अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)
Abhijnanashakuntalam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाकवि कालिदास / डॉ. श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १८ )
शकुन्तला के प्रथम अंक में हरिण भाग रहा है। राजा दुष्यन्त उसका पीछा कर रहा है। उसके धनुष पर बाण चढ़ा हुआ है। तपस्वी राजा को रोकते हुए कहता है—राजन् ! पुष्पराशि की तरह सुकोमल शरीर वाला यह हरिण आपके अग्नितुल्य बाणों को क्या बर्दाश्त कर सकेगा। अहह, कहाँ बेचारों हरिणों का अति चंचल प्राण और कहाँ तीक्ष्ण प्रहार करने वाले वज्र के समान कठोर आपके बाण। अतः आप इस पर बाण प्रहार न करें—
न खलु न खलु बाणः सन्निपात्योऽयमस्मिन् मृदुनि मृगशरीरे पुष्पराशाविवाग्निः। क्व बत हरिणकानां जीवितं चातिलोलं क्व च निशितनिपाता वज्रसाराः शरास्ते ॥ १०
इसी प्रकार शकुन्तला को पुष्पित लता के समान बतलाकर कालिदास ने उसके सौन्दर्य में कितनी मादकता भर दी है। राजा दुष्यन्त की दृष्टि में शकुन्तला लता से जरा भी कम नहीं है। उसके अनुपम सौन्दर्य की छटा अत्यन्त लोभनीय है। शकुन्तला का अधरोष्ठ नव पल्लव के समान लाल है, दोनों भुजायें कोमल शाखाओं के सदृश हैं। इसके अङ्गों में फूल की तरह लुभावना यौवन व्याप्त है।
अधरः किसलयरागः कोमलविटपानुकारिणौ बाहू। कुसुममिव लोभनीयं यौवनमङ्गेषु सन्नद्धम् ॥ १२१
इस प्रकार प्रायः कालिदास सभी प्रचलित अलङ्कारों के प्रयोग में दक्ष हैं किन्तु उपमा अलंकार पर इनका चमत्कारिक अधिकार है। केवल संस्कृत के ही नहीं, अपितु विश्व का भी कोई ऐसा कवि नहीं है। जो इनकी उपमा कला की समता कर सके। इनकी रचनाओं में उपमा की प्रचुरता के साथ ही उसका सौष्ठव भी देखते ही बनता है। इनकी उपमाओं की रसपेशलता अत्यन्त हृदयावर्जक है। सन्दर्भ को सुन्दर बनाने की कला में वे पारङ्गत हैं।
कालिदास के अध्ययन-स्थल की कल्पना
प्राचीन काल में विविध विद्याओं के गम्भीर अध्ययन के लिए भारत में अनेक विद्या-पीठ थे पंजाब में तक्षशिला, मगध में नालन्दा, सौराष्ट्र में वलभी और मालवा में उज्जैन। इनके अतिरिक्त जगह-जगह विद्वान् ब्राह्मणों द्वारा स्थापित अनेक गुरुकुल थे, जिनमें वेद, वेदाङ्ग, व्याकरण, ज्योतिष, धर्मशास्त्र दर्शन आदि का अध्ययन ही नहीं होता था बल्कि सुधामधुर काव्यों के निर्माण के लिए भी प्रोत्साहन मिलता था। कालिदास के ग्रन्थों के अनुशीलन से प्रतीत होता है कि उनकी शिक्षा भी ऐसे ही किसी गुरुकुल में हुई होगी। क्योंकि वे आश्रमों का वर्णन साङ्गोपाङ्ग करते हैं। कालिदास ने एक स्थल पर कहा है कि ऐसे गुरुकुलों में चौदह विद्याओं का अभ्यास कराया जाता है। याज्ञवल्क्यस्मृति में चार वेद, शिक्षा, व्याकरण आदि छः अङ्ग, पुराण, न्याय, मीमांसा तथा धर्मशास्त्र ये मिलकर धर्म के मूलभूत चौदह विद्याएँ हैं—
पुराणन्यायमीमांसा धर्मशास्त्राङ्गमिश्रिताः। वेदाः स्थानानि विद्यानां धर्मस्य च चतुर्दश ॥
कालिदास के विचार
कालिदास को वैदिक धर्म पर पूर्ण विश्वास है और ये वर्णाश्रम व्यवस्था को पूर्णरूप