्मरन् विमृशति—काममिति ।

अच्छा, तो मैं अङ्गभङ्ग से विकल कुबड़े की तरह होकर यहीं खड़ा हो जाता हूँ, इसी तरह यदि विश्राम कर सकूँ तो भी ठीक हैं ( लाठी का सहारा लेकर वहीं खड़ा हो जाता है । )

विशेष— नाटकों में अङ्ग भङ्ग, वेश-भूषा, वाणी आदि से हँसाना तथा विनोद का वातावरण उपस्थित करना विदूषक का प्रधान कार्य है । यह राजा का ब्राह्मण-मित्र होता है । साहित्यदर्पण में यह राजा का शृङ्गार-सहायक, परिहास निपुण मानिनीमानभञ्जक और विशुद्ध चरित्र का व्यक्ति कहा जाता है । नाटक में विदूषक राजा को वयस्य कहता, वह प्राकृत में बोलता है—

'विदूषकेण वक्तव्यो वयस्येति च भूपतिः । विदूषकविटादीनां पाठ्यं तु प्राकृतं भवेत् ॥'

यहाँ विदूषक ने शिकार का बड़ा ही उत्तम दोष प्रदर्शित किया है । ग्रीष्म ऋतु की गर्मी के समय पेड़ों की पत्तियाँ झरनों, नदियों आदि के पानी में गिर कर उसे कसैला बना देते हैं, जिसको पीने में शिकारियों को कडु आस्वाद होता है । गले में बढ़ा हुआ घेघा स्वयं कष्टकारक होता है । यदि उसमें फोड़ा हो जाय तो और भी कष्टकारक होता है । इसी को कहते हैं कि 'फोड़े पर फोड़ा', 'घाव पर घाव' ।

शिकार मृग का अनुसरण करते-करते राजा दुष्यन्त महर्षि कण्व के आश्रम में जाकर शकुन्तला का साक्षात्कार तथा उसमें आसक्त होकर राजधानी में लौटने का जिक्र नहीं करते, जिससे खिन्न होकर विदूषक मृगया की निन्दा करता है । पुनः राजा का दर्शन करना चाहता है पर राजा को सामने आता हुआ देखकर अपना अङ्ग-भङ्ग कर खड़ा हो जाता है ।

( इसके बाद पहले बताये गये के अनुसार राजा दुष्यन्त रङ्गमञ्च पर दिखाई पड़ते हैं )

राजा—( मन ही मन ) यद्यपि मेरी प्रिया शकुन्तला का मिलना अभी दुर्लभ है, तो भी

पाठा०—१. तद्भावदर्शनायासि ।