अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)
Abhijnanashakuntalam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाकवि कालिदास / डॉ. श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १२ )
प्रवेश करते हुए राजकुमार सिद्धार्थ को देखने के लिए अत्युत्कण्ठा पूर्वक दौड़ती हुई नारियों का किया है ।
इन दोनों महाकवियों के वर्णन में बहुत बड़ी समानता है । अश्वघोष द्वारा कालिदास का अनुकरण करने के बल पर यह सिद्ध किया जाता है कि कालिदास अश्वघोष के पहले ई० पूर्व प्रथम शताब्दी ये उत्पन्न महाकवि हैं ।
कालिदास की कविताकला
कविकुलकलाधर कविवर कालिदास की कोमल कमनीय कलेवर कविता विश्व के किस सहृदय के हृदय को आनन्द मग्न नहीं कर देती है ।
इनकी कविता में प्रसाद गुण की, अगाधता, माधुर्य का मधुर सन्निवेश, कोमलकान्त पदावली, उपमा की अपूर्वता, अलंकारों की रमणीयता, छन्दों की छटा और भावसौष्ठव आदि पर्याप्त मात्रा में रहने के कारण उनकी कविता विश्वविख्यात बन गई है । इनके काव्यों को जिस दृष्टि से देखा जाय उसी से काव्य कला की कमनीयता प्रकट होती है । इनकी कविता में सरस, सरल सुबोध तथा सुन्दर-सुन्दर शब्दों एवं भावों का साम्राज्य मन को मुग्ध कर देता है ।
वास्तव में कालिदास की कविता में सहृदयों की तो बात ही क्या है, साधारण व्यक्ति को भी जैसा प्रसाद गुण का रसास्वाद शब्द और अर्थ की निर्दोषता, गुण और अलंकारों का चमत्कार मिलता है । वैसा दूसरे किसी कवि में नहीं मिलता है। व्यङ्ग्यार्थ प्रतिपादन की विलक्षण शैली, रसप्रकर्ष का प्रकाशन, विस्तृत विषय का थोड़े में वर्णन, वर्ण्य विषय को सुन्दर क्रम से रखकर रोचक बनाना, स्वाभाविक भाव के द्वारा लोकोत्तर प्रदान का ढंग आदि कालिदास की कविता का स्वाभाविक गुण है । ध्वनिकाव्य का उत्तम गुण व्यञ्जना-व्यापार कालिदास के सभी ग्रन्थों में अनुस्यूत है ।
कालिदास संस्कृत साहित्य के अद्वितीय महाकवि माने जाते हैं । इनकी कविता की मधुरिमा के सामने अन्य कवियों की कविता फीकी पड़ जाती है । मानव हृदय के सूक्ष्म से सूक्ष्म भावों का आपने जैसा निरीक्षण किया है वैसा अन्य कवियों ने नहीं ? कालिदास अन्तर्जगत् तथा बाह्यजगत् दोनों के सूक्ष्म निरीक्षक एवं पारखी कवि हैं। समष्टि दृष्टि से इनकी कविता में प्रसाद गुण तो सर्वत्र प्राप्त ही है पर अन्य कवियों की अपेक्षा इनका उपमा अलंकार स्वभाव सुन्दर होता है और वे उपमा के तो बेजोड़ कवि माने जाते हैं ।
वाल्मीकि और व्यास के बाद विद्वत्समाज में सर्वप्रथम महाकवि के नाम से कालिदास ही प्रसिद्ध हैं । कवि में जितने गुण होने चाहिए वे सभी कालिदास में पूर्ण रूप से विद्यमान हैं । इनकी नैसर्गिक रचना में भाषानुकूल भाव रखने की अद्भुत कला है । प्रकृति का सूक्ष्म निरीक्षण और मानव हृदय के अन्तर्निहित भावों को व्यक्त करने में कालिदास को स्वतः सिद्धि प्राप्त है, इसीलिए विदेश के समीक्षक विद्वान् भी मुक्त कण्ठ से कालिदास की कविता कला की प्रशंसा करते हुए इनके काव्यों का आदर करते हैं । मल्लिनाथ ने तो स्पष्ट कहा है कि कालिदास की वाणी का वास्तविक रहस्य हमारे जैसे लोग तो नहीं समझ पाते केवल तीन व्यक्ति ही समझते हैं, एक तो विधाता=ब्रह्मा, दूसरी वाग्देवी सरस्वती तथा तीसरे स्वयं कालिदास ।
कालिदासगिरां सारं कालिदासस्सरस्वती ।
चतुर्मुखोऽथवा ब्रह्मा विदुर्नान्ये तु मादृशाः ॥