भारतकोश
अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)

अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)

Abhijnanashakuntalam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाकवि कालिदास / डॉ. श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished540 पृष्ठ

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अनुरोध किया है कि वे उसे पतिगृह जाने की अनुमति प्रदान करें—सेयं याति शकुन्तला पतिगृहं सर्वैरनुज्ञायताम्। अनन्तर शकुन्तला वनज्योत्स्ना लता को याद कर उनके निकट जाकर कहती है—वनज्योत्स्ने ! आम्रसंगता होने पर भी आज तुम अपनी शाखा रूपी भुजाओं को इधर फैलाकर एक बार मेरा प्रत्यालिङ्गन करो। आज मैं तुमसे बहुत दूर जा रही हूँ। शकुन्तला जाते समय वनज्योत्स्ना को अपनी दोनों सहेलियों के हाथ सौंपती है—हला ! एषा द्वयोर्युवयो हस्ते निक्षेपः ।

कालिदास के मत से प्रकृति की गोद में विहार करते समय मनुष्य के जीवन का पूरा आनन्द मिलता है और प्रकृति के सच्चे सौन्दर्य का दर्शन होता है। शकुन्तला के प्रथम दर्शन के समय राजा दुष्यन्त के मुख से सहसा निकल पड़ता है कि यदि महलों के लिए दुर्लभ यह स्वरूप आश्रमवासिनी बालिकाओं में दीख रहा है तो मानो वनलताओं ने अपने गुणों से उद्यान की लताओं को जीत कर लिया है—

शुद्धान्तदुर्लभमिदं वपुराश्रमवासिनो यदि जनस्य ।
दूरीकृता खलु गुणैरुद्यानलता वनलताभिः ॥

इनके मत से कृत्रिम वातावरण की अपेक्षा वन के प्राकृतिक वातावरण में अधिक सौन्दर्य है। कालिदास के विचार से प्रकृति जड़ पदार्थ नहीं है उन्हें वह भी चेतनों सा व्यवहार करती दिखाई पड़ती है। जैसे चेतन प्राणी दूसरे के सुख-दुःख में सहायता करते हैं वैसे ही प्रकृति भी करती है। शकुन्तला की विदाई के समय तपोवन के वृक्ष विविध प्रकार के वस्त्र एवं आभूषण देकर कण्व का सहयोग करते हैं। पर्वतों के वर्णन में कालिदास अधिक सावधान हैं। मेघदूत में रामगिरि और अलका के मध्यमार्ग में पड़ने वाले पर्वतों का रम्य वर्णन है। कुमारसम्भव में भी हिमालय के वर्णन में उन्होंने कमाल कर दिया है। इसी प्रकार नदी वन आश्रमों के वर्णन में वे तन्मय दिखाई पड़ते हैं। गंगानुराग उन्हें उल्लसित कर देता है। वृक्षों के वर्णन में इन्हें आनन्द मिलता है। कुसुमों की सुषमा से वे अभिभूत हैं। कालिदास का प्रकृतिज्ञान केवल सहानुभूति मूलक ही नहीं है, अपितु सूक्ष्मतया सटीक है। हिमालय की हिमराशि, पवन का सङ्गीत, एवं गंगा की शक्तिशालिनी धारा ही नहीं, किन्तु छोटी-छोटी सरिताएँ विटप पुष्प भ्रमर आदि भी उनकी सृष्टिव्यापिनी दृष्टि से ओझल नहीं हैं। कालिदास के आराध्यदेव भगवान् सदाशिव हैं उन्हें उनका दर्शन भी प्रकृति के आठ रूपों में ही होता है। इसीलिए उन्होंने शकुन्तला के मङ्गलाचरणमें अष्टमूर्ति भगवान् शङ्कर से ही विश्वकल्याण की कामना के साथ-साथ अपना भी कल्याण चाहा है—

प्रत्यक्षाभिः प्रपन्नस्तनुभिरवतु वस्ताभिरष्टाभिरीशः ।

इन्होंने रघुवंश में समुद्र से नदियों के मिलने का दृश्य अत्यन्त सरस चित्रित किया है। जैसे दूसरे लोग केवल स्त्रियों का अधर पान करते हैं, अपना अधर उन्हें नहीं पिलाते, किन्तु समुद्र का ढंग निराला है, क्योंकि जब नदियाँ ढीठ होकर अपना मुँह इसके सामने बढ़ाती हैं तब यह बड़ी चतुरता से अपना तरङ्गरूपी अधर उन्हें पिलाता है उनका अधर स्वयं पीता है—

मुखार्पणेषु प्रकृतिप्रगल्भाः स्वयं तरङ्गाधरदानदक्षः ।
अनन्यसामान्यकलत्रवृत्तिः पिबत्यसौ पाययते च सिन्धुः ॥