भारतकोश
संग्रह पर लौटें

अभिज्ञानशाकुन्तलम् (विमला-चन्द्रकला संस्कृत-हिन्दी व्याख्या सहित)

Abhijnanashakuntalam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाकवि कालिदास / डॉ. श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished540 पृष्ठ

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अनुरोध किया है कि वे उसे पतिगृह जाने की अनुमति प्रदान करें—सेयं याति शकुन्तला पतिगृहं सर्वैरनुज्ञायताम्। अनन्तर शकुन्तला वनज्योत्स्ना लता को याद कर उनके निकट जाकर कहती है—वनज्योत्स्ने ! आम्रसंगता होने पर भी आज तुम अपनी शाखा रूपी भुजाओं को इधर फैलाकर एक बार मेरा प्रत्यालिङ्गन करो। आज मैं तुमसे बहुत दूर जा रही हूँ। शकुन्तला जाते समय वनज्योत्स्ना को अपनी दोनों सहेलियों के हाथ सौंपती है—हला ! एषा द्वयोर्युवयो हस्ते निक्षेपः ।

कालिदास के मत से प्रकृति की गोद में विहार करते समय मनुष्य के जीवन का पूरा आनन्द मिलता है और प्रकृति के सच्चे सौन्दर्य का दर्शन होता है। शकुन्तला के प्रथम दर्शन के समय राजा दुष्यन्त के मुख से सहसा निकल पड़ता है कि यदि महलों के लिए दुर्लभ यह स्वरूप आश्रमवासिनी बालिकाओं में दीख रहा है तो मानो वनलताओं ने अपने गुणों से उद्यान की लताओं को जीत कर लिया है—

शुद्धान्तदुर्लभमिदं वपुराश्रमवासिनो यदि जनस्य ।
दूरीकृता खलु गुणैरुद्यानलता वनलताभिः ॥

इनके मत से कृत्रिम वातावरण की अपेक्षा वन के प्राकृतिक वातावरण में अधिक सौन्दर्य है। कालिदास के विचार से प्रकृति जड़ पदार्थ नहीं है उन्हें वह भी चेतनों सा व्यवहार करती दिखाई पड़ती है। जैसे चेतन प्राणी दूसरे के सुख-दुःख में सहायता करते हैं वैसे ही प्रकृति भी करती है। शकुन्तला की विदाई के समय तपोवन के वृक्ष विविध प्रकार के वस्त्र एवं आभूषण देकर कण्व का सहयोग करते हैं। पर्वतों के वर्णन में कालिदास अधिक सावधान हैं। मेघदूत में रामगिरि और अलका के मध्यमार्ग में पड़ने वाले पर्वतों का रम्य वर्णन है। कुमारसम्भव में भी हिमालय के वर्णन में उन्होंने कमाल कर दिया है। इसी प्रकार नदी वन आश्रमों के वर्णन में वे तन्मय दिखाई पड़ते हैं। गंगानुराग उन्हें उल्लसित कर देता है। वृक्षों के वर्णन में इन्हें आनन्द मिलता है। कुसुमों की सुषमा से वे अभिभूत हैं। कालिदास का प्रकृतिज्ञान केवल सहानुभूति मूलक ही नहीं है, अपितु सूक्ष्मतया सटीक है। हिमालय की हिमराशि, पवन का सङ्गीत, एवं गंगा की शक्तिशालिनी धारा ही नहीं, किन्तु छोटी-छोटी सरिताएँ विटप पुष्प भ्रमर आदि भी उनकी सृष्टिव्यापिनी दृष्टि से ओझल नहीं हैं। कालिदास के आराध्यदेव भगवान् सदाशिव हैं उन्हें उनका दर्शन भी प्रकृति के आठ रूपों में ही होता है। इसीलिए उन्होंने शकुन्तला के मङ्गलाचरणमें अष्टमूर्ति भगवान् शङ्कर से ही विश्वकल्याण की कामना के साथ-साथ अपना भी कल्याण चाहा है—

प्रत्यक्षाभिः प्रपन्नस्तनुभिरवतु वस्ताभिरष्टाभिरीशः ।

इन्होंने रघुवंश में समुद्र से नदियों के मिलने का दृश्य अत्यन्त सरस चित्रित किया है। जैसे दूसरे लोग केवल स्त्रियों का अधर पान करते हैं, अपना अधर उन्हें नहीं पिलाते, किन्तु समुद्र का ढंग निराला है, क्योंकि जब नदियाँ ढीठ होकर अपना मुँह इसके सामने बढ़ाती हैं तब यह बड़ी चतुरता से अपना तरङ्गरूपी अधर उन्हें पिलाता है उनका अधर स्वयं पीता है—

मुखार्पणेषु प्रकृतिप्रगल्भाः स्वयं तरङ्गाधरदानदक्षः ।
अनन्यसामान्यकलत्रवृत्तिः पिबत्यसौ पाययते च सिन्धुः ॥

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कालिदास का शास्त्रीय ज्ञान

महाकवि कालिदास की रचनाओं के अनुशीलन से ज्ञात होता है कि उन्हें संस्कृत साहित्य के मौलिक ग्रन्थों का पर्याप्त ज्ञान था। उनकी कृतियों में यत्र-तत्र प्रसंगवश उपनिषद्, पुराण, महाभारत, दर्शन, धर्मशास्त्र, ज्योतिष, व्याकरण, साहित्यशास्त्र आदि के सिद्धान्तों के स्पष्ट उल्लेख उपलब्ध होते हैं। महाकाव्य रघुवंश के मङ्गलाचरण—

वागर्थाविव सम्पृक्तौ वागर्थप्रतिपत्तये।
जगतः पितरौ वन्दे पार्वतीपरमेश्वरौ॥

में उन्होंने काव्य का लक्षण “शब्दार्थौ काव्यम्” निर्दिष्ट किया है। इसी प्रकार वे अपने व्याकरण ज्ञान की प्रौढता को भी व्यक्त करते चलते हैं। वागार्थाविव इस अंश में ‘इवेन सह समासो विभक्त्यलोपश्च’ इस वार्तिक का तथा ‘पितरौ’ में “पिता मात्रा १।२।७०” इस पाणिनीय सूत्र का स्मरण दिलाते हुए वे अपनी व्याकरण विदग्धता को प्रदर्शित करते हैं। इसी प्रकार पन्द्रहवें सर्ग में बालिवध के प्रसङ्ग पर व्याकरण में उपमा की हृदयाकर्षक छटा दिखाते हैं—

स हत्वा बालिनं वीरस्तत्पदे चिरकाङ्क्षिते।
धातोः स्थान इवादेशं सुग्रीवं सन्न्यवेशयत्॥ १२।५८

अर्थात् उस राम ने बालि को मारकर धातु के स्थान पर आदेश के समान (अस् धातु के स्थान पर ‘अस्तेर्भू’ सूत्र से विहित भू आदेश के समान तथा पा धातु से पाघ्राध्मा सूत्र से विहित आदेश के समान) सुग्रीव को चिरकाल से अभिलषित उस बालि के स्थान पर रखा। रघुवंश के तृतीय सर्ग में उनका ज्योतिष विषयक परिपक्व ज्ञान परिलक्षित होता है—

ग्रहैस्ततः पञ्चभिरुच्चसंश्रयैरसूर्यगैः सूचितभाग्यसम्पदम्।
असूूत पुत्रं समये शचीसमा त्रिसाधना शक्तिरिवार्थमक्षयम्॥ ३।१३

अर्थात् अनन्तर इन्द्राणी के समान रानी सुदक्षिणा ने प्रसव का समय (दसवां महीना) होने पर उच्च स्थान में स्थित सूर्य के सान्निध्य से अस्त को नहीं प्राप्त हुए पांच ग्रहों के द्वारा जिसकी भाग्य सम्पत्ति सूचित हो रही है। ऐसे पुत्र को प्रभाव, उत्साह एवं मन्त्र इन तीन उपायों से सम्पन्न होने वाली शक्ति जैसे अक्षय अर्थ को उत्पन्न करती है वैसे ही उत्पन्न किया।

शकुन्तला के पञ्चम अङ्क में रानी हंसपदिका के सस्वर गीत को सुनकर राजा दुष्यन्त उसकी प्रशंसा करते हुए कहते हैं कि ‘अहो रागपरिवाहिणी गीतिः’ रघुवंश के प्रथम सर्ग में रानी सुदक्षिणा और राजा दिलीप को अपने कुलगुरु महर्षि वशिष्ठ के आश्रम में जाते समय कवि ने अपनी संगीत विदग्धता का परिचय देते हुए कहा है—

मनोऽभिरामा शृण्वन्तौ रथनेमिस्वनोन्मुखैः।
षड्जसंवादिनीः केका द्विधाभिन्ना शिखण्डिभिः॥ १ ३६

अर्थात्—रथ के चक्रप्रान्ति के शब्द को सुनकर ऊपर मुख किये हुए मयूरों द्वारा दो प्रकार की हुई षड्ज स्वर का अनुसरण करने वाली तथा मन को प्रसन्न करने वाली वाणी को सुनते हुए वे दोनों सुदक्षिणा और दिलीप चले।

कुमार संभव के द्वितीय सर्ग में ब्रह्म और जगत् की एकात्मकता, ब्रह्म की जगत् रूप

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कार्य के रूप में परिणत आदि बातें बड़ी चारुता के साथ काव्यात्मक सरल शैली में वर्णित की गई हैं। जैसे—

नमस्त्रिमूर्तये तुभ्यं प्राक् सृष्टेः केवलात्मने । गुणत्रयविभागाय पश्चात् भेदमुपेयुषे ॥ २।४

अर्थात् हे भगवन् ! संसार को रचने के पहले एक ही रूप में रहने वाले पर, जब संसार रचने लगते थे उस समय सत्त्व, रज एवं तम तीन गुण उत्पन्न करके ब्रह्मा, विष्णु और महेश नाम से तीन रूप के बन जाने वाले आपको प्रणाम है।

इसी प्रकार रघुवंश के प्रथम सर्ग में—

वैवस्वतो मनुर्नाम माननीयो मनीषिणाम् । आसीन्महीक्षितामाद्यः प्रणवश्छन्दसामिव ॥ १।११

आदि श्लोकों से वे यज्ञ आदि-कर्मकलाप के ज्ञान के साथ ही वेदोच्चारणविधि का प्रचार भी सूचित करते हैं तथा उनकी कृतियों में नीतिशास्त्र, अर्थशास्त्र तथा पुराणों की प्रधान प्रधान बातें यथावसर व्यक्त होती रहती हैं । रघुवंश में रघु और इन्द्र के साथ युद्ध से तथा अभिज्ञानशाकुन्तल के सप्तम अङ्क में विदूषक पर आक्रमण के समय दुष्यन्त के शब्दवेधी बाण चलाने की कला से कविवर कालिदास के युद्धविषयक ज्ञान की सूचना मिलती है । तथा शकुन्तला के षष्ठ अङ्क में तूलिका से दुष्यन्त द्वारा चित्रित शकुन्तला विषयक चित्रकला और मूर्तिकला अनुशीलन करने पर कालिदास की चित्रकला का पर्याप्त ज्ञान प्रतीत होता है । इस प्रकार रघुवंश कुमारसम्भव शकुन्तला आदि में विभिन्न शास्त्रों के ज्ञान के पर्याप्त उदाहरण भरे पड़े हैं ।

संस्कृत नाटकों के उद्भव तथा विशेषता का विवेचन

संस्कृत साहित्य में नाटकों की एक विशिष्ट परम्परा रही है। लोकप्रियता के कारण भारत में नाट्यकला का प्रयोग अत्यन्त प्राचीन काल से होता चला आया है। ऋग्वेद के सूक्तों में सोमविक्रय के समय मनोरञ्जनात्मक अभिनय का संकेत प्राप्त होता है । पुरुरवा-उर्वशी, यम-यमी, इन्द्र-इन्द्राणी, वृषाकपी आदि के संवाद सूक्तों में नाटकीय कथनोपकथन उपलब्ध होते हैं। यजुर्वेद में शैलूष शब्द का स्पष्ट उल्लेख है, जो नट अथवा अभिनेता का समानार्थी है। वाल्मीकीय रामायण में नट, नर्तक तथा शैलूष शब्दों का उल्लेख है ।

इस प्रकार तत्कालीन जन जीवन में धार्मिक अवसर, संगीत समारोह तथा नृत्योत्सवों से नाटक का विशेष सम्बन्ध था ।

उत्तरवर्ती साहित्य में नाट्यकला की शिल्पविधियों का पूरा इतिहास दिखाई देता है । रामायण के एक प्रसंग में कहा गया कि नटों, नर्तकों और गायकों की मण्डलियों की कर्ण सुखद वाणियों को जनता पूरी तन्मयता से सुनती थी—

नटनर्तकसंघानां गायकानां च गायताम् । यतः कर्णसुखा वाचः शुश्राव जनता ततः ॥

महाभारत में नट, नर्तक, गायक, सूत्रधार आदि का निर्देश है । हरिवंश पुराण में रामचरित नाटक प्रदर्शित किये जाने का संकेत है । महाभारत के अनुसार प्रद्युम्नविवाह के प्रसंग में वसुदेव जी के यज्ञ के अवसर पर भद्रनामक नट ने अपने आकर्षक नाट्य-प्रदर्शन से उपस्थित ऋषि-महर्षियों को प्रसन्न किया था जिसके फलस्वरूप उसने आकाश-

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विचरण तथा स्वेच्छया रूप धारण करने का वरदान प्राप्त किया था। महर्षि पाणिनी ने अपनी अष्टाध्यायी में शिलालि तथा कृशाश्व के द्वारा रचित नाट्य सूत्रों का उल्लेख किया है। भगवान् पतञ्जलि ने अपने महाभाष्य में कंसवध तथा बालिवध नामक नाटकों के अभिनय का वर्णन किया है। वात्स्यायन ने अपने कामसूत्र में नागरिकों के मनोवर्णन करते हुए नटों के द्वारा अभिनीत नाटकों के प्रदर्शन का उल्लेख किया है। कौटिल्य के अर्थशास्त्र के अध्ययन से पता चलता है कि ललित कला की शिक्षा के लिए उस समय राज्य की ओर से पूर्ण प्रबन्ध था। इन बातों से प्रमाणित होता है कि वैदिक काल से ईसा की प्रथम शताब्दी तक हमारे देश में नाटकों का अभिनय क्रमशः चला आ रहा था।

इसलिए यह निर्विवाद सत्य है कि संस्कृत साहित्य में नाटकों के निर्माण की परम्परा बहुत पुरानी है और आदि काल से ही भारतीय जन जीवन के मनोरंजन के लिए नाटकों को श्रेष्ठ माध्यम के रूप में अपनाया जाता था।

भरत मुनि ने अपने नाट्यशास्त्र में जो नाटकीय कला की उत्पत्ति का विवरण उपस्थित किया है उसके अनुसार इन्द्रादि-देवताओं के अनुरोध पर स्वयं ब्रह्माजी ने ऋग्वेद से पाठ, यजुर्वेद से अभिनय, सामवेद से गान, और अथर्ववेद से रस लेकर नाट्यवेद नामक पञ्चम वेद की रचना की तथा धर्म, क्रीडा, हास्य, युद्ध आदि भावों का प्रदर्शन इसका विषय कह कर इसे देवता और दैत्य दोनों के लिए ग्राह्य बताया और नाट्यशास्त्र में अभिनय के लिए वर्ग, आयत, या त्रिभुज के आकार वाले प्रेक्षागृहों के निर्माण की नियमविधि का उल्लेख किया है। इस प्रकार नाट्यकला का मूल सम्बन्ध धर्म से था, आगे चलकर इसने स्वतन्त्र साहित्यिक रूप ग्रहण कर लिया। संस्कृत के नाटककारों ने अपने नाटकों की कथावस्तु धर्म ग्रन्थों से लेकर जनता की रुचि में ढालकर देश, काल और परिस्थितियों के अनुसार जनरञ्जन की दृष्टि से नाटकों की योजना की। भरत मुनि के मतानुसार नाट्य तीनों लोकों के भावों का अनुकरण है त्रैलोक्यस्य सर्वस्य नाट्यं भावानुकीर्तनम्। भरतमुनि का सिद्धान्त है कि नाटक में सभी प्रकार का ज्ञान, शिल्प, विद्याएं और शास्त्र समन्वित रहते हैं। वह वेदविद्या है इतिहास है और उसमें योग सदाचार एवं समाज को विनोद प्रदान करने के साधन विद्यमान हैं। इस मत का अनुमोदन महाभाष्य के कंसवध और बालिवध के अभिनय के वर्णन में किया गया है—

न तज्ज्ञानं न तच्छिल्पं न सा विद्या न सा कला। न स योगो न तत्कर्म नाट्येऽस्मिन् यन्न दृश्यते ॥ १।१०६

पाश्चात्य विद्वानों ने इस परम्परानुमोदित मान्यता को अस्वीकार करते हुए अन्यान्य मूल कारणों की उद्भावना की। डा० कीथ के मतानुसार प्राकृतिक परिवर्तनों को जन-साधारण के सामने मूर्तरूप दिखाने की अभिलाषा से ही नाटकों का प्रादुर्भाव हुआ।

जर्मनी के विद्वान् पिशेल ने नाटकों की उत्पत्ति पुत्तलिका नृत्य से बताई है। उसके कथनानुसार उस नृत्य की उत्पत्ति भारतवर्ष में हुई और यहां से इसका प्रचार एवं प्रसार अन्य देशों में हुआ। सूत्रधार एवं स्थापक जैसे शब्दों से इस मत की पुष्टि की गई है। डा० लूडर्स के मत से नाटकों की उत्पत्ति छाया-नाटकों से हुई। इसका समर्थन दूताङ्गद नाम छाया-नाटक से किया गया। नेपाल आदि देशों में प्रचलित इन्द्रध्वज महोत्सव से नाटकों की उत्पत्ति मानी। अनेकों ने सम्वाद सूत्रों से नाट्य का उद्गम प्रतिपादित किया है।

वस्तुतः संस्कृत नाटक भारतीय प्रतिभा की स्वतन्त्र सूझ है और अभिनय की कला में

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भी वह स्वतन्त्र उद्भावना के आश्रित रहा है। संस्कृत के प्राचीन नाटकों के रंगमञ्च पर बालकों के द्वारा नियोजन किये जाने के उदाहरण उपलब्ध हैं। जैसे शकुन्तला का सर्वदमन शेर के बच्चे से खेलते हुए दिखाया गया है। संस्कृत नाटकों में विभिन्न पात्रों के लिए विभिन्न प्रकार की भाषाओं का उपयोग है। नायक तथा प्रमुख पात्र संस्कृत बोलते हैं लेकिन स्त्रियां एवं निम्नकोटि के पात्र प्राकृत के भिन्न-भिन्न रूपों का व्यवहार करते हैं। इस प्रकार की व्यवस्था विश्व के किसी अन्य नाटक परम्परा में प्राप्त नहीं होती।

समीक्षकों ने महाकाव्यों के अनन्तर संस्कृत नाटकों का प्रादुर्भाव भास कवि के स्वप्नवासवदत्तम् तथा प्रतिज्ञायौगन्धरायण नामक नाटकों से माना है। जिनके कथानक रामायण और महाभारत से लिये गये हैं। नाटकों की निर्माण परम्परा में भास कवि के अनन्तर कालिदास का नाम आता है। कालिदास ने अपने मालविकाग्निमित्र की प्रस्तावना में भास, सौमिल्ल, कविपुत्र आदि प्रागवर्ती नाटककारों की चर्चा की है।

संस्कृत साहित्य के उपवन में कालिदास का आगमन एक वसन्त दूत के रूप में माना गया है जिसके कारण उपवन का कोना-कोना पुष्पित हो उठा है। इन्होंने नई साज सज्जाएँ, नई दिशाएँ नये विचार अभिनव भाव, नई-नई पद्धतियाँ प्रस्तुत की हैं ये संस्कृत में सबसे बड़े कवि और सर्वश्रेष्ठ नाटककार हुए हैं।

नाटकों के क्षेत्र में कालिदास ने तीन नाटकों का प्रणयन किया है—मालविकाग्निमित्र, विक्रमोर्वशीय और अभिज्ञानशाकुन्तल। इनमें मालविकाग्निमित्र कवि की आरम्भिक कृति है, जिसमें नाटक नियमों की दृष्टि से कथानिर्वाह, घटनाक्रम, पात्रयोजना आदि सभी नाटककार के असाधारण कौशल की छाप है। अभिज्ञानशाकुन्तल उनकी अन्तिम कृति है, किन्तु उसकी गणना आज विश्व साहित्य की पहली कृति के रूप में की जाती है। प्रेम और सौन्दर्य का ऐसा सरस, हृदयग्राही एवं मर्मस्पर्शी चित्रण अन्यत्र देखने को नहीं मिलता। उसमें ओज के साथ मनोज्ञता और लघुत्व के साथ प्राञ्जलता का अद्भुत समन्वय हैं। शकुन्तला की सरलता अपराध में, दुःख में, अज्ञानता में, धैर्य में और क्षमा में परिपक्व है गम्भीर तथा स्थायी है। गेटे की आलोचना के अनुसार शकुन्तला के आरम्भिक तरुण सौन्दर्य ने मंगलमय परम परिणत सफलता लाभ करके मर्त्य को स्वर्ग के साथ संमिलित कर दिया है।

गणदास ने कहा है कि यह नाट्य देवताओं के नेत्रों का प्रसाधन करने वाला यज्ञ है। स्वयं शिवजी ने उमा से विवाह करके अपने शरीर में इसके अपने शरीर दो भाग कर दिये एक ताण्डव और दूसरा लास्य। इनमें सत्त्व, रज और तम तीनों गुण भी दिखाई पड़ते हैं। और अनेक रसों में लोकचरित लक्षित होते हैं। इसलिए भिन्न भिन्न रुचि वालों के लिए प्रायः नाटक ही एक ऐसा उत्सव है, जिससे सबको समान आनन्द मिलता है—

देवानामिदमामनन्ति मुनयः शान्तं क्रतु चाक्षुषं रौद्रेणैतदुमाकृतव्यतिकरे स्वाङ्गे विभक्तं द्विधा। त्रैगुण्योद्भवमत्र लोकचरितं नानारसं दृश्यते नाट्यं भिन्नरुचेर्जनस्य बहुधाप्येकं समाराधकम् ॥

अभिज्ञानशाकुन्तल का उत्कर्ष

कालिदास का काव्य सरस्वती का सर्वोत्कृष्ट प्रसाद अभिज्ञान शाकुन्तल है। सौन्दर्य

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की मादकता, प्रेम की निश्चलता, प्रकृतिजन्य सरलता, ऋषिकुल की उदारता, महर्षि कण्व का आदर्श वात्सल्य, दुर्वासा का निर्ममदण्ड, वासना का प्रक्षालन, आत्मा का निर्मलीकरण तथा संस्कृति के पीयूष संमिलन, श्रेयस् एवं प्रेयस् मनोग्राही ग्रन्थिबन्ध इन सभी उपादानों को एक साथ मिश्रित कर कविवर कालिदास ने अभिज्ञानशाकुन्तल में जो प्रपाणक रस तैयार किया है वह भारतीय जीवन के निमित्त नितान्त मूल्यवान् है। इस नाटक के प्रथम चार अंकों को भोग-भूमि पाँच एवं छः दो अंकों को दण्डभूमि और अन्तिम सप्तम अंक को सिद्धभूमि माना गया है। इस प्रकार यह नाटक कवि की प्रतिभा का अनुपम फल है।

अभिज्ञानशाकुन्तल में कवि की निपुणकला भारतीय संस्कृति के सौरभ में सनकर अधिक अभिराम तथा प्रभविष्णु बन गई है। महाभारत की चालाक तथा बिना शील वाली युवती शकुन्तला नाटक में लजीली सम्मानपूर्ण करुणोत्पादक नायिका में रूपान्तरित हो गई है। इसी प्रकार स्वार्थपरायण राजा दुष्यन्त जो महाभारत में नीति के अनुरोध से उसे न पहचानने का व्याज करता है वही यहां नाटक में ऐसी विस्मृति से अभिभूत चित्रित किया गया है, जिसके लिए उसकी भर्त्सना नहीं की जा सकती, उसका नैतिक चरित्र ऊँचा उठ गया है और वह पराई स्त्री सम्पर्क से विमुख एक आदर्श राजा बन गया है।

अपनी काव्यात्मक प्रतिभा के सहारे कालिदास को दो रूपों सफलता मिली है। प्रथमतः वे काव्योचित भावों के धनी हैं, जिन्हें वे बड़ी निपुणता से चरित्र के साथ मिला देते हैं तथा द्वितीयतः उनमें संयम एवं सन्तुलन की काव्यात्मक भावना है जो किसी नाटककार के लिए सफलता की आवश्यक हेतु हैं। विद्वानों का कथन है कि कालिदास ने अपने नाटकों में नाट्य शास्त्रों के विधानों का प्रायः अनुसरण किया है उनकी रचनाओं में अधिकांश नियमों का प्रतिबिम्ब झलकता है।

यद्यपि कालिदास ने संस्कृत में तीन नाटक लिखे हैं (१) मालविकाग्निमित्र (२) विक्रमोर्वशीय तथा (३) अभिज्ञानशाकुन्तल, किन्तु नाटककार के रूप में उनकी कीर्ति सर्वाङ्गसुन्दर अभिज्ञानशकुन्तल से स्थिर हो सकी है।

समालोचकों ने चरित्रचित्रण, रसपरिपाक भाषासौष्ठव, संविधान के चातुर्य की दृष्टि से अभिज्ञानशाकुन्तल को संस्कृत नाटकों में सर्वश्रेष्ठ माना है। कलकत्ता हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस सर विलियम जोंस ने एक संस्कृत के पण्डित की सहायता से १७८६ ई० में अभिज्ञानशाकुन्तल नाटक का अंग्रेजी में अनुवाद किया। जिसने यूरोपीय विद्वानों की मनोदृष्टि भारतीय नाट्य प्रतिभा की प्रतीति से चकित एवं मुग्ध कर दिया। उसके अनन्तर कई यूरोपीय भाषाओं में उसके अनुवाद भी हुए। इस समय तो विश्व की कोई भी ऐसी भाषा नहीं है, जिसमें अभिज्ञान शाकुन्तल नाटक का अनुवाद न हुआ हो।

इस नाटक के सप्तम अंक में सर्वदमन का अकृत्रिम हास्य, तोतली बोली का वर्णन तथा शेर के बच्चों के साथ बालक्रीड़ा पढ़कर शेजी नाम के एक फ्रेञ्च विद्वान् को इतना आनन्द आया कि वह नाचने लगा। विश्वविख्यात जर्मनकवि गेटे ने इस नाटक का अनुवाद पढ़कर आनन्द विभोर होकर कहा था कि यदि स्वर्ग और पृथ्वी को बातें एक जगह देखना हो तो अभिज्ञान शाकुन्तल का अध्ययन करो। इस प्रकार अभिज्ञान शाकुन्तल को लोकप्रिय होने के कारण समीक्षकों का यह कहना सर्वथा संगत प्रतीत होता है कि कालिदास के ग्रन्थों में अभिज्ञान शाकुन्तल सर्वोत्कृष्ट है—कालिदासस्य सर्वस्वमभिज्ञानशाकुन्तलम्।

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अनन्त कथारत्नों के सागर महाभारत के आधार पर कालिदास ने इस नाटक की रचना की है। कालिदास के अनुपम रचनाकौशल से यह नाटक लोकोत्तर बन गया है। इस नाटक की भाषा अत्यन्त प्रसाद युक्त और रमणीय है। इसमें उपमा अलंकार, उत्प्रेक्षा, स्वभावोक्ति, अर्थान्तरन्यास, काव्यलिङ्ग आदि अलङ्कारों की बहुलता है। इसमें कहीं भी क्लिष्टता, कल्पना की खींचातानी, दूरान्वय आदि दोष नहीं हैं। प्रत्येक पात्र के अनुरूप भाषा रखने में कवि ने पर्याप्त सावधानी रखी है। शकुन्तला तथा उसकी सखियां हमेशा लता वृक्ष आदिकों के सहवास में खेलने और रहने वाली हैं। इसलिए उनकी उक्तियों में आम्र, अतिमुक्तलता, नवमल्लिका आदि वृक्ष एवं लता का उल्लेख है। 'क इदानीं सहकारमन्तरेणातिमुक्तलतां पल्लवितां सहते' 'को नामोष्णोदकेन नवमल्लिकां सिञ्चति।' महर्षि कण्व हमेशा यज्ञ-याग से निरत और अध्यनाध्यार्पन में निमग्न रहते हैं। अतः वे ऐसे दृष्टान्तों का प्रयोग करते हैं जिनका सम्बन्ध यज्ञ एवं अध्ययन से है—'दृष्ट्या धूमाकुलितदृष्टेः यजमानस्य पावके एवाहुतिः पतिता'; 'वत्से ! सुशिष्यपरिदत्ता विद्येवाऽशोचनीया संवृत्ता।' हमेशा खाद्यलोलुप और विनोदी विदूषक के स्वभाव का प्रतिबिम्ब उसके कथन में पड़ा है—'यथा कस्यापि पिण्डखजूरैरुद्वेजितस्य तिन्तिण्यामभिलाषो भवेत् तथैव स्त्रीरत्नपरिभोगिणो भवत इयमभ्यर्थना।' किसी पात्र के भाषण में छोटे-छोटे चटकीले होने से उनको पढ़ते हुए पाठक के मन प्रसन्न हो जाता है।

तत्र श्लोकचतुष्टयम्

अभिज्ञानशाकुन्तल की विशेषता में समालोचकों का कहना है कि संस्कृत के काव्यों में नाटकों की उत्तमता है। उन सबों में अभिज्ञान शाकुन्तल अत्यन्त रमणीय है। उसमें उसका चतुर्थ अङ्क अत्युत्तम है, उसमें भी चार श्लोक आदर्श पूर्ण हैं—

काव्येषु नाटकं रम्यं तत्रापि च शकुन्तला ।
तत्राप्यङ्कस्तुरीयस्तु तत्र श्लोकचतुष्टयम् ॥

ये चारों श्लोक इस प्रकार हैं—

( १ )

यास्यत्यद्य शकुन्तलेति हृदयं संस्पृष्टमुत्कण्ठया
कण्ठस्तम्भितबाष्पवृत्तिकलुषश्चिन्ताजडं दर्शनम् ।
वैक्लव्यं मम तावदीदृशमिदं स्नेहादरण्यौकसः
पीड्यन्ते गृहिणः कथं नु तनयाविश्लेषदुःखैर्नवैः ॥ ४।२

( २ )

पातुं न प्रथमं व्यवस्यति जलं युष्मास्वपीतेषु या
नादत्ते प्रियमण्डनापि भवतां स्नेहेन या पल्लवम् ।
आद्ये वः कुसुमप्रसूतसमये यस्या भवत्युत्सवः
सेयं याति शकुन्तला पतिगृहं सर्वैरनुज्ञायताम् ॥ ४।८

( ३ )

अस्मान् साधु विचिन्त्य संयमधनानुच्चैः कुलं चात्मनः
त्वय्यस्याः कथमप्यबान्धवकृतां स्नेहप्रवृत्तिं च ताम् ।

( २९ )

सामान्यप्रतिपत्तिपूर्वकमियं दारेषु तदर्हस्या त्वया
भाग्यायत्तमत्तः परं न खलु वाच्यं वधूबन्धुभिः ॥ ४।१६

( ४ )

शुश्रूषस्व गुरून् कुरुप्रियसखीवृत्तिं सपत्नीजने
भर्तुर्विप्रकृतापि रोषणतया मा स्म प्रतीपं गमः ।
भूयिष्ठं भव दक्षिणा परिजने भाग्येष्वनुत्सेकिनी
यान्त्येवं गृहिणीपदं युवतयो वामा कुलस्याधयः ॥ ४।१७

कुछ लोग चार श्लोक इस प्रकार मानते हैं :—

( १ ) यास्यत्यद्य शकुन्तला० ( ४।५ )
( २ ) अस्मान् साधु विचिन्त्य० ( ४।१६ )
( ३ ) शुश्रूषस्व गुरून् ( ४।१७ )
( ४ ) अभिजनवतो भर्तुः श्लाघ्ये स्थिता गृहिणीपदे
विभवगुरुभिः कृत्यैस्तस्य प्रतिक्षणमाकुला ।
तनयमचिरात् प्राचीवार्कं प्रसूय च पावनं
मम विरहजां न त्वं वत्से ! शुचं गणयिष्यसि ॥ ४।१८

अथवा—

भूत्वा चिराय चतुरन्तमहीसपत्नी
दौष्यन्तिमप्रतिरथं तनयं निवेश्य ।
भर्त्रा तदर्पितकुटुम्बभरेण सार्धं
शान्ते करिष्यसि पदं पुनराश्रमेऽस्मिन् ॥ ४।१६

अभिज्ञानशाकुन्तल नामकरण का कारण

हस्तिनापुर के चक्रवर्ती राजा दुष्यन्त ने कुलपति कण्व की पोष्यपुत्री शकुन्तला से उनके आश्रम में ही गान्धर्वविधि से विवाह करके अपनी राजधानी को लौटते समय शकुन्तला को अपने नामाक्षरों से अङ्कित एक अंगूठी देकर कहा था कि प्रिये ! इसमें प्रति-दिन एक-एक अक्षर गिनना, जिस दिन अन्तिम अक्षर आयेगा उसी दिन तुमको लेने के लिए मेरा कोई विश्वासी व्यक्ति आयेगा, तब तुम मेरे पास आ जाना ।

उस समय महर्षि कण्व आश्रम पर उपस्थित नहीं थे । शकुन्तला के निमित्त शान्ति के लिए सोमतीर्थ गये हुए थे । आने पर जब उन्हें शकुन्तला के विवाह का समाचार मिला तब उन्होंने शकुन्तला को राजा के पास भेजवा दिया, किन्तु महर्षि दुर्वासा के शाप के कारण राजा उसे पहचान न सका । शकुन्तला ने राजा की दी हुई अंगूठी दिखाकर उसे बीते हुए वृत्तान्त का स्मरण दिलाना चाहा, किन्तु वह अंगूठी उसकी अंगुलि में नहीं थी, दैवात् मार्ग में शक्रावतार या शचीतीर्थ का वन्दन करते समय जल में गिर चुकी थी । निराश होकर शकुन्तला जब राजमहल से बाहर निकली तो, उसकी माँ मेनका अप्सरा ने, एक तेजोमयमूर्ति बनाकर उसे लेकर किंपुरुषवर्ष में, वर्तमान हेमकूट पर्वत पर महर्षि कश्यप के आश्रम पर रख दिया । बाद वहीं उसे सर्वदमन नाम का पुत्र उत्पन्न हुआ, जिसका पीछे भरत नाम पड़ा ।

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इसके अनन्तर राजपुरुषों को एक धीवर के पास वह अंगूठी मिली, उसे चोर समझ-कर कोतवाल ने उस घटना को राजा के पास उपस्थित किया। उस अंगूठी को देखते ही राजा दुष्यन्त को शकुन्तला के साथ गान्धर्व-विवाह का स्मरण हो आया। उसे अपनी भूल पर पश्चात्ताप होने लगा तथा तब से वह शकुन्तला के विरह में दुःखी रहने लगा। इस प्रकार इस नाटक के पञ्चम अंक में अंगूठी रूपी अभिज्ञान से शकुन्तला के पहचाने जाने के वृत्तान्त होने के कारण इस नाटक को अभिज्ञान शाकुन्तल कहते हैं।

इसमें दो अंश हैं—एक अभिज्ञान और दूसरा शाकुन्तल। अभिज्ञान का अर्थ है पहचानने का साधन—अभिज्ञायतेऽनेनेति अभिज्ञानम्। शाकुन्तलं का अर्थ है शकुन्तला विषयक या शकुन्तला सम्बन्धी—शकुन्तलाया इदं शाकुन्तलम्। अभिज्ञानशाकुन्तल की व्युत्पत्ति कई प्रकार से की जाती है (१) अभिज्ञानं=अभिज्ञानभूतं तत् शाकुन्त-लम् इति अभिज्ञान शाकुन्तम्। अर्थात् शकुन्तलाविषयक वह नाटक जो अभिज्ञान स्वरूप हो (२) अभिज्ञानेन स्मृतं शाकुन्तलं=शकुन्तलाविषयकं वृत्तान्तं यस्मिन् तत् अभिज्ञानशाकुन्तलम्—अर्थात् शकुन्तलाविषयक विवाह का वृत्तान्त में जिसमें निशानी के रूप में स्मृत हो आया हो। (३) अभिज्ञानं=परिचयस्वरूपं शाकुन्तलं=शकुन्त-लासम्बन्धिचरितं यत्र=नाटके तत् अभिज्ञानशाकुन्तलम्। अर्थात्, जिस नाटक में शकुन्तला का परिचयमय वैवाहिक वर्णन हो। (४) अभिज्ञानप्रधानं शाकुन्तलं यस्मिन् नाटके तत् अभिज्ञानशाकुन्तलम्। अर्थात् जिस नाटक में शकुन्तला का विवाह आदि वृत्तान्त अभिज्ञान प्रधान हो (५) अभिज्ञानं च शकुन्तलां च अभिज्ञानशकुन्तले ते अधिकृत्य कृतं नाटकमिति अभिज्ञानशाकुन्तलम्। अर्थात् शकुन्तला के विषय में निशानी या परिचय जिस नाटक में निबद्ध हो उसे अभिज्ञानशाकुन्तल कहते हैं। (६) अभिज्ञानेन स्मृता शकुन्तला अभिज्ञानशकुन्तला तामधिकृत्य कृतं नाटकमिति अभिज्ञान शाकुन्तलम्। अर्थात्—जिस नाटक में अभिज्ञान से स्मृत शकुन्तला को विषय बनाकर वर्णन किया गया हो उस नाटक को अभिज्ञानशाकुन्तलं कहते हैं। (७) कुछ प्राचीन प्रतियों में 'अभिज्ञानशकुन्तलम्' इस प्रकार का पाठ मिलता है जिसके अनुसार व्युत्पत्ति होगी अभिज्ञानेन स्मृता=स्मृतिपथमानीता शकुन्तला अभिज्ञानशकुन्तला यस्मिन् तत् अभिज्ञानशकुन्तलम्। अर्थात् जिस नाटक में शकुन्तला निशानी अंगूठी के रूप में स्मृत की गई हो वह नाटक अभिज्ञानशकुन्तलम् है।

आदिकाव्य वाल्मीकीय रामायण में भी अभिज्ञान शब्द पहचान के साधन अर्थ में प्रयुक्त है। सम्भवतः कालिदास ने वहीं से अभिज्ञान पद लेकर इस नाटक में भी प्रयुक्त किया है। सुन्दर काण्ड में हनुमान् जी ने सीता जी से कहा था—देवि ! यदि मेरे साथ आपको चलने की इच्छा नहीं है तो कृपया आप कोई अपनी पहचान ही दे दीजिए जिससे श्रीरामजी यह जान लें कि मैंने आपका दर्शन किया है—

अभिज्ञानं प्रयच्छ त्वं जानीयाद् राघवो यतः । ३८।१०

इसके उत्तर में सीताजी ने कहा—

इदं श्रेष्ठमभिज्ञानं ब्रूयास्त्वं तु मम प्रियम् । ३८।१२

इस प्रकार चित्रकूट पर्वतपर शक्रसुत जयन्त की कथा का स्मरण कराकर मणि देने के पश्चात् सीताजी हनुमानजी से बोलीं: मेरे इस चिह्न को श्रीराम भलीभांति जानते हैं। इसे

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देख कर वे एक ही साथ तीन व्यक्तियों का स्मरण करेंगे-मेरा, माता कौशल्या का तथा महाराज दशरथ का—

मणिं दत्वा ततः सीता हनूमन्तमथाब्रवीत् । अभिज्ञानमभिज्ञातमेतद् रामस्य तत्त्वतः ॥ मणिं दृष्ट्वा तु रामो वै त्रयाणां संस्मरिष्यति । वीरो जनन्या मम च राज्ञो दशरथस्य च ॥ ६६।१-२ ॥

अभिज्ञानशाकुन्तल की कथा का मूल आधार

कविवर कालिदास ने अपने अभिज्ञान शाकुन्तल का कथानक महाभारत के आदिपर्व में वर्णित शकुन्तलोपाख्यान से ग्रहण किया है। अभिज्ञानशाकुन्तल के कथानक का मूल आधार महाभारत है। महाभारत के आदिपर्व ६९ वे अध्याय से ७४ वे अध्याय तक ६ अध्यायों के शकुन्तलोपाख्यान में राजा दुष्यन्त तथा महर्षि कण्व की पुत्री शकुन्तला के कथानक का वर्णन है। पद्मपुराण के स्वर्ग खण्ड में भी दुष्यन्त और शकुन्तला की कथा लिखी गई है, किन्तु पद्मपुराण की कथा की अपेक्षा महाभारत का कथानक प्राचीन सीधा-सादा तथा स्वाभाविक प्रतीत होता है। कविवर कालिदास ने महाभारत के सीधे-सीधे आख्यान को अपनी कला से परिष्कृत कर के एक नया सा रूप दे दिया है। उन्होंने अपनी उद्भावनाओं नाटकीय तत्त्वों से उसमें मनोहरता ला दी है।

पद्म पुराण की कथा में महाभारत तथा अभिज्ञानशाकुन्तल का मिश्रण है। समालोचकों का कहना है कि अभिज्ञानशाकुन्तल के अंशों को जोड़-जोड़कर पद्मपुराण की कथा बनाई गई है। इसके अन्त का भाग कालिदास के शाकुन्तल का सार-मात्र है। यह कथा अभिज्ञान शाकुन्तल से लेकर अपनी शैली में लिख ली गई है। अतः पद्मपुराण का अधिक हिस्सा बाद का रचा प्रतीत होता है। इस प्रकार अभिज्ञानशाकुन्तल के कथानक का आधार महाभारत मानना अधिक संगत है।

महाभारत के आख्यान का संक्षेप—

महाभारत के आदिपर्व में वर्णित शकुन्तलोपाख्यान का सारांश इस प्रकार है। एक बार चन्द्रवंशी राजा दुष्यन्त शिकार खेलते-खेलते कुलपति कण्व के आश्रम में जा पहुँचे, परन्तु उस समय महर्षि कण्व आश्रम में उपस्थित नहीं थे, वे फल लाने के लिए वन में गये हुए थे। उनकी अनुपस्थिति में उनकी पोष्यपुत्री शकुन्तला राजा का स्वागत करती है। उसके अपूर्व सौन्दर्य का अवलोकन कर राजा दुष्यन्त के मन में काम की भावना अङ्कुरित हो उठती है। उनके पूछने पर उसने विश्वामित्र से अपना उत्पत्ति-वृत्तान्त कह सुनाया। जब राजा को यह मालूम हो गया कि वह क्षत्रिय की कन्या है तब उन्होंने उसके प्रति अपना प्रेम व्यक्त किया और प्रलोभनों के साथ विवाह का प्रस्ताव रखा। इस पर शकुन्तला ने शर्त रखी कि आपके बाद मेरे पुत्र को ही राजसिंहासन मिलना चाहिए। राजा यह शर्त स्वीकार कर लेता है कि तुम्हारा पुत्र ही मेरे राज्य का उत्तराधिकारी होगा। परिणामतः दोनों गान्धर्व-विधि से प्रणय-सूत्र में आबद्ध हो जाते हैं। राजा ने उसका पाणिग्रहण कर उसके साथ सहवास किया जिससे वह गर्भवती हो गई। राजा उसके साथ कुछ देर तक रहा, बाद उसे आश्वासन देकर कि मैं नगर पहुँच कर तुम्हें ले जाने के लिए किसी विश्वास-पात्र व्यक्ति को भेजूंगा हस्तिनापुर वापस लौट आता है। मार्ग में वह सोचता जाता है कि ऋषि

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की आज्ञा के बिना ही मैंने उनकी कन्या का पाणिग्रहण कर लिया है, जब यह समाचार उन्हें मालूम होगा, न जाने वे क्या करेंगे ?

राजा के चले जाने के बाद महर्षि कण्व आश्रम पर आये और उन्होंने अपने तपोबल से दुष्यन्त के साथ शकुन्तला के गान्धर्व-विवाह का वृत्तान्त जान लिया और उस पर अपनी स्वीकृति दे दी। इस घटना के तीन वर्ष बाद शकुन्तला को एक पुत्र पैदा हुआ, जिसका विधिवत् जातकर्म आदि संस्कार कण्व जी ने किया और शिशु का पालन पोषण किया। ६ वर्ष की अवस्था में ही उस बालक में बल और पराक्रम स्पष्ट दिखाई देने लगा। वह शेर के बच्चों को पकड़-पकड़कर उनके साथ खेलता था उनका दाँत गिनता था और बलपूर्वक वन्यपशुओं को पकड़कर उन्हें पेड़ों में बाँध देता था। इस अद्भुत पराक्रम को देखकर ऋषि ने उसका नाम सर्वदमन रख दिया। इस प्रकार नौ वर्ष के काल तक शकुन्तला तपोवन में रही। उसे तपोवन में रखना ऋषि को उचित नहीं प्रतीत हुआ। अतः वे पुत्र सहित शकुन्तला को तपस्वियों के साथ राजा के पास हस्तिनापुर भेज देते हैं।

जब शकुन्तला राजा के पास सामने पहुँचती है तब राजा पहचानते हुए भी कह देता है कि मैं तुम्हें नहीं पहचानता; यह पुत्र मेरा नहीं है; तुम स्वतन्त्र हो जहाँ जी चाहे जाओ। राजा की बात सुनकर शकुन्तला अवाक् हो गई उसने सत्य और धर्म की दुहाई दी, किन्तु राजा ने एक भी न मानी। अन्त में निराश होकर वह लौटने लगती है। इतने में आकाशवाणी होती है—राजन् ! शकुन्तला सत्य कहती है यह तुम्हारी भार्या है और यह सर्वदमन तुम्हारा ही पुत्र है तुम इन्हें रख लो और धर्मपूर्वक इनका भरण-पोषण करो—'भरस्व पुत्रं दौष्यन्तिं सत्यमाह शकुन्तला'। इस आकाशवाणी को सुनकर पुरोहित तथा मन्त्रियों से सवाल कर राजा उन दोनों को अपना लिया। इस प्रकार आकाशवाणी के द्वारा देवताओं की स्वीकृति मिल जाने पर शकुन्तला निर्दोष सिद्ध हो गई। बाद में राजा शकुन्तला को पटरानी पद पर प्रतिष्ठित करता है। सर्वदमन का भरत नाम रखकर युवराज पद पर आसीन कर देता है।

पद्मपुराण के कथानक का सारांश—

पद्मपुराण में भी राजा दुष्यन्त के द्वारा गान्धर्व-विवाह तक की कथा वैसी ही है जैसी महाभारत में। अन्तर केवल इतना ही है कि महाभारत के अनुसार शकुन्तला ने अपने जन्म की कथा को राजा के पूछने पर स्वयं बताया है किन्तु पद्मपुराण के अनुसार शकुन्तला के जन्म की उत्पत्ति उसकी सखी प्रियम्वदा ने बतलाई है। महाभारत के अनुसार राजा ने शकुन्तला को कोई अभिज्ञान नहीं दिया है, पर पद्मपुराण के अनुसार जाते समय राजा ने शकुन्तला को अपनी अंगूठी दे दी है। पुनः पद्मपुराण के अनुसार सात मास का गर्भ होने तक शकुन्तला महर्षि कण्व के तपोवन में ही रही जबकि अभिज्ञानशाकुन्तल नाटक के अनुसार कुलपति कण्व को दुष्यन्त के साथ शकुन्तला का प्रेम-सम्बन्ध और गान्धर्व-विवाह एवं गर्भवती हो जाने का पता लगते ही उन्होंने तत्काल उसे राजा के पास भेज दिया।

पद्मपुराण के अनुसार जब शकुन्तला हस्तिनापुर राजा के पास जाने लगी तो उसके साथ शार्ङ्गरव, शारद्वत तथा गौतमी के साथ प्रियम्वदा भी जाती है। मार्ग में सरस्वती नदी में स्नान करते समय अंगूठी को शकुन्तला ने प्रियम्वदा को दे दिया, यह अंगूठी प्रियम्वदा

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के हाथ से गिर गई। उसने भय के कारण यह बात शकुन्तला से नहीं जनाया और शकुन्तला भी उससे पूछना भूल गई। राजा के पास पहुँचने पर जब उनको विश्वास दिलाने के निमित्त आवश्यकता पड़ी तब शकुन्तला ने प्रियम्वदा से माँगी, पर प्रियम्वदा ने धीरे से उसके कान में कहा कि वह अंगूठी तो नदी में गिर गई है। यह सुनकर शकुन्तला बेहोश हो गई। इसके अतिरिक्त पद्मपुराण का कथानक अभिज्ञानशाकुन्तल के समान ही है। इस प्रकार महाभारत तथा पद्मपुराण के कथानक में अन्तर दिखाई पड़ता है, किन्तु पद्मपुराण की कथा में महाभारत तथा अभिज्ञानशाकुन्तल का मिश्रण है। इस आधार पर कहा जाता है कि यह कथा शकुन्तला से लेकर उसे अपनी शैली में लिख ली गई है।

मूल कथा में परिवर्तन

कालिदास ने मूलकथा महाभारत से ही ली है पर महाभारत के नीरस कथानक में उन्होंने यत्र-तत्र चमत्कारी परिवर्तन करके उसे सरस बनाकर नया रूप दिया है। मूल कथानक के अनुसार राजा दुष्यन्त शिकार खेलते हुए अपनी सेना के साथ महर्षि कण्व के आश्रम के पास पहुँचने पर अपनी सेना बाहर खड़ी करवाके आश्रम में प्रवेश करते हैं; किन्तु अभिज्ञान शाकुन्तल के अनुसार शिकार खेलते समय राजा की सेना पीछे छूट गई, राजा सूत के साथ आश्रम पर पहुँचते हैं फिर भी सहसा प्रवेश नहीं करते। उन्होंने ऐसे समय पर प्रवेश किया जब तपस्विकन्याओ द्वारा उनसे सहायता प्राप्त करने की चर्चा चल रही थी। यह घटना बड़े स्वाभाविक ढंग से प्रस्तुत की गई है। पीछे सेना का भी उपयोग कवि ने अच्छे ढंग से किया है। राजा को न पाकर सेना उसे खोजती हुई आश्रम के पास आगई वहाँ उसने भगदड़ मचाना शुरू कर दिया। उस समय राजा शकुन्तलासहित सखियों के साथ बातें करने में संलग्न था। सेना द्वारा मचाई भगदड़ समाचार सुनकर वे तपस्विकन्यायें कुटी में चली जाती हैं और राजा इन्हें सान्त्वना देकर व्यवस्था करने के लिए बाहर जाता है।

इस प्रकार कवि ने बड़ी सफाई के साथ शकुन्तला के शील, स्वभाव, लज्जा और मुग्धता की रक्षा की योजना कर शकुन्तला-दुष्यन्त के प्रथम मिलन को प्रस्तुत कर प्रथम अङ्क की समाप्ति कर दी है।

मूलकथा के अनुसार जब राजा दुष्यन्त महर्षि कण्व के आश्रम पर पहुँचे तो उस समय महर्षि फल लाने के लिए वन में गये हुए थे। इसलिए उनकी पोष्यपुत्री शकुन्तला ने उनका आतिथ्यसत्कार किया। राजा पूछने पर उसने स्वयं अपनी उत्पत्ति की कथा राजर्षि विश्वामित्र से मेनका में बतायी। राजा के द्वारा विवाह का प्रस्ताव करने पर उसने उनको महर्षि कण्व के वन से लौटने तक रुकने को कहा, किन्तु राजा के जल्दी करने पर उसने एक प्रगल्भा, व्यवहारनिपुणा, स्पष्टवादिनी महिला के समान इस शर्त के साथ विवाह करना स्वीकार कर लिया कि आपके बाद मेरा ही पुत्र राज्य का उत्तराधिकारी बनेगा। एक अपरिचित व्यक्ति के साथ भोली-भाली तपस्विकन्या का खुल कर इस प्रकार बातचीत करना अस्वाभाविक एवं नीरस प्रतीत होता है। इसके विपरीत अभिज्ञानशाकुन्तल की शकुन्तला लजालु एवं सुकुमारता का प्रतीक है।

इस प्रकार कालिदास की शकुन्तला में हृदय पक्ष की प्रबलता है, तो महाभारत की शकुन्तला में मस्तिष्क पक्ष प्रबल प्रतीत होता है जिसमें व्यापार की प्रवणता-प्रतीत होती है। इसलिए कालिदास ने इस घटना को बदल दिया है। महाभारत में महर्षि फल-फूल

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लाने के लिए वन में गये हुए हैं जहाँ से वे शीघ्र ही ३-४ घण्टे में लौट आये होंगे। इतने अल्प समय में राजा दुष्यन्त और शकुन्तला का उस प्रकार का प्रणयपूर्व मिलन सम्भव नहीं प्रतीत होता। कालिदास के नाटक में महर्षि कण्व शकुन्तला के अनिष्ट शान्ति के लिए प्रवास पर सोमतीर्थ गये हुए हैं। इस अन्तराल में घटित होने वाली आश्रम की घटनाओं के लिए पर्याप्त समय दिया गया है, जो स्वाभाविक सा प्रतीत होता है जिससे कथा में सरसता आ जाती है। यज्ञ के रक्षार्थ तपस्वियों का राजा से ठहरने की प्रार्थना करना, दुष्यन्त शकुन्तला के प्रणय का उद्भव विकास तथा दुर्वासा मुनि के शाप की कल्पना, ये सारी बातें महर्षि कण्व के दीर्घकालीन प्रवास में संभव हो सकती हैं।

सुलभकोप महर्षि दुर्वासा के शाप की चर्चा महाभारत में नहीं है, किन्तु कविवर कालिदास ने शाप की योजना कर दुष्यन्त के साधारण चरित को उठाकर एक आदर्शमय सत्पुरुष के समान समुज्ज्वल बना दिया है। महाभारत के कपटी दुष्यन्त तथा उसके चरित को शाप की सहायता से कालिदास ने स्पृहणीय एवं अनुकरणीय बना दिया है।

महाभारत की कथा के अनुसार शकुन्तला महर्षि कण्व के आश्रम पर ही तीन वर्ष के बाद पुत्र को उत्पन्न करती है, उसके ६ वर्ष के बाद कण्व को स्मरण हुआ कि विवाहिता लड़की को अधिक दिनों तक पिता के घर नहीं रहना चाहिए तब उन्होंने पुत्रसहित शकुन्तला को दुष्यन्त के पास हस्तिनापुर भेज दिया। इस कथा को बेतुकी समझ कर कालिदास ने अपने नाटक में बदल दिया है और विश्वसनीय भारतीय परम्परा का अनुवर्तन किया है। नाटक के अनुसार सोमतीर्थ की यात्रा से लौटने के बाद ही अग्निशाला ने आकाशवाणी के द्वारा दुष्यन्त के साथ शकुन्तला के शरीर के सम्बन्ध की बात ज्ञात होते ही महर्षि कण्व ने तत्काल उसी दिन उसे गौतमी तथा शिष्यों के साथ उसके पति के पास भेज दिया। शकुन्तला गर्भिणी अवस्था में ही दुष्यन्त के पास उपस्थित हुई, उसके इनकार कर देने पर उसकी माँ मेनका ने उसे किंपुरुषवर्ष के हेमकूट पर्वत पर महर्षि कश्यप के आश्रम पहुँचा दिया जहाँ ठीक समय पर शकुन्तला ने सर्वदमन को जन्म दिया। इस परिवर्तन से भी कथा में स्वाभाविकता आ गई है महाभारत के अनुसार ९ वर्ष के बाद कण्व का यह कहना कि विवाहिता लड़की को अधिक दिनों तक पिता के घर में न रहना चाहिए—हास्यास्पद हो जाता है।

कालिदास ने अपने कथानक में शाप तथा उसकी निवृत्ति के निमित्त मुद्रिका की योजना की अभिनव उद्भावना की है। महाभारत का दुष्यन्त कामुक तथा स्वार्थी प्रतीत होता है किन्तु नाटक में शापवाली घटना की योजना से उसका चरित्र उज्ज्वल एवं उदात्त हो जाता है। शाप के कारण शकुन्तला का पति के द्वारा तिरस्कृत होना स्वाभाविक है। इस अवस्था में पाठक दुष्यन्त को दोषी नहीं ठहरा पाते, बल्कि, आश्रम की मर्यादा तोड़ने के लिए शकुन्तला को ही दण्डनीय बताते हैं। वस्तुतः नाटक में विप्रलम्भ शृंगार तथा अन्तिम मिलन का जो हृदयस्पर्शी दृश्य का चित्रण हो गया है वह इसी शापवाली घटना का प्रतिफल है। नाटक में शाप के कारण दुष्यन्त को शकुन्तला का भूल जाना तथा शाप की परिसमाप्ति पर स्मृति जागृत होने कि लिए कवि ने अंगूठी वाली घटना को योजित किया है। दुष्यन्त के दरबार में पहुँचने के पहले अंगूठी का गिरना और पुनः प्रत्याख्यान के बाद उसका मिल जाना बाद में उसे देखकर कण्वाश्रम की सारी घटना का स्मरण हो आना ये बातें बड़ी निपुणता एवं स्वाभाविकता के साथ संयोजित की गई है।

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महाभारत के अनुसार शकुन्तला पुत्र के सहित दुष्यन्त के पास राजमहल में उपस्थित हुई। दुष्यन्त ने सारा वृत्त जानते हुए भी जब उसे अस्वीकार कर दिया तब निराश होकर वह जाने लगी, ठीक इसी समय आकाशवाणी हुई—भरस्व पुत्रं दौष्यन्ति सत्यमाह शकुन्तला। शकुन्तला सत्य कह रही है दुष्यन्त ! यह तुम्हारी ही पुत्र है, इसका भरण पोषण करो। देवताओं ने समर्थन किया, पुरोहित ने उसका अनुमोदन किया। इस प्रकार सर्वसम्मति से दुष्यन्त ने शकुन्तला को अपनाया। इससे दुष्यन्त के हृदय की कमजोरी प्रगट होती है। अतः कवि ने इसे बदल दिया। नाटक के अनुसार शकुन्तला गर्भिणी अवस्था में ही राजा के पास गई। दुर्वासा ऋषि के शाप के कारण उसे उसके साथ हुए गान्धर्व विवाह आदि का वृत्त विस्मृत हो गया। अतः उसने उसे परस्त्री समझकर धर्मतः अपने यहाँ रखना उचित नहीं समझा। अनन्तर शार्ङ्गरव, शारद्वत और गौतमी उसको वहाँ छोड़कर वन में लौट जाने के बाद विवश हो अपने भाग्य को कोश कर रोती हुई पुरोहित के पीछे-पीछे उसके घर जाती हुई शकुन्तला को एक स्त्री स्वरूपवाली अदृश्य ज्योति उठा ले गई। उसके बाद धीवर से प्राप्त अंगूठी को देखकर राजा को सारी बातें याद आ गई। वह अपनी गलती पर पश्चात्ताप करने लगा और पुनः उसका चित्त शकुन्तला की ओर आकृष्ट हो गया। इसी बीच दुर्जय दानवों के आक्रमण को विफल करने के निमित्त इन्द्र के आह्वान पर मातलि द्वारा उपस्थापित उनके रथ पर सवार हो स्वर्ग जाकर दानवों के पराजय के बाद सत्कृत हो लौटते समय मरीचिनन्दन महर्षि कश्यप के आश्रम जाता है। वहाँ उसने पहले शेर के बच्चों से खेलते हुए सर्वदमन को देखा बाद शकुन्तला से उसका मिलन हुआ। पति-पत्नी के मिलन के पूर्व पुत्र के दर्शन ने उसे दृढ कर दिया। पुत्र, पिता और माता के बीच जो प्रेम की ग्रन्थि होता है उसे कवि ने नाटक में बड़ी कुशलता से दर्शाया है। जिसकी चर्चा मूल महाभारत में नहीं है। उसे कवि ने अपनी कल्पना के बल से बहुत ही रोचक उपादेय, ग्राह्य एवं बुद्धिगम्य बना दिया है। और भी, वृद्धा गौतमी, राजपुरोहित, विदूषक, वैखानस। सेनापति आदि की चर्चा महाभारत में नहीं है, किन्तु कवि ने नाटक में इनकी उद्भावना कर इस नाटक अभिज्ञान शाकुन्तल को संसार में अनूठा बना दिया है। मूलकथा को रोचक बनाने के लिए कविर कालिदास ने अपनी अद्भुत मौलिक कल्पना से और कई बातें उसमें जोड़ दी हैं।

षष्ठ अङ्क में धीवर तथा राष्ट्रिय के दृश्य सन्निवेश में अंगूठी वाला प्रसंग अत्यन्त निपुणता के साथ प्रस्तुत किया गया है। शाप तथा अंगूठी की घटनाओं से वह मनो-वैज्ञानिक कड़ी उपस्थित की गई है, जो वर्तमान को अतीत से जोड़ती है एवं मानवीय जीवन को सफल बनाने का एक स्तुत्य साधन है।

दुर्वासा का शाप राजा दुष्यन्त को कलङ्क से बचाता है। प्रियम्वदा और अनसूया की उपस्थिति दुष्यन्त शकुन्तला के प्रथम मिलन के समय बातचीत के प्रसंग को सरस बनाती है। अंगूठी का वृत्तान्त इस कथा की जान है। विदूषक बीच-बीच में हास्य रस का पुट देकर प्रसंगों को ताजा बना देता है। मातलि का विदूषक पर आक्रमण राजा की चित्तवृत्ति को बदलता है। तिरस्कृत शकुन्तला के विरह में राजा उद्विग्न एवं उदासीन था, शायद उस अवस्था में वह इन्द्र का मनोरथ पूरा न कर पाता। अतः उसे क्रोध उत्पन्न करना आवश्यक था। जिसे अन्त में मातलि ने स्वयं स्पष्ट कर दिया है। इस प्रकार नाटक के निर्माता कविकालिदास ने अपनी अद्भुत कल्पना की उद्भावना से इसे लोकोत्तर चमत्कृत

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बनाकर इस नाटक के अपूर्ण अङ्ग को पूरा कर दिया है। और नई-नई उद्भावनाओं और नाटकीय तत्त्वों से अपने नाटक में असीम चारुता ला दी है। महाभारत और अभिज्ञान-शाकुन्तल इन दोनों की कथाओं में मुख्य अन्तर इस प्रकार है—

महाभारत मेंनाटक में
१. महर्षि कण्व उस समय फल लेने वन में गये हुए थे जब दुष्यन्त उनके आश्रम में प्रविष्ट होते हैं।१. वे शकुन्तला के प्रतिकूल ग्रहों की शान्ति करने के निमित्त सोमतीर्थ गये हुए थे।
२. उक्त सूचना स्वयं शकुन्तला राजा को देती है।२. उक्त सूचना राजा को वैखानस देता है।
३. शकुन्तला अपना जन्मवृत्तान्त स्वयं बताती है।३. सखी अनसूया शकुन्तला का जन्म वृत्तान्त राजा दुष्यन्त से बताती है।
४. शकुन्तला शर्त के साथ विवाह के लिए राजी हो जाती है।४. शर्त को निकृष्ट समझकर सखियों के वार्तालाप, परस्पर दर्शन, पारस्परिक अनुराग पत्रलेखन के अनन्तर गान्धर्व विवाह होता है।
५. कण्व के डर से राजा राजधानी चल देते हैं।५. राजधानी जाने का कारण नहीं निर्दिष्ट है।
६. कण्व के आश्रम पर ही शकुन्तला पुत्र को जन्म देती है।६. मरीचिनन्दन कश्यप के आश्रम में पुत्र पैदा होता है।
७. ९ वर्ष के बाद सर्वदमन को लेकर शकुन्तला राजा के दरबार में जाती है।७. गर्भवती अवस्था में ही राजा के पास पहुँचती है।
८. वह राजा से अनुनय विनय करती है कि आप बालक को युवराज बना लें।८. युवराज बनाने की प्रश्न ही नहीं उठता, क्योंकि अभी पुत्र हुआ भी नहीं है वह अभी गर्भवती है।
९. लोकापवाद के भय से राजा शकुन्तला को नहीं पहचानता।९. दुर्वासा के शाप के कारण ब्याह का स्मरण न होने से राजा शकुन्तला को त्याग कर देता है, धीवर द्वारा अंगूठी प्राप्त होने पर पत्नी के परित्याग के कारण पश्चात्ताप करता है।
१०. शकुन्तला कण्वाश्रम की ओर लौटती है।१०. शार्ङ्गरव, शारद्वत तथा गौतमी के चले जाने पर जब पुरोहित के पीछे-पीछे शकुन्तला रोती हुई जाती है, तो दिव्य ज्योति बनकर मेनका उसे लेकर कश्यप के आश्रम पर पहुँचा देती है।
११. आकाशवाणी पर विश्वास करके नागरिकों के समक्ष राजा शकुन्तला को स्वीकार करता है।११. इन्द्र के बुलाने पर राजा असुरों को मारने के लिए स्वर्ग जाता है वहाँ से लौटते समय कश्यप के आश्रम पर पुत्र और पत्नी को प्राप्त कर वह प्रसन्नता से राजधानी में आता है।

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इस प्रकार अनुराग का विकास, नये नये पात्रों की सृष्टि, शाप की कल्पना अंगूठी की उद्भावना आदि कालिदास की बुद्धि का चमत्कार हैं। कण्व, दुष्यन्त, शकुन्तला और सर्वदमन ये महाभारत के पात्र हैं। शिकार खेलते समय कण्वाश्रम पर पहुँचना, गान्धर्व विवाह का कण्व द्वारा अनुमोदन, पहचानने से इनकार और फिर स्वीकार महाभारत के कथानक से संगृहीत है।

नाटक में कथा का वर्गीकरण

समालोचक वर्ग के अनुसार अभिज्ञानशाकुन्तल की कथा तीन अंशों में विभक्त है। (१) प्रथम अंश में शिकारी राजा दुष्यन्त और प्रकृति सुकुमारी भोली-भाली शकुन्तला का कण्वाश्रम में अस्थायी मिलन (२) दूसरे अंश में इन दोनों का किञ्चित्कालिक विरह (३) और तीसरे अंश में पुनः दोनों का स्थायी मिलन। प्रथम अंक में अस्थायी प्रथम मिलन के बाद चार अङ्कों तक तो प्रयाण की तैयारी की गई है। पञ्चम और षष्ठ दो अङ्कों में वियोग घटनाएँ अङ्कित हैं। अन्त के सप्तम अङ्क में पुत्रसहित शकुन्तला और दुष्यन्त इन दोनों का पुनः स्थायी मिलन वर्णित है।

प्रथम अस्थायी मिलन के घटनाचक्र तथा चार अंकों तक के कथानक का स्थान तपोवन में महर्षि कण्व का पुनीत आश्रम है। पञ्चम तथा षष्ठ अङ्क में वर्णित वियोग दशा का वर्णन-स्थान नगर में राजा का महल तथा उद्यान हैं। अन्त के स्थायी मिलन का स्थान किंपुरुष वर्ष के हेमकूट पर्वतपर मरीचिनन्दन महर्षि कश्यप का आश्रम है। इस प्रकार की घटनाओं को तीन भागों में विभक्त कर प्रकृति के उपासक कविवर कालिदास ने संकेत किया है कि वस्तुतः तपोवन ही सुखशान्ति के सदन हैं तथा अनेक चाकचक्कियों से परिपूर्ण नगर अनेक कष्टकर तथा सन्तोषों की भूमि है। प्रकृति प्रेमी कालिदास की प्रगाढ़ धारणा है कि नगरों के कृत्रिम जीवन से ऊबे हुए प्राणियों के लिए ऋषि-महर्षियों के तपोवन और आश्रम ही शाश्वत शान्तिदायक हैं तथा वहीं जीवन की सफलता है इस प्रकार की धारणा से प्राचीन काल के राजे महाराजे अपने उत्तराधिकारियों को राज्य भार देकर अपनी धर्म-भार्या के साथ तपोवन में जाकर अपने जीवन के अन्तिम क्षण व्यतीत करते थे।

नाटकों की उत्पत्ति समीक्षा

किसी कलाकार की मानसिक अभिव्यक्ति को दो भागों में विभक्त किया गया है। उपयोगी कला और ललितकला। पुनः ललितकला का वर्गीकरण पांच भागों में विभक्त है। (१) वास्तुकला (२) मूर्तिकला (३) चित्रकला (४) संगीतकला ओर (५) काव्य कला। इनमें काव्यकला के प्रमुख दो भेद हैं, एक गद्यकाव्य दूसरा पद्यकाव्य। नाटक इन दोनों भेदों के अन्तर्गत आता है। नाटक ही काव्य का एक ऐसा अङ्ग है जो श्रवणेन्द्रिय एवं नेत्रेन्द्रिय दोनों से सम्बद्ध मन को आनन्दित करता है। अतः नाटक को सर्वाधिक श्रेष्ठ काव्यकला कहा गया है—'काव्येषु नाटकं श्रेष्ठम्' संस्कृत के काव्यशास्त्र में रूपक के दश भेद हैं नाटक, प्रकरण, भाण, व्यायोग, समवकार, डिम, ईहामृग, अङ्क, वीथि और प्रहसन¹, इस प्रकार नाटक रूपक का ही एक भेद है।


१. नाटकमथ प्रकरणं भाणव्यायोगसमवकारडिमाः ।
ईहामृगाङ्कवीथ्यः प्रहसनमिति रूपकाणि दश ॥ सा० द० ६।३ ।

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भारतीय विद्वान् तथा पाश्चात्य जगत् के विद्वानों का मतभेद

भारतीय विद्वान् भरतमुनि के नाट्यशास्त्र के अनुसार नाटकों की उत्पत्ति त्रेतायुग में ब्रह्मा के द्वारा की गई मानते हैं। सत्ययुग में सभी प्राणी सुखी थे, उन्हें किसी तरह के मनोविनोद के साधनों की आवश्यकता नहीं थी, किन्तु त्रेतायुग में सांसारिक दुःखों का प्रादुर्भाव हो गया। इसलिये देव-दानव दोनों ने मिलकर लोकपितामह ब्रह्मा जी के पास जाकर प्रार्थना की कि भगवन् ! सांसारिक दुःखों से क्षणिक मुक्ति के लिए या मनोविनोद के निमित्त हमें कोई ऐसी वस्तु प्रदान करें जिससे हमारा मनोरंजन हो और हम कुछ देर के लिए दुःखों को भूल जाँय। तदनुसार ब्रह्मा जी उनकी प्रार्थना से सन्तुष्ट होकर उठ बैठे और ध्यानावस्थित हो गये। अनन्तर उन्होंने सांसारिक जीवों के मनोरञ्जनार्थ चारों वेदों के सहायता से नाट्य वेद को प्रगट किया है। ऋग्वेद से पाठ्य यजुर्वेद से अभिनय, सामवेद से सङ्गीत तथा अथर्ववेद से रस लेकर नाट्यकला की सृष्टि की¹ और इसे पञ्चम वेद कह कर प्रसिद्ध किया। इसमें भगवान् शिव ने ताण्डवनृत्य, पार्वतीजीने लास्य-नृत्य, और भगवान् विष्णु से चार वृत्तियों का समावेश कर इसमें पूर्ण कलात्मकता उत्पन्न कर दी। बाद स्वर्गलोक के शिल्पी विश्वकर्मा ने एक रमणीय रंगमञ्च का निर्माण किया। सर्वप्रथम इन्द्रध्वज पर्वपर त्रिपुरदाह तथा समुद्रमन्थन नाटक अभिनीत हुए। ब्रह्मा जी ने नाटक खेलने के लिए भरत मुनिको एक सौ अप्सरायें भी इसलिए सौंप दी कि मुनि उन्हें नाट्यकला की व्यावहारिक शिक्षा दें। अनन्तर इस कला को मर्त्य-लोक तक पहुँचाने का भार भरत मुनि को सौंप दिया गया। इस प्रकार द्युलोक से यह नाट्यकला मर्त्यलोक में पहुँच गई। इस प्रकार भारतीय परम्परा नाटकों की उत्पत्ति दैवी मानती है।

पाश्चात्य जगत् के विद्वान् भारतीयों का पूर्वोक्त मत मानने को तैयार नहीं। अतः वे नाटकों की उत्पत्ति के सम्बन्ध में अनेक अटकलबाजियाँ किया करते हैं :—

( १ ) विदेशी विद्वान् डा० रिजवे सारे संसार में नाटकों की उत्पत्ति मृतात्माओं के प्रति व्यक्त की गई श्रद्धा से मानते हैं। उनका मत है कि पहले मृत व्यक्तियों के शव सुरक्षित रखे जाते थे तथा उनके श्राद्ध के दिन उनके पूर्व जीवन का प्रदर्शन किया जाता था। अतः उसी परम्परा को रामलीला एवं कृष्णलीला के सम्बद्ध कर भारत में नाटक खेलने की प्रथा चलाई गई।

( २ ) डा० हिलवैण्ड और स्टेन कानो का कहना है कि पूर्व भारत में पहले लोकप्रिय स्वांग अधिक प्रचलित थे, उन्हीं से नाटकों का प्रादुर्भाव हुआ। इन स्वांगों में रामायण महाभारत और पुरुषों के आख्यान-उपाख्यानों को मिलाकर ही नाटकों की कथावस्तु का चयन किया गया होगा।

( ३ ) डा० कीथ ने ऋतु परिवर्तन के साथ-साथ होने वाले उत्सवों तथा नृत्यगानों से नाटकों की उत्पत्ति माना है। उनका विचार है कि पाश्चात्य जगत् में मई मास अत्यन्त आनन्दप्रद होता है। इसी समय से वहाँ अधिक उत्सव मनाये जाते हैं। एक लम्बा बांस गाड़कर उसके नीचे इकट्ठे होकर स्त्री-पुरुष मिलकर नाचते हैं, गाते हैं, और आनन्द मनाते हैं। भारतवर्ष में भी वर्षाकालीन इन्द्रध्वज रथयात्रा महोत्सव भी इसी ढंग का


१. जग्राह नाट्यमृग्वेदात् सामभ्यो गीतमेव च।
यजुर्वेदादभिनयान् रसानाथर्वणादपि ॥ भ. ना. ७।

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होता है। इससे सिद्ध होता है कि नाटकों की उत्पत्ति विभिन्न ऋतुओं में मनाये जाने वाले त्यौहारों के आधार पर हुई होगी।

( ४ ) जर्मनी के लोकप्रिय विद्वान पिशेल साहब ने नाटकों की उत्पत्ति कठपुतली के नाच से मान ली है। कठपुतली के नाच में उसका व्यवस्थापक नचाने वाला डोरी ( सूत्र ) पकड़कर पुतलियों को नचाता है। अतः इसे सूत्रधार कहते हैं। इस आधार पर सूत्रधार शब्द नाटकों में ज्यों का त्यों ले लिया गया है। अतः नाटकों की उत्पत्ति कठपुतली के नाच से हुई मानना सर्वथा संगत है।

( ५ ) इनके अतिरिक्त कुछ विद्वानों ने नाटकों की उत्पत्ति का स्रोत यूनानी नाट्य कला को माना है। इसके लिए वे प्रमाण में यवन शब्द से उत्पन्न यवनिका शब्द उपस्थित करते हैं। इस सम्बन्ध में इतना ही कहना पर्याप्त है कि संस्कृत नाटकों में जवनिका शब्द का व्यवहार होता है जिसका अर्थ है ढकने वाला पर्दा। अमरसिंह अपने अमरकोश में स्पष्ट लिखते हैं कि—जवनिका पटमण्डपम् ।

प्रोफेसर मैक्समूलर की खोज है कि संस्कृत नाटकों की उत्पत्ति का बीज ऋग्वेद के सम्पाद सूक्तों में मिलते हैं। इसके अनन्तर अनेक पाश्चात्य और पौर्वात्य विद्वान् भी ऋग्वेद के संवादों में नाटकोत्पत्ति की मूल सामग्री खोजने की चेष्टा किया करते हैं।

जर्मनी विद्वान् श्रोडर साहब भी मानते हैं कि पहले संवाद सूक्त गायन तथा नर्तन के साथ अभिनीत किये जाते थे। यज्ञ के कुछ विशिष्ट अवसरों पर नृत्य गीत आदि के साथ याज्ञिकों द्वारा इनका अभिनय किया जाता है। वस्तुतः संवाद सूक्तों को गायन में एक से अधिक व्यक्ति सम्मिलित होते थे, क्योंकि संवाद का कार्य एक व्यक्ति से संभव नहीं है। अतः संवाद सूक्तों में नाटकों के बीज निहित हैं। इस प्रकार नाट्य के बीज वेद ही में जो अङ्कुरित, पल्लवित तथा पुष्पित होकर हमारे सामने प्रतिफलित हैं। यह बात दूसरी है कि नाट्य को पूर्णता प्रदान करने में अन्य कई बातों ने भी सहयोग प्रदान किया होगा।

नाटकों के विकास का समय—

नाट्यशास्त्र के काल के विषय ने विद्वानों ने विभिन्न मत व्यक्त किये हैं। महामहोपाध्याय हरप्रसाद शास्त्री ने नाटकों का समय दूसरी शताब्दी माना है। डा० कीथ का विचार है कि इसका समय तीसरी से पूर्व नहीं हो सकता है। डी० डी० सरकारने नाट्यशास्त्र का समय दूसरो के बाद माना है। मनमोहन घोष ने नाट्यशास्त्र का समय १००० और २००० के मध्य में निर्धारित किया है। वी० पी० काणे ने नाट्यशास्त्र का समय तीसरी शताब्दी के बाद संभव नहीं माना है।

शेक्सपीयर और कालिदास

कालिदास के अभिज्ञानशाकुन्तल की तुलना प्रायः शेक्सपीयर के सुखान्त नाटक टेम्पेस्ट ( तूफान ) से की जाती है तथा शकुन्तला की समता उसकी नायिका मिराण्डा से की जाती है। दोनों नाटक उत्कृष्टकोटि की रचनाएँ हैं। किन्तु दोनों की कल्पना में मौलिक अन्तर है।

वस्तुतः शाकुन्तल के साथ प्रतिस्पर्धा करने वाला शेक्सपीयर का कोई नाटक नहीं है। शाकुन्तल का शिल्पसौन्दर्य अनिन्द्य है। इसकी ख्याति में इसके कलात्मक सौष्ठव का यथेष्ट योगदान है। जिस प्रकार पुष्प से किसी छोटी से छोटी पंखुड़ी को अलग कर देने

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से उसका सौन्दर्य क्षतिग्रस्त हो जाता है उसी प्रकार शाकुन्तल में से किसी पंक्ति या किसी शब्द को हटा देना उसके सौन्दर्य शरीर को आघात पहुँचाने के अतिरिक्त कुछ नहीं है। कवि ने एक-एक शब्द एवं एक-एक वाक्य बड़ी सावधानी से सजाया है। फिर भी शाकुन्तला की विश्वव्यापी ख्याति का मूल कारण उसका जीवन दर्शन है। उसमें संशय-संघर्ष का तूफान नहीं है, प्रत्युत परमशान्ति का प्रकाश है। शकुन्तला तथा दुष्यन्त दोनों ने प्रमाद किया है तथा परिणामतः पश्चात्ताप तथा तपस्या अग्नि में तपकर निर्मल हो गये हैं। प्रेम एवं नैतिक दायित्व का ह्रास नहीं है और दोनों परस्पर मिल कर समरस बन गये हैं विषाद एवं निराशा के बाद दोनों जिस मङ्गलमय परिपक्व जीवन में प्रवेश कर गये हैं वहाँ आध्यात्मिक शान्ति है जो संस्कृत नाटकों की विशेषता है।

वस्तुतः कालिदास की काव्यात्मक प्रतिभा जितनी पटभूमि को आच्छन्न करती है उतनी शेक्सपीयर की प्रतिभा की पहुँच के बाहर है। कालिदास ने महाकाव्य तथा नाटकों का प्रणयन किया है जब कि शेक्सपीयर की प्रतिभा केवल नाट्य कला के सजाने में ही सीमित है। कालिदास के काव्यों में भारतीय संस्कृति के चिन्तन आदर्श अनवद्य रूप में ध्वनित हुए हैं और वे सच्चे अर्थों में भारतवर्ष के राष्ट्रीय कवि हैं।

जहाँ तक नाटकीय उपलब्धियों का प्रश्न है शेक्सपीयर सफल हैं। जीवन की विपन्नता एवं विशदता को चित्रित करने में तथा इतिहास के अतीत को सजीवता के साथ नाटकीय अभिव्यक्ति देने में शेक्सपीयर अद्वितीय हैं। किन्तु अन्य दिशाओं में कालिदास शेक्सपीयर से आगे बढ़ गये हैं। प्रकृति का चित्रण तथा मानव जीवन के सामरस्य का निदर्शन जैसा कालिदास की कृतियों में दृष्टिगोचर होता है वैसा शेक्सपीयर की रचनाओं में खोजने पर भी नहीं मिलेगा। इसी प्रकार जीवन के जो आध्यात्मिक तत्त्व कालिदास कृतियों में हैं वह शेक्सपीयर की कृतियों में नहीं हैं। कालिदास सच्चाई एवं सहानुभूति के दरवाजे से विश्व के हृदय में प्रवेश करते हैं। मानव मन की शाश्वत अभिलाषाओं का चित्रण सटीक तथा सर्वाङ्गपूर्ण कालिदास की कृतियों में उद्वेलित है तथा सभी के हृदयों को आवर्जित करती रहती है।

कालिदास की शैली

कालिदास वैदर्भीरीति के कुशल कवि हैं। उनकी रचनाओं में व्यञ्जनाशक्ति की चारुता, प्रसादगुण की प्रचुरता पाठकों के हृदय को चमत्कृत कर देती है। जिस प्रकार स्वच्छ जल में पड़ी हुई वस्तु स्पष्ट दिखाई पड़ती है उसी प्रकार उनके ग्रन्थों में अर्थ निर्मल एवं स्पष्ट प्रतीत होते हैं। इनकी कृतियों में प्रसादगुण के साथ-साथ सरसता के दर्शन होते हैं। यमक अलंकार के प्रति रघुवंश के नवम सर्ग में उनकी रुचि दिखलाई पड़ती है और द्रुतविलम्बित छन्द का अन्तिम चरण यमकमय किया गया है, पर वह भी सीमित स्थान में। उससे प्रसादगुण की कोई क्षति नहीं पहुँचती। उत्प्रेक्षा, अर्थान्तरन्यास आदि अलंकारों का प्रयोग भी उन्होंने बड़ी सफलता के साथ किया है, पर इन सबसे बढ़कर उनकी प्रसिद्धि उपमाओं के लिए है। अनुरूपता तथा कमनीयता उनमें कूट-कूट कर भरी पड़ी है। कवि की सबसे सुन्दर उपमा कुमारसंभव के पञ्चम सर्ग के अन्त में आई है। भगवान शङ्कर अपने निमित्त तप कर रही उमा को अपनी ही निन्दा करके उसे क्रुद्ध कर देते हैं। उन्हें न पहचान कर जब वह अन्यत्र जाने लगती है तब वे अपने वास्तविकरूप में प्रगट होकर उसे चौंका देते हैं। वह स्तब्ध रह जाती है, शरीर कांपने लगता है, आगे

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बढ़ा हुआ पैर उधर में ही रह जाता है। उस समय वह उस नदी की तरह न तो आगे बढ़ पाती है और न ही रुक पाती है जो अपने सम्मुख उपस्थित पर्वत की बाधा पाकर न बढ़ पाती है और न रुक पाती है—

तं वीक्ष्य वेपथुमती सरसाङ्गयष्टिः निक्षेपणाय पदमुद्धृतमुद्वहन्ती।
मार्गाचलव्यतिकराऽऽकुलितेव सिन्धुः शैलाधिराजतनया न ययौ न तस्थौ ॥

छन्दों के प्रयोग में कालिदास की दक्षता है। वे इन्द्रवज्रा, उपजाति, वंशस्थ, और अनुष्टुप् छन्दों के प्रयोग में सिद्धहस्त हैं। जहाँ मेघदूत में उन्होंने केवल मन्दाक्रान्ता छन्द से ही कमाल दिखा दिया है वहाँ रघुवंश में छन्दों की विविधता की निपुणता दिखाई पड़ती है।

संस्कृत साहित्य में नाटकों की सजीव तथा मूर्त परम्परा का अनुवर्तन महाकवि भास से होता है। नाटकों की निर्माणपरम्परा में भास के बाद महाकवि कालिदास का क्रम आता है। संस्कृत साहित्य के उपवन में कालिदास का समागम एक वसन्तदूत के रूप में माना गया है जिसके कारण उस उपवन का कोना-कोना पुष्पित हो उठता है। उन्होंने संस्कृत भाषा को वाणी दी, नये साज सजाए, नये भाव, नयी दिशाएँ, नये विचार और नयी-नयी पद्धतियाँ दीं। इसी प्रकार कविवर कालिदास सबसे बड़े नाटककार और सबसे बड़े महाकवि हैं। कालिदास के सम्बन्ध में विश्वकवि गोटे ने कहा है कि स्वर्ग एवं मर्त्य का जो मिलन है उसे कालिदास ने सहज ही सम्पादित कर दिया है तथा उन्होंने फूल को सहज भाव से फल के रूप से परिणत कर दिया है। मर्त्य की सीमा को उन्होंने इस प्रकार स्वर्ग से मिला दिया है कि बीच का व्यवहार किसी को दृष्टिगोचर नहीं होता।

नाटकों के क्षेत्र में महाकवि ने 'मालविकाग्निमित्र', 'विक्रमोर्वशीय' और 'अभिज्ञान-शाकुन्तल' इन कृतियों का प्रणयन किया है। नाटकीय नियमों की दृष्टि से कथानिर्वाह, घटनाक्रम, पात्र-योजना आदि सभी में उनके असाधारण कौशल की छाप है। शाकुन्तल उनकी अन्तिम कृति है, किन्तु उसकी गणना आज विश्व-साहित्य की पहली कृतियों में की जाती है। प्रेम और सौन्दर्य का ऐसा सरस, हृदयग्राही एवं मर्मस्पर्शी चित्रण अन्यत्र देखने को नहीं मिलता है। उनमें ओज के साथ मनोज्ञता और लघुत्व के साथ ही भावप्राञ्जलता का अद्भुत समन्वय विद्यमान है।

जन्माष्टमी, सं० २०३७ वि०
भारतीय साहित्य शोध संस्थान
वाराणसी

विनीत
डा० श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी