भारतकोश
अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)

अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)

Abhijnanashakuntalam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाकवि कालिदास / डॉ. श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished540 पृष्ठ

पृष्ठ 22, कुल 540 में से

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कालिदास का छन्द-विषयक ज्ञान भी गम्भीर और पूर्ण है। इन्होंने अपने काव्यों में प्रायः सभी प्रमुख छन्दों का प्रयोग किया है। ये छन्दों का चुनाव रस और वर्ण्य वस्तु के अनुकूल ही करते हैं। कालिदास मन्दाक्रान्ता छन्द के सिद्धहस्त कवि माने जाते हैं।

इन्होंने अपने खण्ड काव्य मेघदूत को केवल मन्दाक्रान्ता छन्द में ही लिखा है—

सुवशा कालिदासस्य मन्दाक्रान्ता प्रवल्गति ।
सदश्वस्य दमस्येव कम्बोजतुरगाङ्गना ॥

कालिदास की विशेषता

प्रत्येक कवि में किसी न किसी विषय की खास एक विशेषता रहती है। कविवर कालिदास उपमा अलंकार के आचार्य माने जाते हैं। तत्तत् कवियों की विशेषता व्यक्त करते हुए एक आलोचक ने बहुत ठीक कहा है—

उपमा कालिदासस्य भारवेरर्थगौरवम् ।
दण्डिनः पदलालित्यं त्रयोऽप्येकैकतोऽधिकाः ॥

उपमा की छटा

कालिदास की उपमायें एक से एक बढ़कर हैं। इन्होंने नई-नई उपमाओं की उद्भावना की है। इनकी उपमाओं के विशेष चमत्कार का कारण यह है कि प्रायः इनकी उपमायें अन्तर्जगत् और बाह्य जगत् दोनों से ली गई हैं। इन्होंने उपमाओं में उपमान तथा उपमेय के वचन और लिंग तक का भी विचार किया है। रघुवंश के षष्ठ सर्ग में इन्दुमती के स्वयंवर में उपस्थित राजाओं की दशा का वर्णन करते हुए कालिदास लिखते हैं—स्वयम्बर में उपस्थित जिन-जिन राजाओं को छोड़कर जब इन्दुमती आगे बढ़ जाती थी तब वे राजे दीपशिखा के द्वारा छोड़े गये महलों के समान प्रतीत होते थे। यहाँ निराश राजाओं की विषण्णता तथा खिन्नता की अभिव्यक्ति इस उपमा के द्वारा बड़ी सुन्दरता से दी गई है।

सञ्चारिणी दीपशिखेव रात्रियं यं व्यतीयाय पतिम्बरा सा ।
नरेन्द्रमार्गाट्ट इव प्रपेदे विवर्णभावं स स भूमिपालः ॥ ६।६७

इस श्लोकमें इन्दुमती की उपमा स्त्रीवाची दीपशिखा शब्द से दी गई है और राजा की उपमा पुंलिङ्ग अट्ट शब्द से दी गई है। लिंग की समता के साथ-साथ वचन की समता भी दर्शनीय है। इसी उपमासौष्ठव पर मुग्ध होकर साहित्यिक विद्वत्समुदाय ने इस महाकवि को दीपशिखा कालिदास कहना आरम्भ कर दिया।

रघुवंश के द्वितीय सर्ग में सायंकाल के समय जब दिलीपं वसिष्ठजी की गाय नन्दिनीको चराकर आश्रम की ओर लौटते हैं और लाल रंग की गाय आगे आगे है, शुभ्रवस्त्रधारी दिलीप पीछे पीछे हैं हरितवस्त्र धारिणी सुदक्षिणा उनकी प्रतीक्षां करती हुई स्वागत करने के लिए खड़ी है, दोनों के बीच में स्थित नन्दिनी की शोभा जैसी प्रतीत हो रही है जैसे दिन और रात के मध्य रक्तवर्णा सन्ध्या।

पुरस्कृत्य वर्त्मनि पार्थिवेन प्रत्युद्गता पार्थिवधर्मपत्न्या ।
तदन्तरे सा विरराज धेनुर्दिनक्षपामध्यगतेव सन्ध्य ॥ २।२०

यहाँ राजा की उपमा दिनसे, सुदक्षिणा की उपमा रात्रि से और गाय नन्दिनी की उपमा लाल सन्ध्या से दी गई है। और भी देखिए—

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