भारतकोश
अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)

अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)

Abhijnanashakuntalam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाकवि कालिदास / डॉ. श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished540 पृष्ठ

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उसे अनुकूल कर लेती है। शकुन्तला में कुलपति कण्व के उपदेश-सन्देश में लोक कल्याण की कामना का भाव तो सार्वभौम ही है।

यद्दुष्करं यद् दुरापं यद् दुर्गं यच्च दुस्तरम् ।
तत्सर्वं तपसा साध्यं तपो हि दुरतिक्रमः ॥

कुमारसम्भव में तीव्र तपस्या के द्वारा पार्वती के शिव विषयक मनोरथ की सफलता का वर्णन करते हुए कविवर कालिदास ने तपस्या में अपना अटल विश्वास व्यक्त किया है। इनका मत है कि जो वस्तु किसी प्रकार से भी प्राप्त नहीं हो सकती, वह तपस्या द्वारा ही प्राप्त की जा सकती है।

उग्र तपस्या द्वारा प्राप्त शक्ति से उद्दण्ड होकर संसार को दुःख देनेवाले वज्रनाभ के पुत्र दुर्दान्त तारकासुर को मारने के लिए देवताओं का प्रयास विश्व-कल्याण की भावना की ओर संकेत करता है।

कालिदास के ग्रन्थों का अनुशीलन करने से प्रतीत होता है कि उन्होंने धर्म, दर्शन, पुराण, ज्योतिष समाजशास्त्र, राजनीति, शिक्षा आदि विविध शास्त्रों का गम्भीर मनन किया था जिसके प्रभाव से पाठक चमत्कृत हो उठता है। अन्त में यही कहना पड़ता है कि लोकोत्तर महापुरुषों के हृदय को कौन जान सकता है—

लोकोत्तराणां चेतांसि को नु विज्ञातुमर्हति ।

शकुन्तलानाटक में रसविमर्श

रसव्यञ्जना की दृष्टि से अभिज्ञानशाकुन्तल का महत्त्व सर्वोपरि है। शकुन्तला में संभोग तथा विप्रलम्भ दोनों तरह का शृङ्गार है। दोनों शृंगारों की ऐसी ललित एवं हृदय-स्पर्शी मन्दाकिनी इसमें प्रवाहित हुई है कि सहृदय भावुक उसमें अवगाहन करते नहीं अघाता। फिर भी संभोग शृङ्गार अङ्गी और विप्रलम्भ शृंगार, वीर, अद्भुत, करुण, हास्य, भयानक, रौद्र, वत्सल और शान्तरस अङ्ग हैं। कुछ लोगों का कहना है कि इसमें विप्रलम्भ शृंगार अधिक व्याप्त होने के कारण उसे ही अङ्गी रस मानना चाहिए। पर यह मत ठीक नहीं है, क्योंकि संस्कृत के नाटक दुःखान्त नहीं होते, वे सुखान्त ही होते हैं।

तृतीय और सप्तम अङ्क में सम्भोग शृंगार है। शृङ्गार-रस के नाटक विप्रलम्भपूर्वक अवश्य होते हैं क्योंकि विप्रलम्भ के बाद आने वाला सम्भोग अधिक आनन्ददायक होता है। नाटक की समाप्ति पर जिस रस का मन पर प्रभाव हो उसे ही प्रधान रस मानना सम्प्रदाय सिद्ध है। अन्तिम सप्तम अङ्क में होने वाले नायक-नायिका के स्थायी मिलन के सुख का प्रभाव प्रेक्षकों के मन पर अधिक काल तक स्थायी रहता है। अतः अभिज्ञानशाकुन्तल को सम्भोग शृङ्गार-रस प्रधान ही मानना तर्कसंगत और न्यायोचित प्रतीत होता है। पहले के तीन अङ्कों में शृंगार का साम्राज्य है फिर भी प्रसङ्ग से अनेक रसों का उसमें मिश्रण है। जैसे—

प्रथम अङ्क के आरम्भ में दुष्यन्त के सामने अपनी जान बचाने के निमित्त भगाते हुए मृग के तथा अन्त में सैनिक गज द्वारा किये गये उपद्रव में भयानक रस, द्वितीय अङ्क में विदूषक के विनोदी भाषण एवं अङ्गभङ्ग में हास्य रस, पुनः तृतीय अङ्क के अन्त में राक्षसों के विघ्नवर्णन में भयानक रस का शृंगार में मिश्रण हुआ है। चतुर्थ अङ्क में आकाशवाणी तथा वनदेवता द्वारा दिये गये वस्त्र और आभूषणों के वर्णन में अद्भुतरस की छटा है।