भारतकोश
अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)

अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)

Abhijnanashakuntalam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाकवि कालिदास / डॉ. श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished540 पृष्ठ

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द्वितीयोऽङ्कः

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राजा--( आसनादुत्थाय ) अभिवादये भवन्तौ !
**उभौ--**स्वस्ति भवते ( इति फलान्युपहरतः ) ।
राजा--( सप्रणामं परिगृह्य ) १आज्ञापयितुमिच्छामि ।
**उभौ--**विदितो भवानाश्रमसदामिहस्थः तेन भवन्तं प्रार्थयन्ते ।
**राजा--**किमाज्ञापयन्ति ।


राजा—( आसनादुत्थाय = सिंहासनादुत्थितो भूत्वा ) भवन्तौ = युवाम् अभिवादये = वन्दे, प्रणतोऽस्मि ।
**उभौ—**भवते = आयुष्मते तुभ्यं स्वस्ति = कल्याणं भवतु ( इति = एवमुक्त्वा राज्ञे फलानि उपाहरत = अर्पयतः ) ।
राजा—( सप्रणामं = प्रणामेन=नत्या सह सप्रणामं=नतिपूर्वकम् परिगृह्य=गृहीत्वा, स्वीकृत्य ) भवद्भ्यामात्मानम् आज्ञापयितुं = आज्ञाही भवितुम् इच्छामि = वाञ्छामि ।
**उभौ—**ऋषिकुमारौ स्वकार्यं निवेदयतः-आश्रमसदां = आश्रमवासिनां मुनीनां भवान् = त्वमिहस्थः विदितः = ज्ञातः । तेन = कारणेन ते भवन्तं त्वां प्रार्थयन्ते = निवेदयन्ति ।
**राजा—**नृपो दुष्यन्तः कथयति यत् किम् आज्ञापयन्ति = आदिशन्ति ते आश्रमसदो मुनयः ।


राजा--( आसन से उठकर ) मैं आप दोनों को प्रणाम करता हूँ । और आप लोगों से शुभ आशीर्वाद की कामना करता हूँ ।
**दोनों—**राजन् ! आपका कल्याण हो । ( दोनों ऋषिकुमार राजा को फल भेंट करते हैं )
**विशेष—**ऋषिकुमारों द्वारा राजा दुष्यन्त को फल देने का तात्पर्य है कि भारतीय मर्यादा के अनुसार राजा, गुरु और वैद्य के पास खाली हाथ नहीं जाना चाहिए । हाथ में उपहार के रूप में कुछ फूल, फल लेकर राजा आदि का दर्शन करना चाहिए—

'रिक्तपाणिर्न गच्छेत् राजानं दैवतं गुरून् । नैमित्तिकं च वैद्यं च फलेन फलमाहरेत् ॥'

धर्मशास्त्रों में निर्देश किया गया है कि देवता, राजा, गुरु, भार्या, वैद्य एवं ज्योतिषियों के पास खाली हाथ नहीं जाना चाहिए—

'दैवो राजा गुरुर्भार्या वैद्यो नक्षत्रपाठकः । रिक्तपाणिर्न गन्तव्यः तत्र कार्यं न सिध्यति ॥'

इसलिए किसी आदरणीय व्यक्ति से मिलते समय आदर पूर्वक उसे उपहार में यथाशक्ति फल, फूल आदि कुछ अवश्य दिया जाना चाहिए । राजा, गुरु आदि के दर्शन करते समय खाली हाथ नहीं जाना चाहिए—

'अग्निहोत्रं गृहं क्षेत्रं मित्रं भार्यां सुतं शिशुम् । रिक्तपाणिर्न पश्येत राजानं देवतां गुरुम् ॥'

इसलिए स्मृतियों के इस नियम के अनुसार ऋषिकुमारों ने राजा दुष्यन्त को आदरपूर्वक फलोपहार दिया था ।
राजा—( प्रणामपूर्वक फल लेकर ) मैं आप लोगों के आने का उद्देश्य भी सुनना चाहता हूँ ।
**दोनों—**आपका यहाँ आना तपस्वियों को ज्ञात हो गया है। अतः वे आप से अभ्यर्थना करते हैं ।
**राजा—**तो, कहिए पूज्य तपस्वियों की क्या आज्ञा है ?

पाठा०—१. आगमनप्रयोजनं ज्ञातुमिच्छामि ।