भारतकोश
अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)

अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)

Abhijnanashakuntalam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाकवि कालिदास / डॉ. श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished540 पृष्ठ

पृष्ठ 19, कुल 540 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 19

( १३ )

कवि ने शकुन्तला के चतुर्थ अंक में निसर्गसुन्दरी शकुन्तला की विदाई के समय केवल आश्रमवासी मनुष्यों को ही नहीं, किन्तु मृग, मयूर, चक्रवाक और निर्जीव वृक्ष लताओं को भी रुला दिया है। यह अद्भुत कला कवि की अपनी विशिष्टता है। शकुन्तला के प्रति महर्षि कण्व का उपदेश और दुष्यन्त के प्रति सन्देश तो प्रत्येक गृहस्थ के लिए आदरणीय, अनुकरणीय और आचरणीय हैं। तपोवन के पावन वातावरण में पली हुई शकुन्तला मानो साक्षात् प्रकृति की कन्या है। यहाँ के निवासी सजीवों एवं निर्जीवों के प्रति उसका हृदय बान्धव स्नेह से आप्लुत है।

रसपरिपाक

यों तो कालिदास ने अपनी रचना में स्थान-स्थानपर सभी रसों का सन्निवेश किया है, पर ये प्रधान रूप से शृङ्गार-रस के रसिक कवि हैं। इनकी रचनाओं में शृङ्गार रस ओत-प्रोत है। इनके काव्यों में सम्भोग शृंगार का प्रकाशमान रूप तथा विप्रलम्भ शृङ्गार का करुणामय रूप पाठक एवं श्रोताओं के हृदय को चमत्कृत कर देते हैं। मेघदूत में विप्रलम्भ और कुमारसम्भव में सम्भोग शृङ्गार का प्राचुर्य है। सम्भोग शृंगार की अपेक्षा इनका विप्रलम्भ शृंगार उच्चकोटि का होता है। उत्तर मेघदूत का उदाहरण देखिए—

त्वामालिख्य प्रणयकुपितां धातुरागैः शिलाया-
मात्मानं ते चरणपतितं यावदिच्छामि कर्तुम्।
अस्रैस्तावन्मुहुरुपचितैर्दृष्टिरलुप्यते मे
क्रूरस्तस्मिन्नपि न सहते संगमं नौ कृतान्तः॥ ४७ ॥

पर्वत के चट्टानों पर गैरिकादि धातुओं से प्रणयकुपिता अपनी प्रियतमा की मूर्ति बनाकर क्षमा के लिए उसके चरणों पर गिरने का प्रयत्न करते समय अश्रुप्रवाह के उमड़ आने से कल्पित सम्भोग में भी बाधा पड़ने के कारण क्षुब्धहृदय यक्ष का क्रूर कृतान्त-विषयक उपालम्भ पढ़कर किस सहृदय का हृदय व्यथित नहीं हो उठता है? निर्जीव मेघ को दूत बनाकर अपनी प्रियतमा के पास प्रेममय सन्देश भेजनेवाले यक्ष के प्रेमोन्माद को पढ़कर कालिदास की काव्यकला की प्रशंसा किये बिना कौन रह सकता है?

कालिदास के करुण रस का वर्णन भी स्वाभाविक होता है। कुमारसम्भव के चतुर्थ सर्ग में शङ्कर की क्रोधाग्नि से कामदेव के भस्मसात् हो जाने पर रति का विलाप तथा रघुवंश के अष्टम सर्ग में आकाश से गिरी हुई पुष्पमाला के आघात से इन्दुमती के मर जाने पर अज का विलाप करुण रस के मर्मस्पर्शी उदाहरण हैं। इन्दुमती के मर जाने पर अज विलाप करते हुए कहते हैं—

स्रगियं यदि जीवितापहा हृदये किं निहिता न हन्ति माम्।
विषमप्यमृतं क्वचिद्भवेदमृतं वा विषमीश्वरेच्छया॥ ८।४६

कुमारसम्भव में भगवान् शङ्कर के ललाटस्थ तृतीय नेत्र से निर्गत अग्नि से भस्मसात् हुए अपने पति के शरीर को देखकर रति विलाप करती हुई कहती है—

शशिना सह याति कौमुदी सह मेघेन तडित् प्रलीयते।
प्रमदाः पतिवर्त्मगा इति प्रतिपन्नं हि विचेतनैरपि॥ ४।३३

अभिज्ञानशाकुन्तल नाटक के चतुर्थ अङ्क में शकुन्तला को अपने पति के घर जाते समय का कवि ने ऐसा मर्मस्पर्शी करुण रस का चित्रण अङ्कित किया है कि विषयसुख से

2
२ शा० भू०