भारतकोश
अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)

अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)

Abhijnanashakuntalam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाकवि कालिदास / डॉ. श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished540 पृष्ठ

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किन्तु उस अंक का प्रधान रस करुण ही है। पाचवें अंक में दुष्यन्त तथा शकुन्तला के वाक्कलह के मनोरम प्रसंग के साथ-साथ राजा के निराकरण से सन्तप्त शकुन्तला के भाषण में रौद्र रस, आगे उसके असहाय स्थिति में करुण तथा अन्त में अप्सरातीर्थ के पास उसके अदृश्य हो जाने से अद्भुतरस है। छठे अंक में करुण तथा विप्रलम्भ शृंगार का परिपोष उत्तम हुआ है। राजा के करुण शृंगार को विदूषक के हास्य रस में जोड़ दिया गया है। अन्त के सप्तम अङ्क में सर्वदमन एवं राजा दुष्यन्त की भेंट के प्रसंग में अद्भुत और वत्सल तथा अन्त में कश्यप ऋषि के सान्निध्य में अनेक रसों का अनुभव करने पर भी शान्त रस में पर्यवसान हो जाता है।

कालिदास का प्रकृति प्रेम

कालिदास के काव्यों में प्रकृति की छवियों के मनोरम एवं प्रभावशाली चित्रण उपलब्ध होते हैं।

कालिदास प्रकृति को सजीव एवं सचेतन मानते हैं। मेघदूत में अचेतन मेघ दौत्य कर्म ही नहीं करता, बल्कि वहिः प्रकृति विरही यक्ष विरहिणी यक्षप्रिया की समस्त मर्मद्रावक वेदना को परस्पर बाँट देता है। कालिदास की पार्वती और शकुन्तला प्रकृति सुकुमारियां हैं। प्रकृति और मनुष्य का आत्मीयता बोध कालिदास के अनेक सन्दर्भों में व्यक्त हुआ है।

कालिदास प्रकृति को मनुष्य जीवन से भिन्न वस्तु नहीं समझते। उनके विचार में दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। उन्हें मनुष्य जीवन में प्रकृति का तथा प्रकृति में मनुष्य जीवन का दर्शन मिलता है। कालिदास की कुमारियां लता-पादपों को स्नेह से सींचती हैं, और विनोदपूर्ण संलाप भी करती रहती हैं। निसर्गसुन्दरी शकुन्तला के सान्निध्य में उन्हें आम्रवृक्ष लता-युक्त दिखाई पड़ता है। अभिज्ञान शाकुन्तल के प्रथम अङ्क में प्रियम्वदा कहती है—सखि शकुन्तले ! थोड़ी देर यहाँ ही ठहरो तुम्हारे पास रहने से यह आम्र का वृक्ष लता-सनाथ सा दीखता है—त्वया समीपस्थितया लतासनाथ इव अयं चूतवृक्षः प्रतिभाति। वे नवमल्लिका तथा सहकार वृक्ष में वरवधू का सम्बन्ध बताते हैं—अनसूया शकुन्तला से कहती है—सखि शकुन्तले ! यह नवमल्लिका आम्र वृक्ष की स्वयम्वरवधू है। तुम्हीं ने तो इसका नाम वनज्योत्स्ना रखा है, क्या तू इसे भूल गई ? हला शकुन्तले इयं स्वयम्वरवधूः सहकारस्य त्वया कृतनामधेया वनज्योत्स्नेति नवमल्लिका एनां विस्मृतासि ?

पुनः अनसूया कहती है—अरी शकुन्तले ! मैं समझती हूँ कि पिताजी इन आश्रम के पौधों को तुमसे अधिक प्यार करते हैं, नहीं तो चमेली कली जैसे कोमल अङ्गवाली तुम्हें इनके थालों में पानी भरने का काम नहीं देते। इस पर शकुन्तला कहती है—में केवल पिताजी को आज्ञा से ही इन्हें नहीं सींचती हूँ, किन्तु मैं भी इन्हें सहोदर जैसा प्यार करती हूँ—न केवलं तातनियोग एव ममापि एतेषु सहोदरस्नेहः।

शकुन्तला केसर के वृक्ष को देखकर पुनः कहती है—सखि ! यह केसर का वृक्ष पवन के झोंके से हिलती हुई पत्ती रूपी अङ्गुलियों से मुझे बुला रहा है। जाऊँ, इसका भी मन रख दूँ—एष वातेरित पल्लवाभिरङ्गुलिभिः किमपि व्याहरतीव मां चूतवृक्षः। शकुन्तला के चतुर्थ अंश में तो प्रकृति और मनुष्य दोनों एकदम समीप आ गये हैं। महर्षि कण्व ने तपोवन के वृक्षों से शकुन्तला के उनके प्रति मधुर स्नेह का स्मरण करते हुए