भारतकोश
अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)

अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)

Abhijnanashakuntalam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाकवि कालिदास / डॉ. श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished540 पृष्ठ

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से मानते हैं। इन्हें धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष पर अपार श्रद्धा है। ये सभी को त्याग और तपस्या की शिक्षा देते हैं। इनको नगर निवास की अपेक्षा तपोवन का जीवन बहुत अच्छा लगता है।

ये आशुतोष भगवान् सदाशिव के परम उपासक महाकवि हैं। इन्होंने अपने तीनों नाटकों में भगवान् शङ्कर का ही स्मरण किया है और रघुवंश के मङ्गलाचरण में शिव पार्वती की वन्दना की है इनके सभी ग्रन्थों में शिव की महिमा विशेष रूप से वर्णित पाई जाती है। इनके नाटकों के भरतवाक्य से मालूम होता है कि ये भगवान् सदाशिव से विश्व कल्याण की कामना रखते थे। ये व्यक्ति की अपेक्षा समाज को अधिक महत्त्व देते हैं और सभी को लोककल्याणार्थ कार्य करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं। ये आशावादी कवि हैं, निराशावादी नहीं। ये सत्कार्यों के सम्पादन द्वारा परलोक मार्ग को सुगम बनाना मानव जीवन का वास्तविक सदुपयोग और अन्तिम लक्ष्य समझते हैं। अभिज्ञानशाकुन्तल के भरत वाक्य में भगवान् सदाशिव से पुनर्जन्म को दूर करने के लिए प्रार्थना करते हुए कहते हैं—

“ममापि च क्षपयतु नीललोहितः पुनर्भवं परिगतशक्तिरात्मभूः।”

कवि ने कुमारसंभव के द्वितीय सर्ग में देवताओं की प्रार्थना का उत्तर देते समय स्वयं ब्रह्मा जी से कहवाया है मुझे और विष्णु को भी शिवजी के प्रभाव का ज्ञान नहीं होता—

स हि देवः परं ज्योतिस्तमः पारे व्यवस्थितम्। परिच्छिन्नप्रभावर्द्धि न मया न च विष्णुना ॥ २।१५

अतः कालिदास के शिवोपासक होने में किसी प्रकार का सन्देह नहीं है।

कालिदास भारतीय संस्कृति के सच्चे उपासक महाकवि थे। इसका आभास उनके काव्यों में स्थान-स्थान पर मिलता है। जैसे रघुवंश महाकाव्य में कालिदास ने रघुवंशी राजाओं को निमित्त बनाकर उदारचरित पुरुषों का स्वभाव पाठकों के समक्ष रखा है और उनकी योग्यता का वर्णन करने के बहाने कितने ही प्रकार के रमणीय उपदेश प्राणिमात्र के लिए दिये हैं। चक्रवर्ती राजा दिलीप द्वारा २१ दिन महर्षि वशिष्ठ की नन्दिनी गौ की सेवा कराकर वरदान के रूप में पुत्रप्राप्तिरूप मनोरथ सिद्धि एवं इन्द्र द्वारा दिलीप के आश्वमेधिक अश्वहरण के बाद गोमूत्र को नेत्र में लगाते ही रघुको दिव्य दृष्टि प्राप्त करना आदि से गो-सेवा का अलौकिक फल दिखाकर संसार को गो-सेवा से अपने-अपने मनोरथ को पूर्ण करने का निर्देश किया है, और गो-सेवा की अपूर्व महिमा बतलाई है। इसी प्रकार महर्षि वरतन्तु के शिष्य कौत्स को अपार धनराशि देकर अज को पुत्र रूप में प्राप्त करना ब्राह्मणभक्ति एवं दानशक्ति का अनुपम उदाहरण है। श्रीराम के चरित्र के समान भारतीय संस्कृति के आदर्श का दिग्दर्शन तो कहीं अन्यत्र उपलब्ध ही नहीं हो सकता है। महाराजा रघु द्वारा कौत्सको सत्कार तथा अपार धनराशि देकर भारतीयों का अनुपम आदर्श अतिथि-सत्कार और विद्या-दान के प्रति अटल श्रद्धा व्यक्त की है। कुमारसम्भव में दिव्य नायक का दिव्य चरित्र वर्णित है, किन्तु लौकिक काम और शृङ्गार रस की सूक्ष्म भावनाओं का वर्णन करने के लिए उन्होंने खण्डकाव्य मेघदूत लिखा है।

अपने अभिज्ञानशाकुन्तल नाटक में तो इन्होंने आदर्श राजा दुष्यन्त तथा आदर्श नारी शकुन्तला का मार्मिक चित्र खींचकर यह दिखा दिया है कि भारतीय नारी किसी कारण-वश पति द्वारा अपमानित होने पर भी उसका अपमान नहीं करती अपितु संयमद्वारा पुनः