भारतकोश
अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)

अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)

Abhijnanashakuntalam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाकवि कालिदास / डॉ. श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished540 पृष्ठ

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पड़ता है। इतिहास के अनुसार प्रथम शताब्दी में उरियापुर पाण्ड्य नरेशों की राजधानी थी। इसलिए कालिदास को प्रथम शताब्दी में मानना ठीक ही है।

दूसरी बात यह है कि अभिज्ञान शाकुन्तल के मङ्गलाचरण—'या सृष्टिः स्रष्टुराद्या' में सूचित धार्मिक एवं सामाजिक व्यवस्थाओं से भी मालूम पड़ता है कि कालिदास ऐसे समय में हुए थे कि जब लोग बौद्धधर्म के प्रभाव से हिन्दू देवी-देवताओं के विषय में श्रद्धा-विहीन होते जा रहे थे।

ऊर्ध्वाङ्कित पद्य में 'प्रत्यक्षाभिः' इस पद का प्रयोग करके कालिदास ने देवता विषयक अविश्वास को दूर करने का प्रयास किया है। जिस भूतभावन भगवान् शिव की जल, अग्नि, यजमान, सूर्य, चन्द्रमा, आकाश, पृथ्वी और वायु इन आठ मूर्तियों का हमें सर्वदा प्रत्यक्ष दर्शन होता है उसके विषय में अश्रद्धा कैसे हो सकती है। इसी प्रकार शकुन्तला के षष्ठ अङ्क में दुष्यन्त की अँगूठी को बेचने के समय राजपुरुषों द्वारा पकड़े जाने पर मछली मारना अपनी जाति का कर्तव्य बतलाता हुआ धीवर कहता है कि—भगवान् ने जिस जाति को जो भला-बुरा काम दे दिया है वह छोड़ा नहीं जा सकता। देखिए—पशुओं को मारना तो बुरा काम है, पर बड़े-बड़े दयावान् और वेद जानने वाले ब्राह्मण भी यज्ञ में पशुओं को मारते ही हैं। इस वर्णन से मालूम पड़ता है कि कालिदास ने बौद्धधर्म के प्राबल्य के कारण यज्ञों के विषय में होनेवाली हिंसीजन्य निन्दा और अश्रद्धा को दूर करने का प्रयास करते हुए आवश्यक कर्तव्य होने के कारण हिंसा होने पर भी ब्राह्मणों को यज्ञ करना जातीय धर्म बतलाया है। अतः कुलपरम्परा जाति धर्म का त्याग करना उचित नहीं, यज्ञों का अनुष्ठान करना ब्राह्मणों के लिए सर्वथा श्रेयस्कर है। इस आधार पर हम कह सकते हैं कि कालिदास उस समय में थे जब वर्ण व्यवस्था और यज्ञादि-खण्डन करने के कारण बौद्धधर्म के प्रति अश्रद्धा बढ़ती जा रही थी और ब्राह्मण धर्म का अभ्युदय हो रहा था। यह समय ई० पू० द्वितीय शताब्दी के बाद सुङ्गवंशीय नरेशों के बाद का है। इसलिये कालिदास का जन्म प्रथम शताब्दी में मानना न्यायसंगत है।

पुष्यमित्र शुंग ने बौद्धों को हटाकर वैदिक धर्म की स्थापना की थी। वैदिक संस्कृति की जो महिमा कालिदास की रचनाओं में दीखती है वह उस समय ही हो सकती थी। उस समय संस्कृत एवं काव्य का इतना प्रचार था कि अश्वघोष को भी संस्कृत में रचना करने के लिए विवश होना पड़ा। जब कि स्वयं बुद्ध ने पालि में उपदेश दिये और बौद्ध-ग्रन्थ पालि में ही लिपिबद्ध किये जाते थे।

प्रथम शताब्दी में वर्तमान कनिष्क की सभा के महापण्डित बौद्ध कवि अश्वघोष ने अपने बुद्धचरित में कालिदास के बहुत से पद्यों का अनुकरण किया है। दोनों के काव्यों में अत्यधिक साम्य है। कथानक की सृष्टि और विकास, वर्णन-शैली, अलंकारों का प्रयोग, छन्दों का चयन एवं शब्दों का विन्यास दोनों कलाकारों में से एक-दूसरे से प्रभावित हैं।

जैसे—रघुवंश में—अलं महीपाल तव श्रमेण।
बुद्धचरित में—मोघं श्रम नार्हसि मार कर्तुम्।

इसी प्रकार कालिदास ने रघुवंश के सप्तम सर्ग में इन्दुमती के स्वयम्बर से लौटते हुए अज को देखने के लिए उत्सुक स्त्रियों का जैसा सुन्दर वर्णन किया है। ठीक वैसा ही वर्णन अश्वघोष ने अपने बुद्धचरित के तृतीय सर्ग में शुद्धोदन की समृद्ध नगरी में प्रथम बार

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