अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)
Abhijnanashakuntalam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाकवि कालिदास / डॉ. श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १७ )
शरीरसादादसमग्रभूषणा मुखेन सालक्ष्यत लोध्रपाण्डुना ।
तनुप्रकाशेन विचेयतारका प्रभातकल्पा शशिनेव शर्वरी ॥ ३।२
शरीर की दुर्बलता के कारण कुछ ही आभूषण पहनी हुई उस सुदक्षिणा की लोध्रपुष्प सदृश पीले मुख से ऐसी शोभा हुई जैसे प्रातःकाल टिमटिमाते हुए ताराओं से युक्त रात की शोभा पीले वर्ण के चन्द्रमा से होती है। यह भाव व्यक्त करने के लिए कवि ने लोध्रपाण्डु मुख से चन्द्रमा की एवं एकाध तारायुक्त प्रभातकल्पशर्वरी से सुदक्षिणा की उपमा देते हुए कितने सुन्दर ढङ्ग से पूर्णोपमा व्यक्त की है। इस प्रकार कालिदास की कविता में स्थल-स्थल पर अनूठी उपमा का चमत्कार मिलता है। इनकी उपमाओं में स्वाभाविकता का उत्कर्ष है जिससे पाठक का हृदय सहसा चमत्कृत हो उठता है।
कुमारसंभव में तपस्या के लिए आभूषणों का परित्याग कर केवल वल्कल वस्त्र धारण करने वाली पार्वती चन्द्रमा तथा ताराओं में मण्डित अरुणोदय युक्त रजनी के समान बतलाई गई है। स्तनों के भार से कुछ झुकी हुई आतप सदृश लालवस्त्र धारण की हुई पार्वती फूलों के गुच्छों से झुकी हुई नवीन लाल पल्लवों से सुशोभित संचारिणी लता के समान प्रतीत होती थी—
पर्याप्तपुष्पस्तनभारनम्रा सञ्चारिणी पल्लविनी लतेव ।
रघुवंश के प्रथम सर्ग में कवि की उपमा देखने योग्य है। वशिष्ठ की नन्दिनी गौ का शरीर नये पत्तों के समान कोमल एवं लाल है, उसके मस्तक पर भूरे बालों की वक्र रेखा बनी हुई है जिससे वह ऐसी शोभा पा रही है जैसे लाल सन्ध्या के भाल पर द्वितीया का चन्द्रमा चढ़ आया हो—
ललाटोदयमाभुग्नं पल्लवस्निग्धपाटला ।
बिभ्रती श्वेतरोमाङ्कं सन्ध्येव शशिनं नवम् ॥ १।८३
श्रुतेरिवार्थं स्मृतिरन्वगच्छत् २।२, जुगोप गोरूपधरामिवोर्वीम् । २।३
नादसौन्दर्य की प्रसूतिके लिए अनुप्रास अलङ्कार की योजना उनकी रचनाओं में नितान्त मनोरम बन गई है। जैसे रघुवंश में—
जीवन् पुनः शश्वदुपप्लवेभ्यः प्रजाः प्रजानाथ ! पितेव पासि ॥ २।४८
अर्थान्तरन्यास का उदाहरण शकुन्तला में देखिए—
इयमधिकमनोज्ञा वल्कलेनापि तन्वी ।
किमिव हि मधुराणां मण्डनं नाकृतीनाम् ॥ १।१६
रघुवंश में इन्दुमती स्वयंम्बर में—
नासौ न काम्यो न च वेद सम्यग्द्रष्टुं न सा भिन्नरुचिहि लोकः । ६।३०
पूर्वमेघ में—
इत्यौत्सुक्यादपरिगणयन् गुह्यकस्तं ययाचे ।
कामार्ता हि प्रकृतिकृपणाश्चेतनाचेतनेषु ॥ ५ ॥
उत्तरमेघ में—
कस्यात्यन्तं सुखमुपनतं दुःखमेकान्ततो वा ।
नीचैर्गच्छत्युपरि च दशा चक्रनेमिक्रमेण ॥ ५२ ॥